शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः १७.
गिरीन्द्रशिखराकारो लीलयोन्मूलितद्रुमः ।
करिणीस्पर्शसम्मोहाद्बन्धनं याति वारणः ॥ १०३ ॥
**स्पर्श विषय के द्वारा—**पर्वत के शिखर की भांति ऊंचे आकार वाला, खेलवाड़ से पेड़ों को उखाड़ देने वाला हाथी भी हथिनी के स्पर्श से मोहित होकर बन्धन को प्राप्त होता है ।
स्निग्धदीपशिखालोकविलोलितविलोचनः ।
मृत्युमृच्छति सम्मोहात् पतंगः सहसा पतन् ॥ १०४ ॥
**रूप विषय द्वारा—**स्निग्ध (स्नेह = तैलयुक्त) दीप की शिखा के प्रकाश से चञ्चल नेत्र वाला पतङ्ग (फततिङ्गा) मोहित होकर सहसा दीपशिखा पर गिरता हुआ मृत्यु को प्राप्त करता है ।
अगाधसलिले मग्नो दूरेऽपि बसतौ बसन् ।
मीनस्तु सामिषं लोहमास्वादयति मृत्यवे ॥ १०५ ॥
**रस विषय द्वारा—**अगाध जल में डूबा हुआ, दूर से दूर रहता हुआ भी मीन (मछली) मोह से मांसयुक्त लौहकण्टक का आस्वाद लेता हुआ मृत्यु को प्राप्त करता है ।
उत्कर्तितुं समर्थोपि गंतुं चैव सपक्षकः ।
द्विरेफो गन्धलोभेन कमले याति बन्धनम् ॥ १०६ ॥
**गन्ध विषय द्वारा—**कमल को काट डालने में एवं पङ्ख होने से उड़ने में भी समर्थ भौंरा गन्ध के लोभ से कमल के अन्दर संकुचित होने पर बँध जाता है अर्थात् उसी में बँधकर मर जाता है ।
एकैकशो विनिघ्नन्ति विषया विषसन्निभाः ।
किंपुनः पंच मिलिता न कथं नाशयंति हि ॥ १०७ ॥
विष के तुल्य उक्त शब्दादि विषय पृथक् २ रहकर भी प्राणनाशक होते हैं यदि वे पांचों मिलित हों तो क्यों नहीं नाश कर सकते हैं अर्थात् निःसन्देह प्राण ले सकते हैं ।
द्यूतं स्त्री मद्यमेवैतत्त्रितयं बहनर्थकृत् ।
अयुक्तं युक्तियुक्तं हि धनपुत्रमतिप्रदम् ॥ १०८ ॥
**द्यूतादिव्यसन के दोषों का निर्देश—**द्यूत (जूआ) खेलना, स्त्री-सेवन, मद्यपान ये तीनों अधिक मात्रा में होने से बहुत अनर्थ करने वाले होते हैं किन्तु यदि इनका उचित उपयोग किया जाय तो द्यूत से धन, स्त्री से पुत्र और मद्य से बुद्धि की प्राप्ति होती है ।
नलधर्मप्रभृतयः सुद्यूतेन विनाशिताः ।
सकापट्यं धनायालं द्यूतं भवति तद्विदाम् ॥ १०९ ॥
२ शु०