भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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प्रथमोऽध्यायः २६

दशकोटिमितो यावद्विराट् तु तदनन्तरम् ॥ १८६ ॥ उसके बाद १ कोटि ( करोड़ ) पर्यन्त वार्षिक आय होने से राजा 'स्वराट्' कहलाता है और उसके बाद १० कोटि पर्यन्त आय होने से 'सम्राट्' कहलाता है । उसके बाद ५० कोटि पर्यन्त 'विराट्' कहलाता है ।

पञ्चाशत्कोटिपर्यतं सार्वभौमस्ततः परम् । सप्तद्वीपा च पृथिवी यस्य वश्या भवेत्सदा ॥ १८७ ॥ इससे अधिक वार्षिक आय होने से राजा 'सार्वभौम' कहलाता है और इसके सदा अधीन सातो द्वीपों से युक्त संपूर्ण पृथ्वी रहती है ।

स्वभागभृत्या दास्यत्वे प्रजानां च नृपः कृतः । ब्रह्मणा स्वामिरूपस्तु पालनार्थं हि सर्वदा ॥ १८८ ॥ प्रजाओं से अपना वार्षिक कर रूप वेतन स्वीकार करने से स्वामी रूप में स्थित राजा को ब्रह्मा जी ने प्रजाओं के पालनार्थ सदा दास बनाया है।

सामन्तादिसमा ये तु भृत्या अधिकृता भुवि । तेन सामन्तसंज्ञाः स्यु राजभागहराः क्रमात् ॥ १८६ ॥ राजा के द्वारा भूमि का कर संग्रह करने के लिये रखे हुये जो नौकर सामन्त आदि के तुल्य हैं अर्थात् १ लाख कर संग्रह करते हैं वे 'अनुसामन्त' कहलाते हैं।

सामन्तादिपदभ्रष्टास्तत्तुल्यं भृतिपोषिताः । महाराजादिभिस्ते तु हीनसामन्तसंज्ञकाः ॥ १९० ॥ जो महाराज आदि के द्वारा सामन्त आदि पद से हटाकर उसके तुल्य वेतन देकर पालित होते हैं वे 'हीनसामन्त' कहलाते हैं ।

शतग्रामाधिपो यस्तु सोऽपि सामन्तसंज्ञकः । शतग्रामे चाधिकृतोऽनुसामन्तो नृपेण सः ॥ १९१ ॥ और १०० ग्रामों का जो अधिपति होता है वह भी 'सामन्त' कहलाता है । और जो राजा द्वारा १०० ग्रामों का कर-संग्रहार्थ वेतन देकर नियुक्त किया जाता है वह भी 'अनुसामन्त' कहलाता है ।

अधिकृतो दशग्रामे नायकः स च कीर्तितः । आशापालोऽयुतग्रामभागभाक् च स्वराडपि ॥ १९२ ॥ दश ग्रामों का कर-संग्रहार्थ जो अधिकारी (वेतन देकर) नियुक्त किया जाता है वह 'नायक' कहलाता है। और १०००० दश हजार ग्रामों से कर ग्रहण करने वाला 'आज्ञापाल' अथवा 'स्वराट्' कहलाता है ।

भवेत्क्रोशात्मको ग्रामो रूप्यकर्षसहस्रकः । ग्रामार्धकं पल्लिसंज्ञं पल्ल्यर्धं कुंभसंज्ञकम् ॥ १६३ ॥