शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३० | शुक्रनीतिः |
|---|
भूमि के मानभेदों का निर्देश—ग्राम १ क्रोश वर्ग का होता है । और उसकी मालगुजारी १००० रजत मुद्रा (रुपये) की होती है । ग्राम का आधा प्रमाण 'पल्ली' का होता है और पल्ली का आधा प्रमाण 'कुम्भ' का होता है ।
करैः पंचसहस्रैर्वा क्रोशः प्रोक्तः प्रजापतेः ।
हस्तैश्चतुःसहस्रैर्वा मनोः क्रोशस्य बिस्तरः ॥ १६४ ॥
पांच हजार ५००० हाथों का प्रजापति-संबन्धी 'क्रोश' होता है । और चार हजार ४००० हाथों का विस्तार मनु-सम्बन्धी क्रोश का होता है ।
सार्ध द्विकोटिहस्तैश्च क्षेत्रं क्रोशस्य ब्रह्मणः ।
पंचविंशशतैः प्रोक्तं क्षेत्रं तद्विनिवर्तनैः ॥ १६५ ॥
ढाई २॥ करोड़ हाथों का ब्रह्मा के क्रोश का क्षेत्र होता है । और उसके २५०० विनिवर्तनों से क्षेत्र कहलाता है ।
मध्यमामध्यमपर्वदैर्घ्यं यच्चतुरंगुलम् ।
यवोदरैरष्टभिस्तु दैर्घ्यं स्थौल्यं तु पंचभिः ॥ १६६ ॥
मध्यमा अंगुलि के मध्यम पर्व की भांति लम्बाई १ अंगुल की होती है । और ८ जौ के उदर के समान लम्बाई तथा पांच जौ के उदर की भांति मुटाई १ अंगुल की होती है ।
चतुर्विंशत्यंगुलैस्तैः प्राजापत्यः करः स्मृतः ।
स श्रेष्ठो भूमिमाने तु तदन्यास्त्वधमा मताः ॥ १६७ ॥
वैसी २४ अंगुलियों का १ प्राजापत्य कर (हाथ) होता है । और भूमि के नापने में यही श्रेष्ठ होता है, इससे अन्य सभी अधम कहलाते हैं ।
चतुःकरात्मको दंडो लघुः पंचकरात्मकः ।
तदङ्गुलं पंचयवैर्मानवं मानमेव तत् ॥ १६८ ॥
४ हाथ का जो 'दण्ड' होता है वह 'लघु' कहलाता है । और ५ हाथ का दण्ड 'दीर्घ' कहलाता है । और जो ५ जौ का अंगुल होता है वह मानव-मान से होता है ।
वसुषण्मुनिसंख्याकैर्यवैर्दण्डः प्रजापतेः ।
यवोदरैः षट्शतैस्तु मानवो दण्ड उच्यते ॥ १६९ ॥
७६८ यव-प्रमाण 'प्रजापति' का दण्ड होता है । ६०० यव-प्रमाण 'मानव दण्ड' होता है ।
पंचविंशतिभिर्दण्डैरुभयोस्तु निवर्तनम् ।
त्रिंशच्छतैरङ्गुलैर्यवैश्चापि पञ्चसहस्रकैः ॥ २०० ॥
२५ पचीस दण्डों का दोनों का निवर्तन होता है । अथवा ३००० अंगुल या १५००० यवों का उक्त निवर्तन होता है ।