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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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प्रथमोऽध्यायः ३१

सपादशतहस्तैश्च मानवं तु निवर्त्तनम् ।
ऊनविंशतिसाहस्रैर्द्विशतैश्च यवोदरैः ॥ २०१ ॥
१२५ हाथों का मानव निवर्त्तन होता है या १९२०० यवों का होता है ।

चतुर्विंशशतैरेव ह्यंगुलैश्च निवर्त्तनम् ।
प्राजापत्यं तु कथितं शतैश्चैव करैः सदा ॥ २०२ ॥
२४०० अंगुलों का निवर्त्तन होता है, १०० हाथों का प्राजापत्य निवर्त्तन होता है ।

सपादषट्शतं दंडा उभयोश्च निवर्त्तने ।
निवर्त्तनान्यपि सदोभयोर्वै पंचविंशतिः ॥ २०३ ॥
दोनों के निवर्त्तन में ६२५ दण्ड होते हैं । उन दोनों के निवर्त्तन सदा २५ होते हैं ।

पंचसप्ततिसाहस्रैरंगुलैः परिवर्त्तनम् ।
मानवं षष्टिसाहस्रैः प्राजापत्यं तथांगुलैः ॥ २०४ ॥
७५००० अङ्गुलों का 'मानव'-संज्ञक परिवर्त्तन और ६०००० अङ्गुलों का 'प्राजापत्य' परिवर्त्तन होता है ।

पञ्चविंशाधिकैर्हस्तैरेकत्रिंशशतैर्मनोः ।
परिवर्त्तनमाख्यातं पञ्चविंशशतैः करैः ॥ २०५ ॥
प्राजापत्यं पादहीनचतुर्लक्षयवोन्मनोः ।
अशीत्यधिकसाहस्रचतुर्लक्षयवैः परम् ॥ २०६ ॥
३१२५ हाथों का 'मानव' परिवर्त्तन और २५०० हाथों का 'प्राजापत्य' परिवर्त्तन होता है । और ३००००० यवों का 'मानव परिवर्त्तन' होता है । ३८०००० यवों का 'प्राजापत्य परिवर्त्तन' होता है ।

निवर्त्तनानि द्वात्रिंशन्मनुमानेन तस्य वै ।
चतुःसहस्रहस्ताः स्युर्दंडाश्चाष्टशतानि हि ॥ २०७ ॥
मनु के मान से ३२ निवर्त्तनों का ४००० हाथ, और ८०० दण्ड होते हैं ।

पंचविंशतिभिर्दण्डैर्भुजः स्यात्परिवर्त्तने ।
करैरयुतसंख्याकैः क्षेत्रं तस्य प्रकीर्त्तितम् ॥ २०८ ॥
परिवर्त्तन में २५ दण्डों का भुज होता है १०००० दश हजार हाथों का परिवर्त्तन का क्षेत्र होता है ।

चतुर्भुजैः समं प्रोक्तं कृष्टभूपरिवर्त्तनम् ।
प्राजापत्येन मानेन भूभागहरणं नृपः ॥ २०९ ॥
सदा कुर्याच्च स्वायत्तैर्मनुमानेन नान्यथा ।
लोभात् सङ्कर्षयेद्यस्तु हीयते सप्रजो नृपः ॥ २१० ॥