शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें३२ शुक्रनीतिः
जोती हुई भूमि का परिवर्तन ४ भुजों के समान कहा गया है। राजा सदा 'प्राजापत्य' मान से पृथ्वी के भाग का ग्रहण करे। और आपत्ति-काल में 'मानव' मान से ग्रहण करे। इससे अन्यथा रीति से भूभाग न ग्रहण करे। यदि लोभवश प्रजा से उक्त नियम से अधिक भूभाग ग्रहण करता है तो वह प्रजा-सहित हीन हो जाता है।
न दद्याद् द्व्यंगुलमपि भूमेः स्वत्वनिवर्तकम्।
वृत्त्यर्थं कल्पयेद्वापि यावद्ब्रूयात्स्तु जीवति ॥ २११ ॥
और दो अङ्गुल भी भूमि बिना कर की न छोड़े अर्थात् सब पर कर लगाकर देवे। अथवा जितने से वह अपनी जीविका चला सके उतनी भूमि उसे दे देवे। ऐसा राजा का कर्त्तव्य है।
गुणी तावद् देवतार्थं विसृजेच्च सदैव हि।
आरामार्थं गृहार्थं वा दद्याद् दृष्ट्वा कुटुम्बिनम् ॥ २१२ ॥
गुणवान राजा देवता के मन्दिर या बगीचा-निर्माणार्थ सदा भूमि का बिना कर के दान करे और कुटुम्बी को देखकर उसे गृह-निर्माणार्थ भूमि देवे।
नानावृक्षलताकीर्णे पशुपक्षिगणावृते।
सुबहूदकधान्ये च तृणकाष्ठसुखे सदा ॥ २१३ ॥
आसिंधुनौगमाकूले नातिदूरमहीधरे।
सुरम्यसमभूदेशे राजधानीं प्रकल्पयेत् ॥ २१४ ॥
राजधानी बनाने योग्य प्रदेश के लक्षण—नाना प्रकार के वृक्ष तथा लता से व्याप्त, पशु तथा पक्षिगणों से युक्त, बहुत जल तथा धान्य से पूर्ण, सदा तृण तथा काष्ठ मिलने की सुविधा से युक्त, समुद्र पर्यन्त नौका से गमन करने लायक नदी के तट एवं सुरम्य सम भूमिवाले ऐसे भूप्रदेश में राजा राजधानी का निर्माण करे।
अर्धचन्द्रां वर्तुलां वा चतुरस्रां सुशोभनाम्।
सप्राकारां सपरिखां ग्रामादीनां निवेशिनीम् ॥ २१५ ॥
सभामध्यां कूपवापीतडागादियुतां सदा।
चतुर्दिक्षु चतुर्द्वारां सुमार्गारामवीथिकाम् ॥ २१६ ॥
दृढसुरालयमठपान्थशालाभिरजिताम् ।
कल्पयित्वा वसेत्तत्र सुगुप्तः सप्रजो नृपः ॥ २१७ ॥
देखने में अर्धचन्द्र या गोल या चौकोर आकारवाली, अत्यन्त शोभायमान, प्राकार (चहारदीवारी) और परिखा (खाई) से युक्त, ग्रामादि बसाने लायक हो और जिसके मध्य में सभा-मण्डप हो, एवं सदा, कूप, बावली, तड़ाग आदि से युक्त, चारों दिशाओं में ४ द्वार बने हुये, सुन्दर मार्ग, बगीचा,