शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 124, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३८ | शुक्रनीतिः |
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सेनाधिपाः पदातीनां गणः सादिगणस्ततः ॥ २५४ ॥
साश्वश्च सगजश्चापि गजपालगणस्ततः ।
बृहन्नालिकयन्त्राणि ततः स्वतुरंगोगणः ॥ २५५ ॥
ततः स्वगौल्मिकगणो ह्यारण्यकगणस्ततः ।
क्रमादेषां गृहाणि स्युः शोभनानि पुरे सदा ॥ २५६ ॥
और नगर में प्रकृति (मन्त्री), अनुप्रकृति (मन्त्री के नीचे काम करने वाले), अधिकारियों (अफसरों) के गण, सेनापति, पैदल सिपाहियों का गण, घुड़ सवारों का गण, हयशाला, गजशाला और गजपालों (हस्तिरक्षकों) का गण, बड़ी २ तोपें, धोबियों का गण, गोपालों का गण, आरण्यकों (जंगली भिल्लादिकों) का गण इन सबों के लिये क्रम से गृह होने चाहिये।
पान्थशाला ततः कार्या सुगुप्ता सुजलाशया ।
सजातीयगृहाणां हि समुदायेन पंक्तितः ॥ २५७ ॥
निवेशनपुरे ग्रामे प्रागुदङ्मुखमेव वा ।
सजातिपण्यनिवहैरापणे पण्यवेशनम् ॥ २५८ ॥
धनिकादिक्रमेणैव राजमागंस्य पार्श्वयोः ।
एवं हि पत्तनं कुर्याद् ग्रामं चैव नराधिपः ॥ २५९ ॥
**धर्मशाला के निर्माण का निर्देश—**और यात्रियों के ठहरने के लिये धर्मशाला होनी चाहिये जो कि सुरक्षित हो तथा सुन्दर जलाशय (कूप आदि) से युक्त हो और जिसमें समान आकारवाले गृहों का समुदाय कतार से हों ऐसे गृह पुर अथवा ग्राम में पूर्व अथवा उत्तर मुख का बनवाने चाहिये। और आपण (बाजार) में एक जाति के पण्यों (बिकनेवाली वस्तुओं) के समूह से युक्त दुकानें बनवानी चाहिये। धनिक आदियों के क्रम से राजमार्ग के दोनों तरफ दुकानें बनवानी चाहिये। इस प्रकार से राजा नगर या ग्राम का निर्माण करावे।
राजमार्गास्तु कर्तव्याश्चतुर्दिक्षु नृपगृहात् ।
उत्तमो राजमार्गस्तु त्रिंशद्धस्तमितो भवेत् ॥ २६० ॥
मध्यमो विंशतिकरो दशपञ्चकरोऽधमः ।
पण्यमार्गास्तथा चैते पुरग्रामादिषु स्थिताः ॥ २६१ ॥
**राजमार्गादि-निर्माण का निर्देश—**राजभवन के चारों दिशाओं में राजमार्ग (प्रधान सड़क) बनवाना चाहिये। उत्तम राजमार्ग ३० हाथ चौड़ी होती है। मध्यम २० हाथ चौड़ी, अधम राजमार्ग १५ हाथ चौड़ा होता है। पुर तथा ग्रामादिकों में इन्हीं ३ प्रकार के पण्यमार्ग (बाजार की सड़कें) बनाये जाते हैं।