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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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प्रथमोऽध्यायः ३९

करत्रयात्मिका पद्या वीथिः पञ्चकरात्मिका ।
मार्गो दशकरः प्रोक्तो ग्रामेषु नगरेषु च ॥ २६२ ॥
ग्राम और नगरों में पद्या (पगडण्डी) ३ हाथ चौड़ी, वीथि (गली) ५ हाथ चौड़ी और मार्ग १० हाथ चौड़ा बनाया जाता है ।

प्राक्पश्चाद्दक्षिणोदक्तान् याममध्यात् प्रकल्पयेत् ।
पुरं दृष्ट्वा राजमार्गांत्सुबहून्कल्पयेन्नृपः ॥ २६३ ॥
राजा ग्राम के मध्य भाग से पूर्व से पश्चिम और दक्षिण से उत्तर जाने वाले राजमार्ग बनवाये । और उन्हें नगर के अनुसार बहुत सा भी बनवा सकता है ।

न वीथि न च पद्यां हि राजधान्यां प्रकल्पयेत् ।
षड्योजनान्तरेऽरण्ये राजमार्गं तु चोत्तमम् ॥ २६४ ॥
कल्पयेन्मध्यमं मध्ये तयोर्मध्ये तथाधमम् ।
दशहस्तात्मकं नित्यं ग्रामे ग्रामे नियोजयेत् ॥ २६५ ॥
राजधानी में पद्या (पगडण्डी), वीथि (गली) नहीं बनवानी चाहिये । ६ योजन (२४ क्रोश) के अन्तर पर जङ्गल में उत्तम राजमार्ग (३० हाथ चौड़ी सड़क) बनवाना चाहिये । मध्य में मध्यम राजमार्ग (२० हाथ चौड़ी सड़क) बनवाना चाहिये । उन दोनों के मध्य में दस हाथ चौड़ाई का अधम-संज्ञक राजमार्ग प्रत्येक ग्राम में सदा बनवाना चाहिये ।

कूर्मपृष्ठा मार्गभूमिः कार्या ग्राम्यैः सुसेतुका ।
कुर्यान्मार्गांन्पार्श्वखातान्निर्गमार्थं जलस्य च ॥ २६६ ॥
ग्रामवालों को अपने २ ग्राम की सड़कों की भूमि का आकार कछुये की पीठ की भांति बनवाना चाहिये । और उसमें आवश्यकतानुसार पुल भी होना चाहिये । और ऐसे मार्ग बनवाने चाहिये, जिसमें जल बहने के लिये दोनों तरफ नालियां बनी हों ।

राजमार्गमुखानि स्युर्गृहाणि सकलान्यपि ।
गृहपृष्ठे दासवीथी मलनिर्हरणस्थलम् ॥ २६७ ॥
पंक्तिद्वयगतानां हि गेहानां कारयेत्तथा ।
मार्गांत्सुधाशर्करैर्वा घटितान्प्रतिवत्सरम् ॥ २६८ ॥
अभियुक्तनिरुद्धैर्वा कुर्याद् ग्राम्यजनैर्नृपः ।
और जितने गृह हों उनके सभी मुख (प्रधान द्वार) राजमार्ग की तरफ हों । और गृह के पिछवारे नौकरों के आने-जाने के लिये गली एवं पाखाना हो । गृहों की दो पङ्क्तियों के बीच में जो रास्ते हों उन्हें प्रतिवर्ष चूना-कङ्कर