भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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प्रथमोऽध्यायः ४१

प्रत्यक्षतो लेखतश्च ज्ञात्वा चाद्य व्ययः कति ।
भविष्यति च तत्तुल्यं द्रव्यं कोशात्तु निर्हरेत् ॥ २७८ ॥
राजाओं के आवश्यकीय दैनिक कृत्य— राजधानी में रहता हुआ राजा निम्नरीति से प्रतिदिन के कार्यों को करे। जैसे रात्रि के चतुर्थ प्रहर में दो मुहूर्त तक आज का कितना नियत आय ( आमद ) है और कितना नियत व्यय ( खर्च ) है ? खजाने में रखे हुए द्रव्य में से कितना द्रव्य व्यय हुआ, व्यवहार में मुद्रित आय-व्यय होने पर कितना शेष है । यह बात प्रत्यक्ष तथा लेख से जांचकर आज कितना व्यय होगा अतः उसके अनुसार खजाने से उतना द्रव्य निकलवा कर अलग रख दे ।

पश्चात्तु वेगनिर्मोक्षं स्नानं मौहूर्तिकं मतम् ।
सन्ध्यापुराणदानैश्च मुहूर्तद्वितयं नयेत् ॥ २७६ ॥
मुहूर्त्तों के विभाग द्वारा राजा के कार्यों का निर्देश— इसके बाद १ मुहूर्त तक मल-मूत्रादि का परित्याग और स्नान करे । सन्ध्या कृत्य, पुराणश्रवण और दान करने में दो मुहूर्त तक समय दे ।

पारितोषिकदानेन मुहूर्तं तु नयेत्सुधीः ।
धान्यवस्त्रस्वर्णरत्नसेनादेशविलेखनैः ॥ २८० ॥
सायव्ययैर्मुहूर्तानां चतुष्कं तु नयेत्सदा ।
स्वस्थचित्तो भोजनेन मुहूर्तं ससुहृन्नृपः ॥ २८१ ॥
समझदार राजा पारितोषिक ( इनाम ) देने का कार्य १ मुहूर्त तक करे । सदा धान्य, वस्त्र, सुवर्ण, रत्नों के देखने और सेना के लिये आदेश ( हुक्म ) लिखने एवं आय-व्यय के निरीक्षण में ४ मुहूर्त तक समय व्यतीत करे । और राजा अपने मित्रों के साथ भोजन करके १ मुहूर्त तक स्वस्थ चित्त हो विश्राम करे ।

प्रत्यक्षीकरणाज्जीर्णनवीनानां मुहूर्तकम् ।
ततस्तु प्राड्विवाकादिबोधितव्यवहारतः ॥ २८२ ॥
मुहूर्तद्वितयं चैव मृगयाक्रीडनैर्नयेत् ।
व्यूहाभ्यासैर्मुहूर्तं तु मुहूर्तं सन्ध्यया ततः ॥ २८३ ॥
मुहूर्तं भोजनेनैव द्विमुहूर्तं च वार्तया ।
गूढचारैः श्रावितया निद्रयाष्टमुहूर्तकम् ॥ २८४ ॥
और पुरानी तथा नवीन वस्तुओं के निरीक्षण करने में १ मुहूर्त, तथा प्राड्विवाक ( जज या वकील ) आदि से समझाये हुये व्यवहारों ( मुकदमों ) के देखने में २ मुहूर्त समय व्यतीत करे । मृगया ( शिकार खेलना ) तथा क्रीडन ( खेल ) में दो मुहूर्त, व्यूहाभ्यास में १ मुहूर्त तथा सन्ध्या में १ मुहूर्त,