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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४२ | शुक्रनीतिः

भोजन में १ मुहूर्त और गूढचारों (जासूसों) से सुनाई गई बातों के सुनने में दो मुहूर्त एवं निद्रा (सोने) में ८ मुहूर्त तक समय व्यतीत करें।

एवं विहरतो राज्ञः सुखं सम्यक्प्रजायते ।
अहोरात्रं विभज्यैवं त्रिंशद्भिस्तु मुहूर्तकैः ॥ २८५ ॥
नयेत्कालं वृथा नैव नयेत्स्त्रीमद्यसेवनैः ।

इस प्रकार से विहार (व्यवहार) करनेवाले राजा को भलीभांति सुख मिलता है। पूर्वोक्त रीति से ३० मुहूर्तों में अहोरात्र (दिन-रात) को बांटकर समय व्यतीत करे, न कि स्त्री तथा मद्य का सेवन करने से वृथा समय व्यतीत करे।

यत्काले ह्युचितं कर्तुं तत्कार्यं द्रागशङ्कितम् ॥ २८६ ॥
काले वृष्टिः सुपोषाय ह्यन्यथा सुविनाशिनी ।

जिस समय में जो कार्य करने के लिये उचित हो उसे उसी समय निःशङ्क होकर झटपट कर डाले। क्योंकि—समय पर हुई वृष्टि धान्यादि की सुन्दर पुष्टि के लिये होती है अन्यथा (बे-समय की) वृष्टि धान्यादि-विनाशक होती है।

कार्यस्थानानि सर्वाणि यामिकैरभितोऽनिशम् ॥ २८७ ॥
नयवान्नीतिगतिवित्सिद्धशस्त्रादिकैर्वरैः ।
चतुर्भिः पञ्चभिर्वापि षड्भिर्वा गोपयेत्सदा ॥ २८८ ॥

नीति और नीति की चालों को समझने वाला राजा सदा कार्य के सम्पूर्ण स्थानों की चारो तरफ से शस्त्रादि चलाने में निपुण, अच्छे, ४, ५ या ६ प्रहरियों (पहरेदारों) से रक्षा करावे।

तत्रत्यानि दैनिकानि शृणुयाल्लेखकाधिपैः ।
दिने दिने यामिकानां प्रकुर्यात्परिवर्तनम् ॥ २८९ ॥

और उन कार्य-स्थानों की दैनिक कार्यवाहियों को वहां के लेखाध्यक्षों से सुने। और प्रतिदिन पहरेदारों की बदली किया करे।

गृहपंक्तिमुखे द्वारं कर्तव्यं यामिकैः सदा ।
तैस्तद्वृत्तं तु शृणुयाद् गृहस्थभृतिपोषितैः ॥ २९० ॥

प्रहरियों के कर्त्तव्य का निर्देश— गृहों की पंक्तियों के प्रधान द्वार पर नियुक्त पहरेदारों से वहां के रहनेवालों के व्यवहार (चरित्र) को सुने। और पहरेदारों को गृहस्थों से वेतन दिला कर पालन-पोषण करे।

निर्गच्छन्ति च ये ग्रामाद्ये ग्रामं प्रविशन्ति च ।
तान्सुसंशोध्य यत्नेन मोचयेत्तल्लग्नकान् ॥ २९१ ॥
प्रख्यातवृत्तशीलांस्तु ह्यविमृश्य विमोचयेत् ।