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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

४२ | शुक्रनीतिः

भोजन में १ मुहूर्त और गूढचारों (जासूसों) से सुनाई गई बातों के सुनने में दो मुहूर्त एवं निद्रा (सोने) में ८ मुहूर्त तक समय व्यतीत करें।

एवं विहरतो राज्ञः सुखं सम्यक्प्रजायते ।
अहोरात्रं विभज्यैवं त्रिंशद्भिस्तु मुहूर्तकैः ॥ २८५ ॥
नयेत्कालं वृथा नैव नयेत्स्त्रीमद्यसेवनैः ।

इस प्रकार से विहार (व्यवहार) करनेवाले राजा को भलीभांति सुख मिलता है। पूर्वोक्त रीति से ३० मुहूर्तों में अहोरात्र (दिन-रात) को बांटकर समय व्यतीत करे, न कि स्त्री तथा मद्य का सेवन करने से वृथा समय व्यतीत करे।

यत्काले ह्युचितं कर्तुं तत्कार्यं द्रागशङ्कितम् ॥ २८६ ॥
काले वृष्टिः सुपोषाय ह्यन्यथा सुविनाशिनी ।

जिस समय में जो कार्य करने के लिये उचित हो उसे उसी समय निःशङ्क होकर झटपट कर डाले। क्योंकि—समय पर हुई वृष्टि धान्यादि की सुन्दर पुष्टि के लिये होती है अन्यथा (बे-समय की) वृष्टि धान्यादि-विनाशक होती है।

कार्यस्थानानि सर्वाणि यामिकैरभितोऽनिशम् ॥ २८७ ॥
नयवान्नीतिगतिवित्सिद्धशस्त्रादिकैर्वरैः ।
चतुर्भिः पञ्चभिर्वापि षड्भिर्वा गोपयेत्सदा ॥ २८८ ॥

नीति और नीति की चालों को समझने वाला राजा सदा कार्य के सम्पूर्ण स्थानों की चारो तरफ से शस्त्रादि चलाने में निपुण, अच्छे, ४, ५ या ६ प्रहरियों (पहरेदारों) से रक्षा करावे।

तत्रत्यानि दैनिकानि शृणुयाल्लेखकाधिपैः ।
दिने दिने यामिकानां प्रकुर्यात्परिवर्तनम् ॥ २८९ ॥

और उन कार्य-स्थानों की दैनिक कार्यवाहियों को वहां के लेखाध्यक्षों से सुने। और प्रतिदिन पहरेदारों की बदली किया करे।

गृहपंक्तिमुखे द्वारं कर्तव्यं यामिकैः सदा ।
तैस्तद्वृत्तं तु शृणुयाद् गृहस्थभृतिपोषितैः ॥ २९० ॥

प्रहरियों के कर्त्तव्य का निर्देश— गृहों की पंक्तियों के प्रधान द्वार पर नियुक्त पहरेदारों से वहां के रहनेवालों के व्यवहार (चरित्र) को सुने। और पहरेदारों को गृहस्थों से वेतन दिला कर पालन-पोषण करे।

निर्गच्छन्ति च ये ग्रामाद्ये ग्रामं प्रविशन्ति च ।
तान्सुसंशोध्य यत्नेन मोचयेत्तल्लग्नकान् ॥ २९१ ॥
प्रख्यातवृत्तशीलांस्तु ह्यविमृश्य विमोचयेत् ।

प्रथमोऽध्यायः ४३.

ग्राम से जो निकल रहे हैं वा प्रवेश कर रहे हैं उनकी यत्नपूर्वक तलाशी लेकर चिह्न लगाने के बाद उन्हें छोड़ देवे । और जिनके व्यवहार तथा शील प्रख्यात हों ऐसे प्रतिष्ठित लोगों को बिना विचार किये ही छोड़ देवे ।

वीथीवीथिषु यामार्द्धैर्निशि पर्य्यटनं सदा ॥ २६२ ॥
कर्त्तव्यं यामिकैरेवं चौरजारनिवृत्तये ।

प्रत्येक गलियों में रात्रि के समय आधे २ प्रहर (डेढ़ २ घण्टे) पर घूम २ कर पहरेदारों को इस प्रकार से पहरा देना चाहिये जिससे चोर तथा जार ( परस्त्री गामी ) पुरुष दूर रहें ।

शासनं त्वीदृशं कार्यं राज्ञा नित्यं प्रजासु च ॥ २६३ ॥
दासे भृत्येऽथ भार्य्यायां पुत्रे शिष्येपि वा क्वचित् ।
वाग्दण्डपरुषन्नैव कार्य्य मद्देशसंस्थितैः ॥ २६४ ॥

प्रजाओं में राजा के आदेशों की घोषणा का निर्देश— और राजा को प्रजाओं के लिये नित्य इस प्रकार से शासन ( आदेश ) देना चाहिये कि—मेरे राज्य में रहनेवालों के लिये लिये यह उचित है कि—वे गुलाम, नौकर, स्त्री, पुत्र, शिष्य इनमें से किसी को भी कठोर-वचनों से दण्ड न देवें ।

तुलाशासनमानानां नाणकस्यापि वा क्वचित् ।
निर्य्यासानां च धातूनां सजातीनां घृतस्य च ॥ २६५ ॥
मधुदुग्धवसादीनां पिष्टादीनां च सर्व्वदा ।
कूटं नैव तु कार्य्यं स्याद्बलाच्च लिखितं जनैः ॥ २६६ ॥
उत्कोचग्रहणं नैव स्वामिकार्य्यविलोपनम् ।

तुला ( तौलने में ) एवं शासन (आज्ञा), मान (बटखरा), नाणक ( मुद्रा सिक्का मात्र ), निर्यास ( गोंद आदि ), धातु ( स्वर्णादि ); तथा उसके समान जाति के पदार्थ, घृत, मधु, दुग्ध, चर्बी आदि, पिसान ( चूर्ण आदि ) में कभी किसी प्रकार की बेईमानी या मिलावट लोगों को नहीं करना चाहिये । और कभी किसी से जबर्दस्ती कुछ नहीं लिखाना चाहिये और घूस नहीं लेनी चाहिये एवं स्वामी का कार्य नष्ट नहीं करना चाहिये ।

दुर्वृत्तकारिणं चोरं जारमद्वेषिणं द्विषम् ॥ २६७ ॥
न रक्षन्त्वप्रकाशं हि तथान्यानपकारकान् ।
मातॄणां पितॄणां चैव पूज्यानां विदुषामपि ॥ २६८ ॥
नावमानं नोपहासं कुर्युः सद्वृत्तशालिनाम् ।
न भेदं जनयेयुर्वै नूनार्य्यैः स्वामिभृत्ययोः ॥ २६९ ॥
भ्रातॄणां गुरुशिष्याणां न कुर्युः पितृपुत्रयोः ।

और दुष्ट आचरण करनेवाले ( गुण्डे ), चौर, जार ( लम्पट ), ये चाहे

४४ | शुक्रनीतिः

द्वेषी हों या न हों किन्तु इनकी छिप करके भी कभी रक्षा नहीं करनी चाहिये और इसी भाँति जनता के अपकारक लोगों की भी रक्षा नहीं करनी चाहिये । एवं माता-पिता, पूज्य, विद्वान, अच्छे आचरणवाले सत्पुरुषों का अपमान वा उपहास नहीं करना चाहिये । स्त्री-पुरुष तथा स्वामी-नौकर में भेद नहीं डालना चाहिये अर्थात् ऐसा व्यवहार भाई-भाई, गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र, इनमें नहीं करना चाहिये कि ये परस्पर एक दूसरे से पृथक् हो जायँ ।

वापीकूपारामसीमाधर्मशालासुरालयान् ॥ ३०० ॥
मार्गान्नैव प्रबाधेयुर्हीनांगविकलांगकान् ।

बावड़ी, कूप, बगीचा, सीमा, धर्मशाला, देवमन्दिर, मार्ग, हीन तथा विकल अङ्गवाले लोगों को क्षति तथा पीडा न पहुँचावे ।

द्यूतं च मद्यपानं च मृगयां शस्त्रधारणम् ॥ ३०१ ॥
गोगजाश्वोष्ट्रमहिषीनृणां वै स्थावरस्य च ।
रजतस्वर्णरत्नानां मादकस्य विषस्य च ॥ ३०२ ॥
क्रयं वा विक्रयं वापि मद्यसंधानमेव च ।
क्रयपत्रं दानपत्रमृणनिर्णयपत्रकम् ॥ ३०३ ॥
राजाज्ञया विना नैव जनैः कार्यं चिकित्सितम् ।
महापापाभिशापं निधिग्रहणमेव च ॥ ३०४ ॥

और बिना राजा की आज्ञा पाये द्यूत ( जुआ खेलना ), मद्य पीना, शिकार खेलना, शस्त्र रखना और गो, गज, अश्व, ऊंट, भैंस, स्थावर पदार्थ ( गृहादि ), चांदी, सोना, रत्न, मादक द्रव्य ( भांग-अफीम आदि ), विष, इन सब द्रव्यों का क्रय ( खरीदना ) वा विक्रय ( बेचना ) करना, मद्य का सन्धान ( शराब बनाना ), क्रयपत्र ( खरीदने का पत्र ), दानपत्र, ऋण के निर्णय का पत्र और चिकित्सा, महापाप का दोष लगाना, गड़े हुये द्रव्य को लेना, इन सब कार्यों को नहीं करना चाहिये ।

नवसमाजनियमं निर्णयं जातिदूषणम् ।
अस्वामि-नाष्टिक-धनसंग्रहं मन्त्रभेदनम् ॥ ३०५ ॥
नृपदुर्गुणलोपं तु नैव कुर्युः कदाचन ।

नये समाज के नियमों का निर्णय, जाति को दोष लगाना, बिना स्वामी का एवं नष्ट हुये व्यक्ति के धन को लेना, रहस्य का प्रकाश करना, राजा के दुर्गुणों को छिपाना, इन सब कार्यों को कभी नहीं करना चाहिये ।

स्वधर्महानिमनृतं परदाराभिमर्शनम् ॥ ३०६ ॥
कूटसाक्ष्यं कूटलेख्यमप्रकाशप्रतिग्रहम् ।
निर्धारितकराधिक्यं स्तेयं साहसमेव च ॥ ३०७ ॥

प्रथमोऽध्यायः ४५

मनसापि न कुर्व्वन्तु स्वामिद्रोहं तथैव च ।

अपने धर्म की हानि, झूठ बोलना, परस्त्री-सम्भोग, झूठी गवाही, झूठा लेख, राजा से छिपाकर किसी वस्तु का लेना, निर्धारित कर से अधिक लेना, चोरी, साहस के कार्य (डाका आदि), और स्वामी के साथ द्रोह, इन सब कार्यों को मनसे भी नहीं करना चाहिये ।

भृत्या शुल्केन भागेन वृद्ध्या दर्पबलाच्छलात् ॥ ३०८ ॥
आधर्षणं न कुर्व्वन्तु यस्य कस्यापि सर्व्वदा ।
परिमाणोन्मानमानं धार्य्यं राजविमुद्रितम् ॥ ३०९ ॥

वेतन, चुंगी, भाग (कर या अंश), वृद्धि (सूद), दर्प, बल, छल इनके द्वारा सदा चाहे जो हो किसी का भी कभी दबाकर पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिये । और परिमाण (बटखरा तौलने का), उन्मान (नापने का माना, सेई, द्रोण आदि) इनका मान राजमुद्रा से युक्त अर्थात् (राज-संमत) रखना चाहिये ।

गुणसाधनसंदक्षा भवन्तु निखिला जनाः ।
साहसाधिकृते दद्युर्विगृह्याततायिनम् ॥ ३१० ॥
उत्सृष्टाऽवृषभाद्या यैस्तैस्ते धार्याः सुयंत्रिताः ।

संपूर्ण जन गुणों के साधन (गुण-सम्पादन) में अच्छी तरह से निपुण हों । और आततायियों (अपराधियों) को पकड़ कर साहस के अधिकारी (पुलिस) के अधीन कर देवे । और जिन्होंने बैल आदि छोड़ दिये हैं वे उन्हें भलीभांति बांधकर रक्खें ।

इति मच्छासनं श्रुत्वा येऽन्यथा वर्त्तयन्ति तान् ॥ ३११ ॥
विनिशिष्यामि दण्डेन महता पापकारकान् ॥
इति प्रबोधयेन्नित्यं प्रजाः शासनडिंडिमैः ॥ ३१२ ॥

ऐसी मेरी राजाज्ञा को सुनकर भी जो लोग उससे अन्यथा आचरण करते हैं, ऐसे उन पापियों को मैं भारी से भारी दण्ड से दण्डित करूंगा। ऐसी प्रजाओं को राजाज्ञा सूचनार्थ ढिंढोरा पीटकर नित्य सूचित करावे ।

लिखित्वा शासनं राजा धारयेत चतुष्पथे ।
सदा चोद्यतदण्डः स्यादसाधुषु च शत्रुपु ॥ ३१३ ॥

राजाओं के कर्तव्य का निर्देश— और राजा इस राजाज्ञा को लिखकर चौराहे पर टंगा देवे एवं दुष्ट तथा शत्रुजनों के लिये सदा दण्ड देने को उद्यत रहे ।

प्रजानां पालनं कार्य्यं नीतिपूर्वं नृपेण हि ।
मार्गसंरक्षणं कुर्यान्नृपः पान्थसुखाय च ॥ ३१४ ॥

४६ शुक्रनीतिः

पान्थप्रपीडका ये ये हंतव्यास्ते प्रयत्नतः ।

राजा को नीतिपूर्वक प्रजा-पालन करना चाहिये । और यात्रियों के सुख के लिये मार्ग की रक्षा ( मरम्मत ) करनी चाहिये एवं यात्रियों को पीडा ( लूट-मार ) पहुँचाने वाले जो हों उन्हें प्रयत्नपूर्वक नष्ट करना चाहिये ।

ग्रामस्य द्वादशांशेन ग्रामपान् संनियोजयेत् ॥ ३१५ ॥
त्रिभिरंशैर्बलं धार्यं दानमर्द्धांशकेन च ।
अर्धांशेन प्रकृतयो ह्यर्धांशेनाधिकारिणः ॥ ३१६ ॥
अर्द्धाशेनात्मभोगश्च कोशोऽशेन स रच्यते ।

राजा को ग्राम के आय के १२ वाँ भाग देकर ग्रामरक्षकों की नियुक्ति करनी चाहिये और अपने आय के ३ भागों से सेना का खर्च चलाना चाहिये, आधे भाग से दान-कार्य, आधे भाग से दीवान आदि, आधे भाग से अधिकारी ( अफसर ) पुरुष, आधे भाग से अपना खर्च, १ भाग से कोश की वृद्धि, का कार्य चलाना चाहिये ।

आयस्यैवं षड्विभागैर्व्ययं कुर्यात्तु वत्सरे ॥ ३१७ ॥
सामन्तादिषु धर्मोऽयं न न्यूनस्य कदाचन ।

इस प्रकार से राजा आय के ६ भाग करके उनसे वर्ष भर का कार्य चलावे अर्थात् उक्त कार्यों में तदनुसार व्यय करे । यह धर्म सामन्त आदि-संज्ञक राजाओं के लिये है, उनसे न्यून के लिये कभी नहीं है ।

राज्यस्य यशसः कीर्तेर्धनस्य च गुणस्य च ॥ ३१८ ॥
प्राप्तस्य रक्षणेऽन्यस्य हरणेऽनुद्यमोपि च ।
संरक्षणे संहरणे सुप्रयत्नो भवेत्सदा ॥ ३१९ ॥
शौर्यपांडित्यवक्तृत्वं दातृत्वं न त्यजेत्कचित् ।

राज्य, यश, कीर्त्ति, धन और गुण इनके पाने पर उनकी रक्षा करने में तथा दूसरे के राज्यादि लेने में यत्न करना चाहिये । और इन सबों की भली प्रकार से रक्षा तथा लेने में अधिक प्रयत्नशील सदा होना चाहिये ।

बलं पराक्रमं नित्यमुत्थानं चापि भूमिपः ॥ ३२० ॥

और शूरता, पण्डिताई, वक्तृता, दानशीलता, बल, पराक्रम, नित्य उत्थान ( चढ़ाई ), इन सबों को राजा कभी न छोड़े ।

समितौ स्वात्मकार्ये वा स्वामिकार्ये तथैव च ।
त्यक्त्वा प्राणभयं युध्येत्स शूरस्त्वविशंकितः ॥ ३२१ ॥

निःशङ्क होकर जो युद्ध में अपने वा स्वामी के हित के लिये प्राण जाने के भय को त्याग कर युद्ध करता है वही शूर कहलाता है ।

पक्षं संत्यज्य यत्नेन बालस्यापि सुभाषितम् ।

प्रथमोऽध्यायः ४७

गृह्णाति धर्मतत्त्वं च व्यवस्यति स पण्डितः ॥ ३२२ ॥
जो पक्षपात (दुराग्रह) को छोड़कर बालकों की कही हुई अच्छी बातों को ग्रहण करता है और धर्मतत्त्व का निश्चय करता है, वही पण्डित कहलाता है ।

राज्ञोपि दुर्गुणान्वक्ति प्रत्यक्षमविशङ्कितः ।
स वक्ता गुणतुल्यांस्तान्न प्रस्तौति कदाचन ॥ ३२३ ॥
जो राजा के सामने ही निःशङ्क होकर उसके दुर्गुणों की निन्दा करता है नकि गुण के समान उन (दुर्गुणों) की कभी स्तुति करता है, वही वक्ता कहलाता है ।

अदेयं यस्य वै नास्ति भार्यापुत्रादिकं धनम् ।
आत्मानमपि सन्दत्ते पात्रे दाता स उच्यते ॥ ३२४ ॥
जिसको उपयुक्त पात्र के निमित्त स्त्री-पुत्रादिक, धन तथा शरीर दे देने में कोई हिचकिचाहट नहीं है वही दाता कहलाता है ।

अशङ्कितक्षमो येन कार्यं कर्तुं बलं हि तत् ।
जिससे कार्य करने के लिये निःशङ्क समर्थ होता है वही बल है ।
किंकरा इव येनान्ये नृपाद्याः स पराक्रमः ॥ ३२५ ॥
युद्धानुकूलव्यापार उत्थानमितिकीर्तितम् ।
जिससे अन्य राजा लोग किङ्कर (दास) के समान वश्य हो जाते हैं वही पराक्रम है । युद्ध के अनुकूल व्यापार को उत्थान कहते हैं ।

विषदोषभयादन्नं विमृशेत् कपिकुक्कुटैः ॥ ३२६ ॥
हंसाः स्खलन्ति कूजन्ति भृङ्गा नृत्यन्ति मायूराः ।
विरौति कुक्कुटो माद्येत् क्रौञ्चो वै रेचते कपिः ॥ ३२७ ॥
हृष्टरोमा भवेद् बभ्रुः सारिका वमते तथा ।
दृष्ट्वैवं सविषं चान्नं तस्माद्भोज्यं परीक्षयेत् ॥ ३२८ ॥
**विषादि से दूषित अन्नादि-परीक्षा का निर्देश—**विष-दोष के भय से बन्दर मुर्गा आदि के द्वारा अन्न की परीक्षा करनी चाहिये । क्योंकि विषयुक्त अन्न को देखते ही हंस लड़खड़ाने लगते हैं । भौंरे शब्द करने लगते हैं । मयूर नाचने लगते हैं, मुर्गे बोलने लगते हैं, क्रौञ्च पक्षी मतवाला हो जाता है । बन्दर मल-मूत्र त्याग करने लगता है । बभ्रु (बड़ानेवला) रोमाञ्चयुक्त हो जाता है । सारिका पक्षी वमन करने लगती है, इस रीति से सविष अन्न देखकर उसकी परीक्षा करनी चाहिये ।

भुञ्जीत षड्रसं नित्यं न द्वित्रिरससंकुलम् ।
हीनातिरिक्तं न कटु मधुरक्षारसंकुलम् ॥ ३२९ ॥

४८शुक्रनीतिः

२-३ रसों से युक्त, तथा हीन एवं अधिक रसों से युक्त और कड़ु, मधुर तथा क्षार से युक्त अन्न नहीं भोजन करना चाहिये।

आवेदयति यत्कार्यं शृणुयान्मन्त्रिभिः सह ।
आरामादौ प्रकृतिभिः स्त्रीभिश्च नटगायकैः ॥ ३३० ॥
विहरेत्सावधानस्तु मागधैरिन्द्रजालिकैः ।

और यदि कोई किसी कार्य के लिये निवेदन करे तो राजा मन्त्रियों के साथ उसे सुने। और बगीचा आदि में प्रकृति (मन्त्री आदि), स्त्री, नट, गवैया, मागध (राजा की वंशावली के वर्णन करनेवाले), इन्द्रजाल विद्या के ज्ञाता (जादूगर) इन सबों के साथ विहार करे।

गजाश्वरथयानं तु प्रातः सायं सदाऽभ्यसेत् ॥ ३३१ ॥
व्यूहाभ्यासं सैनिकानां स्वयं शिक्षेच्च शिक्षयेत् ।

राजा प्रातः तथा सन्ध्या समय में हाथी, घोड़े तथा रथ की सवारी का प्रतिदिन अभ्यास करे। और सैनिकों को व्यूहाभ्यास (व्यूह-रचना का अभ्यास = कवायद्) करावे और स्वयं करे।

व्याघ्रादिभिर्वनचरैर्मयूराद्यैश्च पक्षिभिः ॥ ३३२ ॥
क्रीडयेन्मृगयां कुर्याद् दुष्टसत्त्वानिपातयन् ।

मृगया-व्यापार (शिकार खेलने) का वर्णन—राजा व्याघ्र आदिक, वनचर (कोल्ह-सिंहादि), मयूर आदि पक्षियों के साथ क्रीडा करे और दुष्ट हिंस्र जीवों को मारता हुआ शिकार खेले।

शौर्यं प्रवर्धते नित्यं लक्ष्यसन्धानमेव च ॥ ३३३ ॥
अकातरत्वं शस्त्रास्त्रशीघ्रपातनकारिता ।
मृगयायां गुणा एते हिंसादोषो महत्तरः ॥ ३३४ ॥

शिकार खेलने से नित्य शूरता बढ़ती है। निशाना ठीक होता है। कायरता नहीं रहने पाती है। एवं शस्त्रास्त्र को शीघ्र चलाने का अभ्यास होता है। शिकार खेलने में ये सब गुण हैं किन्तु एक हिंसारूपी सबसे महान दोष है।

इङ्गितं चेष्टितं यत्नात्प्रजानामधिकारिणाम् ।
प्रकृतीनां च शत्रूणां सैनिकानां मतं च यत् ॥ ३३५ ॥
सभ्यानां बान्धवानां च स्त्रीणामन्तःपुरे च यत् ।
शृणुयाद् गूढचारेभ्यो निशि चात्ययिके सदा ॥ ३३६ ॥
सावधानमनाः सिद्धशस्त्रास्त्रः संलिखेच्च तत् ।

राजा यत्नपूर्वक प्रजाओं तथा अधिकारियों के इङ्गित तथा चेष्टा को, एवं प्रकृति (अमात्यादि), शत्रु, सैनिक, सभासद्, बान्धव और अन्तःपुर (रनिवास) में

प्रथमोऽध्यायः ४९

में रहनेवाली स्त्रियों का जो विचार हों, उन्हें जासूसों से सुने। और रात्रि में तथा संकट-काल उपस्थित होने पर सावधान-चित्त होकर शस्त्रास्त्र को धारण करे और जो जासूसों से सुने उसे छिपे भी।

असत्यवादिनं गूढचारं नैव च शास्ति यः ॥ ३३७ ॥
स नृपो म्लेच्छ इत्युक्तः प्रजाप्राणधनापहः ।

झूठ बोलनेवाले जासूस को जो राजा दण्ड नहीं देता है वह प्रजाओं के प्राण तथा धन को अपहरण करनेवाला 'म्लेच्छ' कहलाता है।

वर्णि-तपस्वि-संन्यासि-नीचसिद्धस्वरूपिणम् ॥ ३३८ ॥
प्रत्यक्षेण छलेनैव गूढचारं विशोधयेत् ।

ब्रह्मचारी, तपस्वी, संन्यासी तथा नीच, सिद्ध के रूपको धारण करनेवाले जासूस की प्रगट तथा गुप्त रूप से जांच करे अर्थात् वह सच कहता है या झूठ।

विना तच्छोधनात्तत्त्वं न जानाति च नाप्यते ॥ ३३९ ॥
अशोधकन्नृपान्नैव बिभेत्यनृतवादने ।
प्रकृतिभ्योऽधिकृतेभ्यो गूढचारं सुरक्षयेत् ॥ ३४० ॥

बिना उसका जांच किये तत्त्व (असलियत) का ज्ञान अथवा प्राप्ति नहीं होती है। जांच न करनेवाले राजा से झूठ बोलने में कोई जासूस नहीं डरता है। और प्रकृति (मन्त्री आदि) और अधिकारी पुरुषों (अफसरों) से जासूसों की सुरक्षा करनी चाहिये।

सदैकनायकं राज्यं कुर्यान्न बहुनायकम् ।
नानायकं क्वचिदपि कर्तुमीहेत भूमिपः ॥ ३४१ ॥

राजा को राज्य का स्वामी (उत्तराधिकारी) सदा एक ही बनाना चाहिये क्योंकि बहुत स्वामियों का होना राज्य के लिये अहितकर होता है। और राजा बिना स्वामी के राज्य को रखने की इच्छा न करे।

राजकुले तु बहवः पुरुषा यदि संति हि ।
तेषु ज्येष्ठो भवेद्राजा शेषास्तत्कार्यसाधकाः ॥ ३४२ ॥
गरीयांसो वराः सर्वसहायेभ्योऽभिवृद्धये ।

**राजकुलों में राजा बनाने के योग्यों का निर्देश—**यदि राजकुल में बहुत राज्य पाने के अधिकारी हों तो उनमें जो ज्येष्ठ हो वह राजा बनाने के योग्य होता है। शेष उसके कार्य के सहायक हों। क्योंकि राज्य की वृद्धि के लिये सम्पूर्ण सहायकों की अपेक्षा उनमें ज्येष्ठ ही उत्तम होता है।

ज्येष्ठोपि बधिरः कुष्ठी मूकोऽन्धः षण्ढ एव यः ॥ ३४३ ॥
स राज्यार्हो भवेन्नैव भ्राता तत्पुत्र एव हि ।

४ शु०

:५० शुक्रनीतिः

स्वकनिष्ठोपि ज्येष्ठस्य भ्रातुः पुत्रस्तु राज्यभाक् ॥ ३४४ ॥ यथाऽप्रजस्य चाभावे कनिष्ठा राज्यभागिनः ।

राज्य का उत्तराधिकारी ज्येष्ठ यदि कोढ़ी, गूंगा, अन्धा या नपुंसक हो तो वह राज्य पाने के योग्य नहीं होता है बल्कि उसका छोटा भाई अथवा उसका पुत्र किंवा उसके भाई का पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी होता है जैसे बड़े पुत्र के अभाव में छोटे राज्य के भागी होते हैं।

दायादानामैकमत्यं राज्ञः श्रेयस्करं परम् ॥ ३४५ ॥ पृथग्भावो विनाशाय राज्यस्य च कुलस्य च । अतः स्वभोगसदृशान् दायादान्कारयेन्नृपः ॥ ३४६ ॥ अभ्याहताज्ञः संतुष्येच्छत्र-सिंहासनैरपि ।

दायादों (हिस्सेदारों) का राजा के साथ ऐकमत्य (एक राय होकर रहना) राजा (राज्य) के लिये अत्यन्त कल्याणकारक होता है। और इनका भिन्न २ राय रहना राज्य तथा कुल के लिये विनाशकारक होता है। अतः राजा दायादों (हिस्सेदारों) के लिये अपने समान राजसी ठाट-बाट के रहने के निमित्त गुजारे का प्रबन्ध कर दे और जिसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं होता है, ऐसा राजा केवल छत्र-सिंहासन से सन्तुष्ट हो ।

राज्यविभाजनाच्छ्रेयो न भूपानां भवेत्खलु ॥ ३४७ ॥ अल्पीकृतं विभागेन राज्यं शत्रुborder:जिघृक्षति । -> शत्रुर्जिघृक्षति ।

राज्य का विभाग होने से राजाओं का निश्चय कल्याण नहीं होता है। क्योंकि विभाग करने से राज्य के छोटे हो जाने पर उसे शत्रु लोग लेने की इच्छा करने लगते हैं।

राज्यतुर्यांशदानेन स्थापयेत्तान्समंततः ॥ ३४८ ॥ चतुर्दिक्ष्वथवा देशाधिपान्कुर्यात् सदा नृपः । गोगजाश्वोष्ट्रकोशानामाधिपत्ये नियोजयेत् ॥ ३४९ ॥ माता मातृसमा या च सा नियोज्या महानसे ।

राजा के सम्बन्धी, ज्ञाति तथा बान्धवादिकों का राजा द्वारा निर्धारित कर्तव्यों का निर्देश—राजा अपने राज्य के चतुर्थांश देकर उन सब दायादों को चारों दिशाओं में राज्य के चारों ओर सदा स्थापित करे अथवा उन्हें देशों का अधिपति (गवर्नर) या गो, हाथी, घोड़ा, ऊँट, खजाना इनका अधिपति बनाकर रखे। और माता या माता के समान जो पूज्य स्त्रियां हैं उन्हें पाक-शाला का अधिकार देवे ।

सेनाधिकारे संयोज्या बान्धवाः श्यालकाः सदा ॥ ३५० ॥ स्वदोषदर्शकाः कार्या गुरवः सुहृदश्च ये ।

प्रथमोऽध्यायः ५१

और बान्धव (खानदान के लोग) तथा सांढे के लिये सेवासम्बन्धी अधिकार का प्रदान करे। और जो गुरुजन या मित्र हों उन्हें अपने दोषों को देखने के लिये नियुक्त करे।

वस्त्रालंकारपात्राणां स्त्रियो योज्याः सुदर्शने ॥ ३५१ ॥
स्वयं सर्वे तु विमृशेत्पर्यायेण च मुद्रयेत् ।

वस्त्र, अलंकार तथा बर्तनों की देखभाल करने के लिये स्त्रियों को नियुक्त करे। और सभी कार्यों को पर्याय (पारी-पारी) से स्वयं निरीक्षण करने के बाद अपना मोहर लगा दे। अर्थात् इस कार्य का निरीक्षण हो चुका है इसका मुहर लगावे।

अन्तर्वेश्मनि रात्रौ वा दिवाऽरण्ये विशोधिते ॥ ३५२ ॥
मन्त्रयेन्मन्त्रिभिः सार्धं भाविकृत्यं तु निर्जने ।

रात्रि के समय भलीभाँति देखभाल कर महल के अन्दर और दिन में निर्जन जङ्गल में आगे होने वाले कार्यों के विषय में मन्त्रियों के साथ विचार करे।

सुहृद्भिर्भ्रातृभिः सार्धं सभायां पुत्रबांधवैः ॥ ३५३ ॥
राजकृत्यं सेनपैश्च सभ्याद्यैश्चिन्तयेत्सदा ।

परिषद् की व्यवस्था का निर्देश— राजा सभा के बीच में मित्र, भाई, पुत्र, बान्धव, सेनापति और सभासद् (मेम्बर) गणों के साथ राजकार्य के विषय में सदा विचार करे।

सभायां प्रत्यगर्धस्य मध्ये राजासनं स्मृतम् ॥ ३५४ ॥
दक्षसंस्था वामसंस्था विशेयुः पार्श्वकोष्ठगाः ।

और राजसभा में पश्चिम ओर मध्य में राजा का सिंहासन रहना चाहिये। और उसके पार्श्व के स्थानों में बैठनेवाले लोग दक्षिण तथा वामभाग में बैठें।

पुत्राः पौत्रा भ्रातरश्च भागिनेयाः स्वपृष्ठतः ॥ ३५५ ॥
दौहित्रा दक्षभागात्तु वामसंस्थाः क्रमादिमे ।

पुत्र, पौत्र, भाई और भानजे तथा दौहित्र ये सब सिंहासन के पृष्ठ भाग में दक्षिण और बाएँ तरफ क्रम से बैठें।

पितृव्याः स्वकुलश्रेष्ठाः सभ्याः सेनाधिपास्तथा ॥ ३५६ ॥
स्वाग्रे दक्षिणभागे तु प्राक्संस्थाः पृथगासनाः ।
मातामहकुलश्रेष्ठा मन्त्रिणो बांधवास्तथा ॥ ३५७ ॥
श्वशुराश्चैव श्यालाश्च वामाग्रे चाधिकारिणः ।

चाचा, अपने कुल के श्रेष्ठ सभासद्, सेनापति ये सब सिंहासन के आगे...

५२

शुक्रनीतिः

दक्षिण भाग में पृथक् २ आसनों पर बैठें। नाना के कुल के श्रेष्ठ पुरुष, मन्त्रिगण, बान्धव, श्वशुर, साला ये सब वामभाग में बैठने के अधिकारी हैं।

वामदक्षिणपार्श्वस्थौ जामाता भगिनीपतिः ॥ ३५८ ॥
स्वसदृशः समीपे वा स्वार्द्धासनगतः सुहृत् ।

वाम-दक्षिण भाग में दामाद तथा बहनोई बैठें। अपने समान हैसियतवाले अथवा मित्र सिंहासन के समीप या अर्धभाग के ऊपर बैठें।

दौहित्रभागिनेयानां स्थाने स्युर्दत्तकादयः ॥ ३५९ ॥
भागिनेयाश्च दौहित्राः पुत्रादिस्थानसंश्रिताः ।

दौहित्र तथा भानजों के स्थान में दत्तक आदि बैठें। भानजे तथा दौहित्र आदि पुत्रादि के स्थान पर बैठें।

यथा पिता तथा चार्यः समश्रेष्ठासने स्थितः ॥ ३६० ॥
पार्श्वयोरग्रतः सर्वे लेखका मंत्रिपुष्ठगाः ।

जैसे, पिता वैसे आचार्य्य पूज्य होते हैं अतः उन्हें सिंहासन के समान श्रेष्ठ आसन देना चाहिये। और अग्रभाग में दोनों तरफ मन्त्रियों के पीछे सभी लेखकवर्ग बैठें।

परिचारगणाः सर्वे सर्वेभ्यः पृष्ठसंस्थिताः ॥ ३६१ ॥
स्वर्णदंडधरौ पार्श्वे प्रवेशानतिबोधकौ ।

और सम्पूर्ण परिचार (सेवक) गण सबों के पीछे बैठें। एवं सिंहासन के दोनों पार्श्व (बगल) में सुवर्ण के दण्ड को लिये हुए लोगों के प्रवेश तथा प्रणाम करने की सूचना राजा को देने के लिये दो मनुष्य खड़े रहें।

विशिष्टचिह्नयुप्राजा स्वासने प्रविशेत्सुखम् ॥ ३६२ ॥
सुभूषणः सुवसनः कवची मुकुटान्वितः ।
सिद्धास्त्रनग्नशस्त्रस्सन् सावधानमनाः सदा ॥ ३६३ ॥

**राजा को राजचिह्न रखने का निर्देश—**राजा सदा सावधान-चित्त होकर सुन्दर भूषण, वस्त्र, कवच तथा मुकुट धारण किये हुए, चलाने के लिये प्रस्तुत किये हुये अस्त्र तथा नग्न (म्यान से निकाले हुये) शस्त्र (तलवार) को लिये हुये, विशिष्ट राजचिह्नों से विभूषित होकर सिंहासन पर सुखपूर्वक बैठें।

सर्वस्मादधिको दाता शूरस्त्वं धार्मिको ह्यसि ।
इति वाचं न शृणुयाच्छ्लाघका वंचकास्तु ते ॥ ३६४ ॥
रागाल्लोभाद्भयाद्राज्ञः स्युर्मूका इव मंत्रिणः ।
नताननुमतान्विद्वान्नृपतिः स्वार्थसिद्धये ॥ ३६५ ॥
पृथक्पृथङ्म॒तं तेषां लेखयित्वा ससाधनम् ।
विमृशेत्स्वमतेनैव यत्कुर्याद्बहुसम्मतम् ॥ ३६६ ॥

प्रथमोऽध्यायः ५३

प्रथमोऽध्यायः ५३

राजा के कर्तव्य—और राजा अपनी स्वार्थसिद्धि के लिये 'आप सबसे अधिक दाता, शूर तथा धार्मिक हैं, इस वचन को सुनानेवाले यदि वञ्चक हैं और उनके वचनों को सुनकर यदि किसी के राग, लोभ या भय से मन्त्री लोग मूक हो जायें तो ऐसे लोगों को अनुमत (सच कहनेवाला) न समझे। और उनके मतों को युक्ति (प्रमाण) सहित पृथक् २ लिखाकर अपने मत से विचार करे। और जो बहुसम्मत हो उसे करे (वैसा निर्णय करे)।

गजाश्वरथपश्वादीन् भृत्यान्दासांस्तथैव च ।
संभारान्सैनिकान् कार्यक्षमान्ज्ञात्वा दिने दिने ॥ ३६७ ॥
संरक्षयेत्प्रयत्नेन सुजीर्णान् संत्यजेत्सुधीः ।

बुद्धिमान राजा हाथी, घोडे, रथ, पशु आदि, भृत्य (नौकर) दास (गुलाम), सामग्री, सैनिक इन सबों में जो कार्य के योग्य हों उन्हें समझ कर प्रयत्नपूर्वक उनकी रक्षा करे जो पुराने हों उन्हें प्रतिदिन अलग कर दे।

शतक्रोशभवां वार्तां हरेदेकदिनेन वै ॥ ३६८ ॥
सर्वविद्याकलाभ्यासे शिक्षयेद् वृत्तिपोषितान् ।
समाप्तविद्यं संदृष्ट्वा तत्कार्यं तं नियोजयेत् ॥ ३६९ ॥
विद्याकलोत्तमान्दृष्ट्वा वत्सरे पूजयेच्च तान् ।
विद्याकलानां वृद्धिः स्यात्तथा कुर्यान्नृपः सदा ॥ ३७० ॥

और १०० क्रोश की बातें १ दिन में ही जान ले। और वृत्ति देकर लोगों को सभी प्रकार की विद्याओं तथा कलाओं की शिक्षा दिलावे। और अध्ययन समाप्त हुआ समझकर उन्हें उनके योग्य कार्यों में नियुक्त कर दे। एवं विद्या तथा कला में जो अत्यधिक निपुण हों उनका प्रतिवर्ष आदर-सत्कार करे। इस प्रकार से विद्या तथा कला की वृद्धि जिस भांति से हो वैसा प्रयत्न राजा को सदा करना चाहिये।

पृष्ठाग्रगान्क्रूरवेषान्नतिनीतिविशारदान् ।
सिद्धास्त्रनग्नशस्त्रांश्च भटानारान्नियोजयेत् ॥ ३७१ ॥

राजा अपने आगे-पीछे चलनेवाले ऐसे सैनिक लोगों को पास में नियुक्त करे जो क्रूर वेषवाले, नमन करने एवं नीति में कुशल, सिद्ध (चलाने के लिये प्रस्तुत) अस्त्र तथा नग्न सङ्ग आदि शस्त्रों को धारण किये हों।

पुरे पर्यटयेन्नित्यं गजस्थो रंजयन्प्रजाः ।

राजा हाथी पर बैठकर प्रजा का मनोरञ्जन करता हुआ नगर में नित्य पर्यटन करे।

राजयानारूढितः किं राज्ञा श्वा न समोपि च ॥ ३७२ ॥
शुना समो न किं राजा कविभिर्भाव्यतेऽजसा ।

५४ | शुक्रनीतिः

राजा की सवारी पर चढ़ा हुआ कुत्ता क्या राजा के समान और राजा कुत्ता के समान पण्डितों द्वारा वस्तुतः नहीं समझा जाता है अर्थात् अवश्य समझा जाता है।

अतः स्वबांधवैर्मित्रैः स्वसाम्यप्रापितैर्गुणैः ॥ ३७३ ॥
प्रकृतिभिर्नृपो गच्छेन्न नीचैस्तु कदाचन ।

अतः राजा अपने बान्धव, मित्र तथा गुणों के द्वारा अपनी समता को प्राप्त किये हुये लोग, प्रकृति ( मन्त्री आदि ) के साथ गमन करे, किन्तु कभी भी नीच पुरुषों के साथ गमन न करे।

मिथ्यासत्यसदाचारैर्नीचः साधुः क्रमात्स्मृतः ॥ ३७४ ॥
साधुभ्योऽतिस्वमृदुत्वं नीचाः संदर्शयन्ति हि ।

क्रम से मिथ्या के द्वारा व्यक्ति नीच तथा सत्य और सदाचार द्वारा साधु समझा जाता है। और साधु की अपेक्षा नीच लोग अपनी मृदुता को ज्यादा दिखाते हैं।

ग्रामान्पुराणि देशांश्च स्वयं संवीक्ष्य वत्सरे ॥ ३७५ ॥
अधिकारिगणैः काश्च रंजिताः काश्च कर्षिताः ।
प्रजास्तासां तु वृत्तेन व्यवहारं विचिन्तयेत् ॥ ३७६ ॥
न भृत्यपक्षपाती स्यात्प्रजापक्षं समाश्रयेत् ।

राजा को प्रतिवर्ष राज्य में भ्रमण कर देश के अधिकारियों के निरीक्षण का निर्देश— प्रतिवर्ष ग्राम, नगर तथा देश का स्वयं निरीक्षण करके अधिकारियों ने किन प्रजाओं का मनोरंजन किया और किन लोगों को कष्ट पहुँचाया है, इसमें प्रजासम्बन्धी जो सत्य व्यवहार हो उसका विचार करे। अधिकारी भृत्यों का पक्षपाती न होकर प्रजा का पक्षपाती होना राजा के लिये उचित है।

प्रजाशतेन संद्विष्टं संत्यजेदधिकारिणम् ॥ ३७७ ॥
अमात्यमपि संवीक्ष्य सकृदन्यायगामिनम् ।
एकांते दंडयेत्स्पष्टमभ्यासागस्कृतं त्यजेत् ॥ ३७८ ॥
अन्यायवर्तिनां राज्यं सर्वस्वं च हरेन्नृपः ।

यदि १०० प्रजा मिलाकर किसी अधिकारी के विरुद्ध आवेदन पत्र भेजें तो उस ( अधिकारी ) को राजा निकाल दे। और यदि मन्त्री एक बार अन्याय करनेवाला दिखाई दे तो उसे एकान्त में दण्ड दे। और यदि बारंबार अपराध करनेवाला हो तो उसे सबके समक्ष दण्ड दे और निकाल दे। अन्यायी अधिकारियों के राज्य तथा सर्वस्व को हर ले।

जितानां विषये स्थाप्यं धर्माधिकरणं सदा ॥ ३७९ ॥
भृतिं दद्यान्निर्जितानां तच्चारित्र्यानुरूपतः ।

प्रथमोऽध्यायः ५५

जीते हुये राजाओं के देश में सदा अपना न्यायालय स्थापित करे अर्थात् अपना शासन रखे। विजित राजा के रहन-सहन के अनुरूप भरण-पोषण के लिये वेतन का प्रबन्ध कर दे।

स्वानुरक्तां सुरूपां च सुवस्त्रां प्रियवादिनीम् ॥ ३८० ॥
सुभूषणां सुसुशुद्धां प्रमदां शयने भजेत् ।
यामद्वयं शयानो हि त्वत्यन्तं सुखमश्नुते ॥ ३८१ ॥

अपने में अनुराग रखनेवाली, सुन्दर रूपवती, अच्छे वस्त्र पहने हुये; प्रियभाषिणी, सुन्दर भूषणों से युक्त, शुद्ध आचरणवाली ऐसी स्त्री के साथ संभोग करे। दो प्रहर तक सोनेवाला राजा अत्यन्त सुख भोगता है।

न संत्यजेच्च स्वस्थानं नीत्या शत्रुगणं जयेत् ।
स्थानभ्रष्टा नो विभान्ति दंताः केशा नखा नृपाः ॥ ३८२ ॥

राजा अपने स्थान का परित्याग न करे किन्तु नीति से शत्रुगण को जीते क्योंकि स्थान से भ्रष्ट हुये दांत, केश नख तथा राजा नहीं सुशोभित होते हैं।

संश्रयेद् गिरिदुर्गाणि महापदि नृपः सदा ।
तदाश्रयाद्दस्युवृत्त्या स्वराज्यं तु समाहरेत् ॥ ३८३ ॥

बड़ी भारी आपत्ति आपड़ने पर राजा सदा पहाड़ी किलों का आश्रय ले। उसके आश्रय में रहकर दस्यु-वृत्ति (डाकूजीवन) से अपने राज्य को पुनः ले ले।

विवाहदानयज्ञार्थं विनाऽप्यष्टांशशेषितम् ।
सर्वतस्तु हरेद्दस्युरसतामखिलं धनम् ॥ ३८४ ॥

दस्यु राजा विवाह, दान, यज्ञ आदि के लिये अष्टमांश धन छोड़कर शेष को सबसे हरण करे और दुर्जनों के सम्पूर्ण धन को लूट ले।

नैकत्र संवसेन्नित्यं विश्वसेन्नैव कं प्रति ।
सदैव सावधानः स्यात्प्राणनाशं न चिन्तयेत् ॥ ३८५ ॥
क्रूरकर्मा सदोद्युक्तो निर्घृणो दस्युकर्मसु ।
विमुखः परदारेषु कुलकन्याप्रदूषणे ॥ ३८६ ॥

और दस्युवृत्ति राजा एक जगह स्थिर होकर निवास न करे, और किसी का विश्वास न करे। सदैव सावधान होकर प्राणनाश का परवाह न करे, क्रूर कर्म करनेवाला, सदा दस्युओं के कर्म करने में उद्योग युक्त, दयाहीन, परत्रियों की तरफ उन्मुख नहीं होनेवाला, एवं कुलीन कन्याओं को नहीं भ्रष्ट करनेवाला हो।

पुत्रवत्पालिता भृत्याः समये शत्रुतां गताः ।
न दोषः स्यात्प्रयत्नस्य भागधेयं स्वयं हि तत् ॥ ३८७ ॥

५६ | शुक्रनीतिः

दृष्ट्वा सुविफलं कर्म तपस्तप्त्वा दिवं व्रजेत् ।

राजा के पारलौकिक कार्य का निर्देश—पुत्र के समान पाले हुये नौकर भी समय विपरीत होने पर शत्रुता कर बैठते हैं इसमें प्रयत्न का दोष नहीं है किन्तु भाग्य की बात है । पुरुषार्थ कर्म को इस भांति से विफल हुआ देखकर तपस्या करके स्वर्गलोकगामी बने ।

उक्तं समासतो राजकृत्यं मिश्रेऽधिकं ब्रुवे ॥ ३८८ ॥ ( अध्यायः प्रथमः प्रोक्तो राजकार्यनिरूपकः ) इति शुक्रनीतौ राजकृत्याधिकारो नाम प्रथमोऽध्यायः ॥

राज्य-सम्बन्धी कृत्यों का संक्षेप से इस प्रकार वर्णन किया । मिश्र अध्याय में इसका विस्तार से वर्णन करेंगे । ( यह राजकार्य का निरूपण करनेवाला प्रथम अध्याय कहा गया ) ।

इस प्रकार शुक्रनीति में राजकृत्याधिकार-नामक प्रथम अध्याय समाप्त हुआ ।


द्वितीयोऽध्यायः

यद्यप्यल्पतरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम् ।
पुरुषेणासहायेन किमु राज्यं महोदयम् ॥ १ ॥

एकाकी राजा का राज्यकार्य करने की दुष्करता का निर्देश— यद्यपि कोई कार्य छोटा से छोटा भी हो तथापि उसे सहायक के बिना अकेले कोई पुरुष सहज में नहीं कर पाता है फिर महान अभ्युदय वाला राज्यकार्य अकेले चलाना कैसे सहज हो सकता है अर्थात् असंभव है।

सर्वविद्यासु कुशलो नृपो ह्यपि सुमन्त्रवित् ।
मंत्रिभिस्तु विना मंत्रं नैकोऽर्थं चिंतयेत्क्वचित् ॥ २ ॥

बिना मन्त्रियों के सलाह लिये व्यवहार-निर्णय का निषेध— सभी विद्याओं में कुशल एवं भलीभांति मन्त्रणा (विचार) करनेवाला भी अकेला राजा मन्त्रियों के साथ बिना सलाह किये कभी किसी व्यवहार के विषय में कोई निर्णय न करे।

सभ्या धकारिप्रकृतिसभासत्सु मते स्थितः ।
सर्वदा स्यान्नृपः प्राज्ञः स्वमते न कदाचन ॥ ३ ॥

अच्छे सहायकों से युक्त राजा की श्रेष्ठता का निर्देश— समझदार राजा सदा सभ्य अधिकारी पुरुष (ऑफिसर), प्रकृति (मन्त्री आदि), तथा कौंसिल के मेम्बरों की रायपर स्थित रहे। कभी भी अपनी ही राय पर स्थिर न रहे अर्थात् अपने मनसे कोई कार्य न करे।

प्रभुः स्वातन्त्र्यमापन्नो ह्यनर्थायैव कल्पते ।
भिन्नराष्ट्रो भवेत्सद्यो भिन्नप्रकृतिरेव च ॥ ४ ॥

स्वतन्त्रता को प्राप्त हुआ (मनमानी करनेवाला) राजा (स्वामी) अनर्थ करने में समर्थ होता है, उससे राज्य तत्काल छिन्न-भिन्न हो जाता है और उसका प्रकृति (मन्त्री आदि) वर्ग अलग हो जाता है।

पुरुषे पुरुषे भिन्नं दृश्यते बुद्धिवैभवम् ।
आप्तवाक्यैरनुभवैरागमैरनुमानतः ॥ ५ ॥
प्रत्यक्षेण च सादृश्यैः सादृशैश्च छलैर्रबलैः ।
वैचित्र्यं व्यवहाराणामौन्नत्यं गुरुलाघवैः ॥ ६ ॥
नहि तत्सकलं ज्ञातुं नरेणैकेन शक्यते ।
अतः सहायान्वरयेद्राजा राज्यविवृद्धये ॥ ७ ॥
प्रत्येक पुरुष में बुद्धि का वैभव (चमत्कार) भिन्न २ दिखाई पड़ता है

५८ | शुक्रनीतिः

और यथार्थ ( उचित ) कहनेवाले पुरुषों की बातों से एवं आगम ( नीति-शास्त्रादि शब्द प्रमाण ), अनुमान, प्रत्यक्ष, सादृश्य ( उपमान ) इन प्रमाणों से, साहस, छल बल एवं गुरुता तथा लघुता से जो व्यवहारों में विचित्रता तथा महत्ता पाई जाती है उन सबों का ज्ञान प्राप्त करना अकेले एक मनुष्य से संभव नहीं हो सकता है अतः राजा राज्य की उन्नति के लिये ऐसे सहायकों को रखना स्वीकार करे।

कुलगुणशीलवृद्धाञ्शूरान् भक्तानप्रियंवदान् ।
हितोपदेशकान्क्लेशसहान् धर्मरतान्सदा ॥ ८ ॥
कुमार्गगं नृपमपि बुद्धयोद्धर्तुं क्षमाञ्छुचीन् ।
निर्मत्सरान्कामक्रोधलोभहीनान्निरालसान् ॥ ९ ॥

जो कुल, गुण और शील से बड़े हों और शूर, राजभक्त, प्रियभाषी, हितकारक उपदेश देनेवाले, क्लेश सहनेवाले, सदा धर्म पर चलनेवाले, कुमार्ग-गामी राजा को अपनी बुद्धि बल से कुमार्ग से हटाने में समर्थ, पवित्र आचरण तथा विचार वाले, मत्सरता, काम, क्रोध, लोभ और आलस्य से हीन हों।

हीयते कुसहायेन स्वधर्माद्राज्यतो नृपः ।
कुकर्मणा प्रनष्टास्तु दितिजाः कुसहायतः ॥ १० ॥
नष्टा दुर्योधनाद्यास्तु नृपाः शूरा बलाधिकाः ।
निरभिमानो नृपतिः सुसहायो भवेदतः ॥ ११ ॥

**बुरे सहायकों से राजा की हानि का निर्देश—**कुत्सित सहायकों से राजा अपने धर्म तथा राज्य से च्युत हो जाता है। जैसे दैत्य लोग और दुर्योधनादि राजा लोग शूर एवं अधिक बलशाली होते हुये भी कुत्सित कर्म करने तथा कुत्सित सहायकों का साथ करने से नष्ट हो गये अतः राजा को अभिमान-रहित तथा अच्छे सहायकों से युक्त होना चाहिये।

युवराजोऽमात्यगणो भुजावेतौ महीभुजः ।
तावेव नयने कर्णौ दक्षसव्यौ क्रमात्स्मृतौ ॥ १२ ॥

**युवराजादि राजा के अङ्ग हैं इसका निर्देश—**युवराज तथा मन्त्रिगण ये दोनों क्रम से राजा के दक्षिण तथा वाम अङ्ग के दोनों बाहु, नेत्र तथा कर्ण माने गये हैं।

बाहुकर्णाक्षिहीनः स्याद्विना ताभ्यामतो नृपः ।
योजयेच्चिन्तयित्वा तौ महानाशाय चान्यथा ॥ १३ ॥

इसलिये राजा उन दोनों ( युवराज तथा मन्त्रिगण ) के बिना बाहु, कर्ण तथा नेत्र से हीन समझा जाता है। अतः इन दोनों की नियुक्ति सोच-समझ-

द्वितीयोऽध्यायः ५६

कर करे। अन्यथा (उचित नियुक्ति न होने से) ये दोनों भयङ्कर रूप से नाशकारी होते हैं।

मुद्रां विनाऽखिलं राजकृत्यं कर्तुं क्षमं सदा ।
कल्पयेद्युवराजार्थमौरसं धर्मपत्निजम् ॥ १४ ॥
स्वक्रनिष्ठं पितृव्यं वाऽनुजं वाऽग्रजसंभवम् ।
पुत्रं पुत्रीकृतं दत्तं यौवराज्येऽभिषेचयेत् ॥ १५ ॥

युवराज के कार्य तथा अभिषेकार्थ युवराज के अधिकारियों का निर्देश—
जो राजा का मोहर लगाने के अतिरिक्त सभी राजकार्य को सदा करने के लिये समर्थ होता है, ऐसे युवराज-पद के लिये धर्मपत्नी में उत्पन्न औरस (साक्षात् अपना) पुत्र चुनना चाहिये अभाव में क्रम से अपना छोटा भाई, चाचा, छोटा भाई और बड़े भाई का पुत्र, पुत्रीकृत (जिसको पुत्र के समान मान लिया जाय) पुत्र अथवा दत्तक पुत्र को चुनकर युवराज नियुक्त करना चाहिये।

क्रमादभावे दौहित्रं स्वस्रीयं वा नियोजयेत् ।
स्वहितायापि मनसा नैतान्संकर्षयेत्क्वचित् ॥ १६ ॥

क्रम से पूर्वोक्त के अभाव में दौहित्र (लड़की का लड़का) या भानजा को युवराज बनाना चाहिये और अपने हित के लिये कभी मन से भी इन सबों को कष्ट न पहुँचाना चाहिये।

स्वधर्मनिरताञ्छूरान् भक्तान्नीतिमतः सदा ।
संरक्षयेद्राजपुत्रान् बालानपि सुयत्नतः ॥ १७ ॥
लोलुभ्यमानास्तेऽर्थेषु हन्युरेनमरक्षिताः ।
रक्ष्यमाणा यदिच्छिद्रं कथंचित्प्राप्नुवन्ति ते ॥ १८ ॥
सिंहशावा इव घ्नन्ति रक्षितारं द्विपं द्रुतम् ।
राजपुत्रा मदोद्भूता गजा इव निरंकुशाः ॥ १९ ॥
पितरं चापि निघ्नन्ति भ्रातरं स्वितरं न किम् ।
मूर्खो बालोऽपीच्छति स्म स्वाम्यं किं नु पुनर्युवा ॥ २० ॥

और स्वधर्म में निरत, शूर, राजभक्त, नीतिशास्त्रज्ञ राजपुत्रों की भलीभाँति सदा रक्षा (रखवाली) करे चाहे वे बालक हों तो भी उनकी विशेष यत्न से रक्षा (रखवाली) करे अर्थात् राजा इन से अपनी प्राणरक्षा करता रहे क्योंकि यद्यपि इनकी रक्षा भलीभाँति की जा रही है तो भी यदि ये किसी प्रकार का छिद्र (मौका) पा जाते हैं और उस समय उनके ऊपर किसी का पहरा नहीं रहता है तो राज्य के लोलुप होने से रक्षक राजा को मार डालते हैं जैसे सिंह के बच्चे रक्षक हाथी को भी शीघ्र मार डालते हैं। और मद से मतवाले निरंकुश हाथी के समान राजपुत्र जब पिता को या भाई को भी मार डालते

६० | शुक्रनीतिः

हैं तब इतर को क्यों नहीं मारेंगे अर्थात् अवश्य मारेंगे। क्योंकि मूर्ख बालक भी यदि स्वामी (राजा) बनना चाहता है तो फिर युवा (जवान) के विषय में क्या कहना है अर्थात् वह तो अवश्य चाहेगा ही।

स्वात्यन्तसन्निकर्षेण राजपुत्रांस्तु रक्षयेत् । सद्भृत्यैश्चापि तत्स्वान्तं छलैर्ज्ञात्वा सदा स्वयम् ॥ २१ ॥

और राजा अपने अत्यन्त सन्निकट में राजपुत्रों को रखते हुये विश्वासी नौकरों के द्वारा, किसी ब्याज से या स्वयं उनके हार्दिक भावों को सदा जानकर तदनुसार उनकी रक्षा का प्रबन्ध करे।

सुनीतिशास्त्रकुशलान् धनुर्वेदविशारदान् । क्लेशसहांश्च वाग्दण्डपारुष्यानुभवान् सदा ॥ २२ ॥ शौर्येयुद्धरतान् सर्वकलाविद्याविदोऽजसा । सुविनीतान्प्रकुर्वीत ह्यमात्याद्यैर्नृपः सुतान् ॥ २३ ॥

**दुराचारी राजपुत्रों में आचार-स्थापना का निर्देश—**और राजा मन्त्री आदि के द्वारा अपने पुत्रों को सुन्दर नीतिशास्त्र में कुशल, धनुर्वेद विद्या में विशारद, सदा क्लेश सहन करने में समर्थ, वाग्दण्ड की कठोरता का अनुभव करनेवाला, वीरता के साथ युद्ध करने में निरत, वस्तुतः सम्पूर्ण कलाओं तथा विद्याओं का जाननेवाला, अत्यन्त शिक्षित अथवा विनम्र बनावे।

सुवस्त्राद्यैर्भूषयित्वा लालयित्वा सुक्रीडनैः । अर्हयित्वाऽऽसनाद्यैश्च पालयित्वा सुभोजनैः ॥ २४ ॥ कृत्वा तु यौवराज्यार्हान् यौवराज्येऽभिषेचयेत् । अविनीतकुमारं हि कुलमाशु विनश्यति ॥ २५ ॥

और उन्हें सुन्दर वस्त्रादिकों से अलंकृत, अच्छे खेलों से लालित, अच्छे आसनों पर बैठाने से सम्मानित करते हुये अच्छे २ भोजनों से उनका पालन-पोषण करके युवराज-पद के योग्य हो जाने पर उन्हें युवराज बनावे क्योंकि जिस राजवंश के युवराज अशिक्षित होते हैं वह शीघ्र नष्ट हो जाता है।

राजपुत्रः सुदुर्वृत्तः परित्यागं हि नार्हति । क्लिश्यमानः स पितरं परानाश्रित्य हन्ति हि ॥ २६ ॥

और अत्यन्त दुर्वृत्त (दुष्ट आचरणवाला) भी राजपुत्र परित्याग करने के योग्य नहीं होता है क्योंकि क्लेश पाने पर वह शत्रुओं का सहारा लेकर अपने पिता राजा को मार डालता है।

व्यसने सज्जमानं तं क्लेशयेद् व्यसनाश्रयैः । दुष्टं गजमिवोद्वृत्तं कुर्वीत सुखबन्धनम् ॥ २७ ॥

यदि कोई राजकुमार द्यूत आदि व्यसन में फंस जाय तो उस व्यसन के

द्वितीयोऽध्यायः

६१

आश्रयदाताओं के द्वारा उसको क्लेश पहुंचाये पश्चात् किसी भांति समझा-बुझाकर ठीक रास्ते पर लाये, जैसे उच्छृङ्खल दुष्ट हाथी को क्लेश पहुँचाकर सुखपूर्वक बांधा जाता है।

सुदुर्वृत्तांस्तु दायादा हन्तव्यास्ते प्रयत्नतः ।
व्याघ्रादिभिः शत्रुभिर्वा छले राष्ट्रविवृद्धये ॥ २८ ॥
अतोऽन्यथा विनाशाय प्रजाया भूपतेश्च ते ।

जो राजा के दायादवर्गवाले (वंश के लोग) अत्यन्त दुष्ट आचरण करने-वाले हों उन्हें प्रयत्नपूर्वक व्याघ्रादि, शत्रु या छल के द्वारा राज्य की उन्नति के लिये मार डालना चाहिये। इससे अन्यथा करनेपर वे प्रजा तथा राजा के विनाश के कारण होते हैं।

तोषयेयुर्नृपं नित्यं दायादाः स्वगुणैः परः ॥ २९ ॥
भ्रष्टा भवन्त्यन्यथा ते स्वभागाज्जीवितादपि ।

अतः दायादवर्ग के लोग श्रेष्ठ अपने गुणों से राजा को सन्तुष्ट रखें अन्यथा वे अपने हिस्से तथा जीवन से विहीन हो जाते हैं।

स्वसापिण्ड्यविहीना ये ह्यन्योत्पन्ना नराः खलु ॥ ३० ॥
मनसापि न मन्तव्या दत्ताद्याः स्वसुता इति ।
तद्दत्तकत्वमिच्छन्ति दृष्ट्वा यं धनिकं नरम् ॥ ३१ ॥
स्वकुलोत्पन्नकन्यायाः पुत्रस्तेभ्यो वरो ह्यतः ।

जो अपने सापिण्ड्य से विहीन (अपने वंश का नहीं) होकर दूसरे वंश में उत्पन्न हुये मनुष्य दत्तादिपुत्र होते हैं उन्हें मन से नहीं समझना चाहिये कि ये मेरे पुत्र हैं। क्योंकि वे (दत्तादिकपुत्र) जिसको धनी पुरुष देखते हैं उसके दत्तक पुत्र बनने की इच्छा करते हैं अतः उनकी अपेक्षा अपने कुल में उत्पन्न कन्या का पुत्र (दौहित्र) अच्छा होता है।

अङ्गादङ्गात्सम्भवति पुत्रवद् दुहिता नृणाम् ॥ ३२ ॥
पिण्डदाने विशेषो न पुत्रदौहित्रयोस्ततः ।

क्योंकि पुत्र की भांति मनुष्यों के अङ्ग-अङ्ग से कन्या भी उत्पन्न होती है। अतः पिण्डदान में पुत्र और दौहित्र में कोई अन्तर नहीं है अर्थात् दोनों से तृप्ति होती है।

भूप्रजापालनार्थं हि भूपो दत्तं तु पालयेत् ॥ ३३ ॥
नृपः प्रजापालनार्थं सधनश्चेन्न चान्यथा ।

और राजा पृथ्वी तथा प्रजाओं के पालनार्थ दत्तकपुत्र का पालन करे। क्योंकि वह प्रजापालन तथा धन (राज्य) देने के लिये ही दत्तक पुत्र लेता है अन्यथा उसे कोई आवश्यकता नहीं है।