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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 136

:५० शुक्रनीतिः

स्वकनिष्ठोपि ज्येष्ठस्य भ्रातुः पुत्रस्तु राज्यभाक् ॥ ३४४ ॥ यथाऽप्रजस्य चाभावे कनिष्ठा राज्यभागिनः ।

राज्य का उत्तराधिकारी ज्येष्ठ यदि कोढ़ी, गूंगा, अन्धा या नपुंसक हो तो वह राज्य पाने के योग्य नहीं होता है बल्कि उसका छोटा भाई अथवा उसका पुत्र किंवा उसके भाई का पुत्र राज्य का उत्तराधिकारी होता है जैसे बड़े पुत्र के अभाव में छोटे राज्य के भागी होते हैं।

दायादानामैकमत्यं राज्ञः श्रेयस्करं परम् ॥ ३४५ ॥ पृथग्भावो विनाशाय राज्यस्य च कुलस्य च । अतः स्वभोगसदृशान् दायादान्कारयेन्नृपः ॥ ३४६ ॥ अभ्याहताज्ञः संतुष्येच्छत्र-सिंहासनैरपि ।

दायादों (हिस्सेदारों) का राजा के साथ ऐकमत्य (एक राय होकर रहना) राजा (राज्य) के लिये अत्यन्त कल्याणकारक होता है। और इनका भिन्न २ राय रहना राज्य तथा कुल के लिये विनाशकारक होता है। अतः राजा दायादों (हिस्सेदारों) के लिये अपने समान राजसी ठाट-बाट के रहने के निमित्त गुजारे का प्रबन्ध कर दे और जिसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं होता है, ऐसा राजा केवल छत्र-सिंहासन से सन्तुष्ट हो ।

राज्यविभाजनाच्छ्रेयो न भूपानां भवेत्खलु ॥ ३४७ ॥ अल्पीकृतं विभागेन राज्यं शत्रुborder:जिघृक्षति । -> शत्रुर्जिघृक्षति ।

राज्य का विभाग होने से राजाओं का निश्चय कल्याण नहीं होता है। क्योंकि विभाग करने से राज्य के छोटे हो जाने पर उसे शत्रु लोग लेने की इच्छा करने लगते हैं।

राज्यतुर्यांशदानेन स्थापयेत्तान्समंततः ॥ ३४८ ॥ चतुर्दिक्ष्वथवा देशाधिपान्कुर्यात् सदा नृपः । गोगजाश्वोष्ट्रकोशानामाधिपत्ये नियोजयेत् ॥ ३४९ ॥ माता मातृसमा या च सा नियोज्या महानसे ।

राजा के सम्बन्धी, ज्ञाति तथा बान्धवादिकों का राजा द्वारा निर्धारित कर्तव्यों का निर्देश—राजा अपने राज्य के चतुर्थांश देकर उन सब दायादों को चारों दिशाओं में राज्य के चारों ओर सदा स्थापित करे अथवा उन्हें देशों का अधिपति (गवर्नर) या गो, हाथी, घोड़ा, ऊँट, खजाना इनका अधिपति बनाकर रखे। और माता या माता के समान जो पूज्य स्त्रियां हैं उन्हें पाक-शाला का अधिकार देवे ।

सेनाधिकारे संयोज्या बान्धवाः श्यालकाः सदा ॥ ३५० ॥ स्वदोषदर्शकाः कार्या गुरवः सुहृदश्च ये ।