शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः ४९
में रहनेवाली स्त्रियों का जो विचार हों, उन्हें जासूसों से सुने। और रात्रि में तथा संकट-काल उपस्थित होने पर सावधान-चित्त होकर शस्त्रास्त्र को धारण करे और जो जासूसों से सुने उसे छिपे भी।
असत्यवादिनं गूढचारं नैव च शास्ति यः ॥ ३३७ ॥
स नृपो म्लेच्छ इत्युक्तः प्रजाप्राणधनापहः ।
झूठ बोलनेवाले जासूस को जो राजा दण्ड नहीं देता है वह प्रजाओं के प्राण तथा धन को अपहरण करनेवाला 'म्लेच्छ' कहलाता है।
वर्णि-तपस्वि-संन्यासि-नीचसिद्धस्वरूपिणम् ॥ ३३८ ॥
प्रत्यक्षेण छलेनैव गूढचारं विशोधयेत् ।
ब्रह्मचारी, तपस्वी, संन्यासी तथा नीच, सिद्ध के रूपको धारण करनेवाले जासूस की प्रगट तथा गुप्त रूप से जांच करे अर्थात् वह सच कहता है या झूठ।
विना तच्छोधनात्तत्त्वं न जानाति च नाप्यते ॥ ३३९ ॥
अशोधकन्नृपान्नैव बिभेत्यनृतवादने ।
प्रकृतिभ्योऽधिकृतेभ्यो गूढचारं सुरक्षयेत् ॥ ३४० ॥
बिना उसका जांच किये तत्त्व (असलियत) का ज्ञान अथवा प्राप्ति नहीं होती है। जांच न करनेवाले राजा से झूठ बोलने में कोई जासूस नहीं डरता है। और प्रकृति (मन्त्री आदि) और अधिकारी पुरुषों (अफसरों) से जासूसों की सुरक्षा करनी चाहिये।
सदैकनायकं राज्यं कुर्यान्न बहुनायकम् ।
नानायकं क्वचिदपि कर्तुमीहेत भूमिपः ॥ ३४१ ॥
राजा को राज्य का स्वामी (उत्तराधिकारी) सदा एक ही बनाना चाहिये क्योंकि बहुत स्वामियों का होना राज्य के लिये अहितकर होता है। और राजा बिना स्वामी के राज्य को रखने की इच्छा न करे।
राजकुले तु बहवः पुरुषा यदि संति हि ।
तेषु ज्येष्ठो भवेद्राजा शेषास्तत्कार्यसाधकाः ॥ ३४२ ॥
गरीयांसो वराः सर्वसहायेभ्योऽभिवृद्धये ।
**राजकुलों में राजा बनाने के योग्यों का निर्देश—**यदि राजकुल में बहुत राज्य पाने के अधिकारी हों तो उनमें जो ज्येष्ठ हो वह राजा बनाने के योग्य होता है। शेष उसके कार्य के सहायक हों। क्योंकि राज्य की वृद्धि के लिये सम्पूर्ण सहायकों की अपेक्षा उनमें ज्येष्ठ ही उत्तम होता है।
ज्येष्ठोपि बधिरः कुष्ठी मूकोऽन्धः षण्ढ एव यः ॥ ३४३ ॥
स राज्यार्हो भवेन्नैव भ्राता तत्पुत्र एव हि ।
४ शु०