शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः ४५
मनसापि न कुर्व्वन्तु स्वामिद्रोहं तथैव च ।
अपने धर्म की हानि, झूठ बोलना, परस्त्री-सम्भोग, झूठी गवाही, झूठा लेख, राजा से छिपाकर किसी वस्तु का लेना, निर्धारित कर से अधिक लेना, चोरी, साहस के कार्य (डाका आदि), और स्वामी के साथ द्रोह, इन सब कार्यों को मनसे भी नहीं करना चाहिये ।
भृत्या शुल्केन भागेन वृद्ध्या दर्पबलाच्छलात् ॥ ३०८ ॥
आधर्षणं न कुर्व्वन्तु यस्य कस्यापि सर्व्वदा ।
परिमाणोन्मानमानं धार्य्यं राजविमुद्रितम् ॥ ३०९ ॥
वेतन, चुंगी, भाग (कर या अंश), वृद्धि (सूद), दर्प, बल, छल इनके द्वारा सदा चाहे जो हो किसी का भी कभी दबाकर पीड़ा नहीं पहुँचानी चाहिये । और परिमाण (बटखरा तौलने का), उन्मान (नापने का माना, सेई, द्रोण आदि) इनका मान राजमुद्रा से युक्त अर्थात् (राज-संमत) रखना चाहिये ।
गुणसाधनसंदक्षा भवन्तु निखिला जनाः ।
साहसाधिकृते दद्युर्विगृह्याततायिनम् ॥ ३१० ॥
उत्सृष्टाऽवृषभाद्या यैस्तैस्ते धार्याः सुयंत्रिताः ।
संपूर्ण जन गुणों के साधन (गुण-सम्पादन) में अच्छी तरह से निपुण हों । और आततायियों (अपराधियों) को पकड़ कर साहस के अधिकारी (पुलिस) के अधीन कर देवे । और जिन्होंने बैल आदि छोड़ दिये हैं वे उन्हें भलीभांति बांधकर रक्खें ।
इति मच्छासनं श्रुत्वा येऽन्यथा वर्त्तयन्ति तान् ॥ ३११ ॥
विनिशिष्यामि दण्डेन महता पापकारकान् ॥
इति प्रबोधयेन्नित्यं प्रजाः शासनडिंडिमैः ॥ ३१२ ॥
ऐसी मेरी राजाज्ञा को सुनकर भी जो लोग उससे अन्यथा आचरण करते हैं, ऐसे उन पापियों को मैं भारी से भारी दण्ड से दण्डित करूंगा। ऐसी प्रजाओं को राजाज्ञा सूचनार्थ ढिंढोरा पीटकर नित्य सूचित करावे ।
लिखित्वा शासनं राजा धारयेत चतुष्पथे ।
सदा चोद्यतदण्डः स्यादसाधुषु च शत्रुपु ॥ ३१३ ॥
राजाओं के कर्तव्य का निर्देश— और राजा इस राजाज्ञा को लिखकर चौराहे पर टंगा देवे एवं दुष्ट तथा शत्रुजनों के लिये सदा दण्ड देने को उद्यत रहे ।
प्रजानां पालनं कार्य्यं नीतिपूर्वं नृपेण हि ।
मार्गसंरक्षणं कुर्यान्नृपः पान्थसुखाय च ॥ ३१४ ॥