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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४६ शुक्रनीतिः

पान्थप्रपीडका ये ये हंतव्यास्ते प्रयत्नतः ।

राजा को नीतिपूर्वक प्रजा-पालन करना चाहिये । और यात्रियों के सुख के लिये मार्ग की रक्षा ( मरम्मत ) करनी चाहिये एवं यात्रियों को पीडा ( लूट-मार ) पहुँचाने वाले जो हों उन्हें प्रयत्नपूर्वक नष्ट करना चाहिये ।

ग्रामस्य द्वादशांशेन ग्रामपान् संनियोजयेत् ॥ ३१५ ॥
त्रिभिरंशैर्बलं धार्यं दानमर्द्धांशकेन च ।
अर्धांशेन प्रकृतयो ह्यर्धांशेनाधिकारिणः ॥ ३१६ ॥
अर्द्धाशेनात्मभोगश्च कोशोऽशेन स रच्यते ।

राजा को ग्राम के आय के १२ वाँ भाग देकर ग्रामरक्षकों की नियुक्ति करनी चाहिये और अपने आय के ३ भागों से सेना का खर्च चलाना चाहिये, आधे भाग से दान-कार्य, आधे भाग से दीवान आदि, आधे भाग से अधिकारी ( अफसर ) पुरुष, आधे भाग से अपना खर्च, १ भाग से कोश की वृद्धि, का कार्य चलाना चाहिये ।

आयस्यैवं षड्विभागैर्व्ययं कुर्यात्तु वत्सरे ॥ ३१७ ॥
सामन्तादिषु धर्मोऽयं न न्यूनस्य कदाचन ।

इस प्रकार से राजा आय के ६ भाग करके उनसे वर्ष भर का कार्य चलावे अर्थात् उक्त कार्यों में तदनुसार व्यय करे । यह धर्म सामन्त आदि-संज्ञक राजाओं के लिये है, उनसे न्यून के लिये कभी नहीं है ।

राज्यस्य यशसः कीर्तेर्धनस्य च गुणस्य च ॥ ३१८ ॥
प्राप्तस्य रक्षणेऽन्यस्य हरणेऽनुद्यमोपि च ।
संरक्षणे संहरणे सुप्रयत्नो भवेत्सदा ॥ ३१९ ॥
शौर्यपांडित्यवक्तृत्वं दातृत्वं न त्यजेत्कचित् ।

राज्य, यश, कीर्त्ति, धन और गुण इनके पाने पर उनकी रक्षा करने में तथा दूसरे के राज्यादि लेने में यत्न करना चाहिये । और इन सबों की भली प्रकार से रक्षा तथा लेने में अधिक प्रयत्नशील सदा होना चाहिये ।

बलं पराक्रमं नित्यमुत्थानं चापि भूमिपः ॥ ३२० ॥

और शूरता, पण्डिताई, वक्तृता, दानशीलता, बल, पराक्रम, नित्य उत्थान ( चढ़ाई ), इन सबों को राजा कभी न छोड़े ।

समितौ स्वात्मकार्ये वा स्वामिकार्ये तथैव च ।
त्यक्त्वा प्राणभयं युध्येत्स शूरस्त्वविशंकितः ॥ ३२१ ॥

निःशङ्क होकर जो युद्ध में अपने वा स्वामी के हित के लिये प्राण जाने के भय को त्याग कर युद्ध करता है वही शूर कहलाता है ।

पक्षं संत्यज्य यत्नेन बालस्यापि सुभाषितम् ।