शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः ४७
गृह्णाति धर्मतत्त्वं च व्यवस्यति स पण्डितः ॥ ३२२ ॥
जो पक्षपात (दुराग्रह) को छोड़कर बालकों की कही हुई अच्छी बातों को ग्रहण करता है और धर्मतत्त्व का निश्चय करता है, वही पण्डित कहलाता है ।
राज्ञोपि दुर्गुणान्वक्ति प्रत्यक्षमविशङ्कितः ।
स वक्ता गुणतुल्यांस्तान्न प्रस्तौति कदाचन ॥ ३२३ ॥
जो राजा के सामने ही निःशङ्क होकर उसके दुर्गुणों की निन्दा करता है नकि गुण के समान उन (दुर्गुणों) की कभी स्तुति करता है, वही वक्ता कहलाता है ।
अदेयं यस्य वै नास्ति भार्यापुत्रादिकं धनम् ।
आत्मानमपि सन्दत्ते पात्रे दाता स उच्यते ॥ ३२४ ॥
जिसको उपयुक्त पात्र के निमित्त स्त्री-पुत्रादिक, धन तथा शरीर दे देने में कोई हिचकिचाहट नहीं है वही दाता कहलाता है ।
अशङ्कितक्षमो येन कार्यं कर्तुं बलं हि तत् ।
जिससे कार्य करने के लिये निःशङ्क समर्थ होता है वही बल है ।
किंकरा इव येनान्ये नृपाद्याः स पराक्रमः ॥ ३२५ ॥
युद्धानुकूलव्यापार उत्थानमितिकीर्तितम् ।
जिससे अन्य राजा लोग किङ्कर (दास) के समान वश्य हो जाते हैं वही पराक्रम है । युद्ध के अनुकूल व्यापार को उत्थान कहते हैं ।
विषदोषभयादन्नं विमृशेत् कपिकुक्कुटैः ॥ ३२६ ॥
हंसाः स्खलन्ति कूजन्ति भृङ्गा नृत्यन्ति मायूराः ।
विरौति कुक्कुटो माद्येत् क्रौञ्चो वै रेचते कपिः ॥ ३२७ ॥
हृष्टरोमा भवेद् बभ्रुः सारिका वमते तथा ।
दृष्ट्वैवं सविषं चान्नं तस्माद्भोज्यं परीक्षयेत् ॥ ३२८ ॥
**विषादि से दूषित अन्नादि-परीक्षा का निर्देश—**विष-दोष के भय से बन्दर मुर्गा आदि के द्वारा अन्न की परीक्षा करनी चाहिये । क्योंकि विषयुक्त अन्न को देखते ही हंस लड़खड़ाने लगते हैं । भौंरे शब्द करने लगते हैं । मयूर नाचने लगते हैं, मुर्गे बोलने लगते हैं, क्रौञ्च पक्षी मतवाला हो जाता है । बन्दर मल-मूत्र त्याग करने लगता है । बभ्रु (बड़ानेवला) रोमाञ्चयुक्त हो जाता है । सारिका पक्षी वमन करने लगती है, इस रीति से सविष अन्न देखकर उसकी परीक्षा करनी चाहिये ।
भुञ्जीत षड्रसं नित्यं न द्वित्रिरससंकुलम् ।
हीनातिरिक्तं न कटु मधुरक्षारसंकुलम् ॥ ३२९ ॥