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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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४४ | शुक्रनीतिः

द्वेषी हों या न हों किन्तु इनकी छिप करके भी कभी रक्षा नहीं करनी चाहिये और इसी भाँति जनता के अपकारक लोगों की भी रक्षा नहीं करनी चाहिये । एवं माता-पिता, पूज्य, विद्वान, अच्छे आचरणवाले सत्पुरुषों का अपमान वा उपहास नहीं करना चाहिये । स्त्री-पुरुष तथा स्वामी-नौकर में भेद नहीं डालना चाहिये अर्थात् ऐसा व्यवहार भाई-भाई, गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र, इनमें नहीं करना चाहिये कि ये परस्पर एक दूसरे से पृथक् हो जायँ ।

वापीकूपारामसीमाधर्मशालासुरालयान् ॥ ३०० ॥
मार्गान्नैव प्रबाधेयुर्हीनांगविकलांगकान् ।

बावड़ी, कूप, बगीचा, सीमा, धर्मशाला, देवमन्दिर, मार्ग, हीन तथा विकल अङ्गवाले लोगों को क्षति तथा पीडा न पहुँचावे ।

द्यूतं च मद्यपानं च मृगयां शस्त्रधारणम् ॥ ३०१ ॥
गोगजाश्वोष्ट्रमहिषीनृणां वै स्थावरस्य च ।
रजतस्वर्णरत्नानां मादकस्य विषस्य च ॥ ३०२ ॥
क्रयं वा विक्रयं वापि मद्यसंधानमेव च ।
क्रयपत्रं दानपत्रमृणनिर्णयपत्रकम् ॥ ३०३ ॥
राजाज्ञया विना नैव जनैः कार्यं चिकित्सितम् ।
महापापाभिशापं निधिग्रहणमेव च ॥ ३०४ ॥

और बिना राजा की आज्ञा पाये द्यूत ( जुआ खेलना ), मद्य पीना, शिकार खेलना, शस्त्र रखना और गो, गज, अश्व, ऊंट, भैंस, स्थावर पदार्थ ( गृहादि ), चांदी, सोना, रत्न, मादक द्रव्य ( भांग-अफीम आदि ), विष, इन सब द्रव्यों का क्रय ( खरीदना ) वा विक्रय ( बेचना ) करना, मद्य का सन्धान ( शराब बनाना ), क्रयपत्र ( खरीदने का पत्र ), दानपत्र, ऋण के निर्णय का पत्र और चिकित्सा, महापाप का दोष लगाना, गड़े हुये द्रव्य को लेना, इन सब कार्यों को नहीं करना चाहिये ।

नवसमाजनियमं निर्णयं जातिदूषणम् ।
अस्वामि-नाष्टिक-धनसंग्रहं मन्त्रभेदनम् ॥ ३०५ ॥
नृपदुर्गुणलोपं तु नैव कुर्युः कदाचन ।

नये समाज के नियमों का निर्णय, जाति को दोष लगाना, बिना स्वामी का एवं नष्ट हुये व्यक्ति के धन को लेना, रहस्य का प्रकाश करना, राजा के दुर्गुणों को छिपाना, इन सब कार्यों को कभी नहीं करना चाहिये ।

स्वधर्महानिमनृतं परदाराभिमर्शनम् ॥ ३०६ ॥
कूटसाक्ष्यं कूटलेख्यमप्रकाशप्रतिग्रहम् ।
निर्धारितकराधिक्यं स्तेयं साहसमेव च ॥ ३०७ ॥