भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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प्रथमोऽध्यायः ४३.

ग्राम से जो निकल रहे हैं वा प्रवेश कर रहे हैं उनकी यत्नपूर्वक तलाशी लेकर चिह्न लगाने के बाद उन्हें छोड़ देवे । और जिनके व्यवहार तथा शील प्रख्यात हों ऐसे प्रतिष्ठित लोगों को बिना विचार किये ही छोड़ देवे ।

वीथीवीथिषु यामार्द्धैर्निशि पर्य्यटनं सदा ॥ २६२ ॥
कर्त्तव्यं यामिकैरेवं चौरजारनिवृत्तये ।

प्रत्येक गलियों में रात्रि के समय आधे २ प्रहर (डेढ़ २ घण्टे) पर घूम २ कर पहरेदारों को इस प्रकार से पहरा देना चाहिये जिससे चोर तथा जार ( परस्त्री गामी ) पुरुष दूर रहें ।

शासनं त्वीदृशं कार्यं राज्ञा नित्यं प्रजासु च ॥ २६३ ॥
दासे भृत्येऽथ भार्य्यायां पुत्रे शिष्येपि वा क्वचित् ।
वाग्दण्डपरुषन्नैव कार्य्य मद्देशसंस्थितैः ॥ २६४ ॥

प्रजाओं में राजा के आदेशों की घोषणा का निर्देश— और राजा को प्रजाओं के लिये नित्य इस प्रकार से शासन ( आदेश ) देना चाहिये कि—मेरे राज्य में रहनेवालों के लिये लिये यह उचित है कि—वे गुलाम, नौकर, स्त्री, पुत्र, शिष्य इनमें से किसी को भी कठोर-वचनों से दण्ड न देवें ।

तुलाशासनमानानां नाणकस्यापि वा क्वचित् ।
निर्य्यासानां च धातूनां सजातीनां घृतस्य च ॥ २६५ ॥
मधुदुग्धवसादीनां पिष्टादीनां च सर्व्वदा ।
कूटं नैव तु कार्य्यं स्याद्बलाच्च लिखितं जनैः ॥ २६६ ॥
उत्कोचग्रहणं नैव स्वामिकार्य्यविलोपनम् ।

तुला ( तौलने में ) एवं शासन (आज्ञा), मान (बटखरा), नाणक ( मुद्रा सिक्का मात्र ), निर्यास ( गोंद आदि ), धातु ( स्वर्णादि ); तथा उसके समान जाति के पदार्थ, घृत, मधु, दुग्ध, चर्बी आदि, पिसान ( चूर्ण आदि ) में कभी किसी प्रकार की बेईमानी या मिलावट लोगों को नहीं करना चाहिये । और कभी किसी से जबर्दस्ती कुछ नहीं लिखाना चाहिये और घूस नहीं लेनी चाहिये एवं स्वामी का कार्य नष्ट नहीं करना चाहिये ।

दुर्वृत्तकारिणं चोरं जारमद्वेषिणं द्विषम् ॥ २६७ ॥
न रक्षन्त्वप्रकाशं हि तथान्यानपकारकान् ।
मातॄणां पितॄणां चैव पूज्यानां विदुषामपि ॥ २६८ ॥
नावमानं नोपहासं कुर्युः सद्वृत्तशालिनाम् ।
न भेदं जनयेयुर्वै नूनार्य्यैः स्वामिभृत्ययोः ॥ २६९ ॥
भ्रातॄणां गुरुशिष्याणां न कुर्युः पितृपुत्रयोः ।

और दुष्ट आचरण करनेवाले ( गुण्डे ), चौर, जार ( लम्पट ), ये चाहे