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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पञ्चमाध्याये खलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०१

पञ्चमाध्याये खलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०१

अहितकर को हितकर की भांति दिखाकर अन्त में सदा अपने कार्य को सिद्ध करते हैं ।

विस्रम्भयित्वा चात्यर्थं मायया घातयन्ति ते ।

और वे चालाकी से प्रथम अपने ऊपर अत्यन्त विश्वास पैदा कराके अन्त में उसका नाश कर देते हैं ।

यस्य चाप्रियमन्विच्छेत्तस्य कुर्यात् सदा प्रियम् ॥ ३१ ॥
व्याधो मृगवधं कर्तुं गीतं गायति सुस्वरम् ।

और वे जिसका अप्रिय (बुराई) करना चाहते हैं उसका प्रथम सदा प्रिय कार्य करते हैं। जैसे बहेलिया मृग का वध करने के लिये प्रथम सुन्दर स्वर के साथ उसके सामने गाते हैं बाद में मार डालते हैं।

मायां विना महाद्रव्यं द्राङ् न सम्पाद्यते जनैः ॥ ३२ ॥
विना परस्वहरणान्न कश्चित् स्यान्महाधनः ।
मायया तु बिना तद्धि न साध्यं स्याद्यथेप्सितम् ॥ ३३ ॥

बिना धूर्त्तता के अत्यन्त धन न मिलने का निर्देश— बिना धूर्त्तता के लोग बहुत धन शीघ्र नहीं पा सकते हैं। और बिना दूसरे का धन हरण किये कोई बड़ा धनी नहीं हो सकता है। और बिना माया के जो ईप्सित कार्य है वह सिद्ध नहीं हो सकता है।

स्वधर्मं परमं मत्वा परस्वहरणं नृपाः ।
परस्परं महायुद्धं कृत्वा प्राणांस्त्यजन्त्यपि ॥ ३४ ॥

राजा लोगों को दूसरे का धन हरण करने को स्वधर्म समझने का निर्देश— राजा लोग दूसरे का धन हरण करना परम स्वधर्म समझ कर परस्पर महायुद्ध करके प्राण भी दे डालते हैं।

राज्ञो यदि न पापं स्याद्दस्यूनामपि नो भवेत् ।
सर्वं पापं धर्मरूपं स्थितमाश्रयभेदतः ॥ ३५ ॥

आश्रयभेद से सभी पापों का धर्म रूप में स्थित होने का निर्देश— यदि राजा को वैसा करने से पाप नहीं लगता है तो डाकुओं को भी दूसरे का धन हरण करने में पाप नहीं लगे क्योंकि आश्रयभेद से सभी पाप धर्मरूप हो जाते हैं, अर्थात् दूसरे का धन हरण करना डाकुओं के लिये पाप हो जाता है किन्तु राजाओं के लिये वही धर्म हो जाता है।

बहुभिर्यः स्तुतो धर्मो निन्दितोऽधर्म एव सः ।
धर्मेतत्त्वं हि गहनं ज्ञातुं केनापि नोचितम् ॥ ३६ ॥

बहुतों द्वारा प्रशंसित धर्म और निन्दित अधर्म मानने का निर्देश— जो व्यापार बहुतों के द्वारा प्रशंसित होता है, वह धर्म गिना जाता है और जो

२६ शु०

४०२ | शुक्रनीतिः

निन्दित होता है वह अधर्म गिना जाता है। अतः धर्म का तत्त्व गहन है, उसका किसी के द्वारा समझ सकना असंभव है।

अतिदानंतपःसत्ययोगो दारिद्र्यकृत्त्विह ।
धर्मार्थों यत्र न स्यातां तद्वाक् कामं निरर्थकम् ॥ ३७ ॥

अत्यंत दानादि करने की निषिद्धता का निर्देश — संसार में अतिदान, तपस्या तथा सत्य का संसम्बन्ध ये तीनों दरिद्रता उत्पन्न करने वाले होते हैं अर्थात् अतिदान से दरिद्र हो जाना जगतप्रसिद्ध ही है, इसी तरह तपस्या में भी धर्मानुष्ठानुष्ठान के द्वारा धन-व्यय होने से एवं धनप्राप्ति धूसंतता करने से होतो है उसमें यदि सत्य का संबन्ध हो तो धनप्राप्ति के असम्भव होने से दरिद्रता होना उचित ही है। जिस वाणी में धर्म और अर्थ न हों तो वह (वाणी) अत्यन्त निरर्थक समझी जाती है।

अर्थे वा यदि वा धर्मे समर्थो देशकालवित् ।
निःसंशयो नरः पूज्यो नष्टः संशयिता सदा ॥ ३८ ॥

धर्मानुसार अर्थार्जन करने वाले की पूज्यता का निर्देश — यदि कोई मनुष्य धर्म तथा अर्थ में समर्थ है अर्थात् धर्मानुसार अर्थार्जन करने में निपुण है और देश-काल का ज्ञाता अर्थात् तदनुसार कार्य करने वाला एवं संशय-रहित है तो वही सदा पूज्य होता है। और जो संशय करने वाला है वह नहीं माननीय होता है।

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् ।
अतोऽर्थाय यतेतैव सर्वदा यत्नमास्थितः ॥ ३६ ॥
अर्थाद्धर्मश्च कामश्च मोक्षश्चापि भवेन्नृणाम् ।

अर्थ के लिये अवश्य यत्न करने का निर्देश — अर्थ का दास पुरुष ही होता है न कि पुरुष का दास अर्थ होता है। अतः अर्थ के लिये सर्वदा प्रयत्न-पूर्वक यत्नशील रहना चाहिये। और मनुष्यों के अर्थ से ही धर्म, काम और मोक्ष सभी पुरुषार्थ प्राप्त होते हैं।

शस्त्रास्त्राभ्यां बिना शौर्यं गार्हस्थ्यं तु श्रियं विना · ४० ॥
ऐकमत्यं विना युद्धं कौशल्यं ग्राह्यकं विना ।
दुःखाय जायते नित्यं सुसहायं बिना विपत् ॥ ४१ ५
न विद्यते तु विपदि सुसहायं सुहृत्-समम् ।

शौर्यादिकों का शस्त्रास्त्रादि के बिना दुःखदायी होने का निर्देश — शस्त्र और अस्त्र के बिना शूरता, स्त्री के बिना गार्हस्थ्य (गृहस्ती), सैनिकों की एकता के बिना युद्ध, समझने वाले के बिना चतुराई, और सुन्दर सहायक के बिना

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०३

विपत्ति नित्य दुःख देने के लिये ही होती है । और विपत्ति में सुन्दर मित्र के समान अन्य कोई सच्चा सहायक नहीं होता है ।

अविभक्तधनान् मैत्र्या भृत्या भक्तधनान् सदा ॥ ४२ ॥
मित्रं स्वसदृशैर्भोगैः सत्यैश्च परितोषयेत् ।

अविभक्त और विभक्त ज्ञातिवर्ग तथा मित्र के साथ व्यवहार के प्रकार का निर्देश— जिनके साथ धन का बँटवारा नहीं हुआ है अर्थात् एक साथ रहनेवाले जो ज्ञाति-वर्ग के हैं, उन्हें सौहार्द भाव से, और जिनके साथ धन का बटवारा हो चुका है, ऐसे लोगों को मासिक या वार्षिक वृत्ति-प्रदान द्वारा, एवं मित्रों को अपने सदृश भोग ( भोजनादि ) का प्रबन्ध तथा सत्य व्यवहार द्वारा सदा राजा सन्तुष्ट रखे ।

नृपसम्बन्धिस्त्रीपुत्रसुहृद्भृत्याविदस्युभिः ॥ ४३ ॥
अतो विभागं दत्त्वैषां भुङ्क्ते यस्तु स्वकं धनम् ।

अपने सम्बन्धी स्त्री-पुत्रादि को सन्तुष्ट रखते हुये धनोपभोग करने का निर्देश— जो राजा अपने सम्बन्धी, स्त्री, पुत्र, मित्र भृत्य तथा दस्यु गणों को जिस प्रकार से ये संतुष्ट हो सकें वैसा प्रबन्ध करके अपने धन का उपभोग करता है, वस्तुतः वही सुखी होता है ।

त्यक्त्वा तु दर्पकार्पण्यमानोद्वेगभयानि च ॥ ४४ ॥
कुर्वीत नृपतिर्नित्यं स्वार्थसिद्धयै तु नान्यथा ।
विशेषभृतितो भृत्यं प्रेममानाधिकारतः ॥ ४५ ॥

स्वकार्य-सिद्ध्यर्थ भृत्य को सर्वथा संचय रखने का निर्देश— राजा अपने कार्य की सिद्धि के लिये ही दर्प ( अहङ्कार ), कृपणता, मान, उद्वेग और भय को छोड़कर विशिष्ट जीविका का प्रदान, प्रेम तथा संमान-प्रदर्शन एवं अधिकार-प्रदान से भृत्य को नित्य युक्त करता रहे, इससे अन्यथा न करे ।

ब्राह्मणाग्निजलैः सर्वैर्धनवान् भक्ष्यते सदा ।
स सुखी मोदते नित्यमन्यथा दुःखमश्नुते ॥ ४६ ॥

ब्राह्मणादि द्वारा यज्ञादि करने में धन का व्यय करने से ही सुखी होने का निर्देश— दान करने से ब्राह्मण द्वारा, यज्ञ करने से अग्नि द्वारा, पौंसला आदि का प्रबन्ध करने से जल द्वारा जिस धनी का धन व्यय होता रहता है । वह धनी नित्य सुखी होने से प्रसन्न रहता है अन्यथा रीति से व्यय होने पर दुःखी रहता है ।

दर्पस्तु परहासेच्छा मानोऽहं सर्वतोऽधिकः ।
कार्पण्यं तु व्यये दैन्यं भयं स्वोच्छेदशङ्कनम् ॥ ४७ ॥

४०४शुक्रनीतिः

मानसस्यानवस्थानमुद्वेगः परिकीर्तितः ।

दर्पं, मान, कार्पण्य, भय तथा उद्वेग के लक्षण— दूसरे के हास की इच्छा को 'दर्प', मैं सबसे अधिक गुणादि में हूँ इसे 'मान', व्यय में कंजूसी करने को 'कार्पण्य', अपने उच्छेद होने की शङ्का को 'भय' और मन का स्थिर न रहने को 'उद्वेग' कहते हैं ।

लघोरप्यपमानस्तु महावैराय जायते ॥ ४८ ॥
दानमानसत्यशौर्यमार्दवं सुसुहृत्करम् ।

महान वैर तथा मित्रता के कारणों का निर्देश— क्षुद्रजन के लिये भी किया हुआ अपमान महावैर को पैदा करने में समर्थ होता है । किसी को कुछ देना, संमान करना, सत्य व्यवहार करना, शूरता और मृदुता ये सब अत्यन्त मित्रता पैदा करनेवाले होते हैं ।

सर्वानापदि सदसि समाहूय बुधान् गुरून् ॥ ४९ ॥
भ्रातॄन् बन्धूंश्च भृत्यांश्च ज्ञातीन् सभ्यान् पृथक् पृथक् ।
यथार्हं पूज्य विनतः स्वामीष्टं याचयेन्नृपः ॥ ५० ॥

आपत्ति पड़ने पर राजा के कर्त्तव्य का निर्देश— राजा आपत्ति पड़ने पर विनम्र होकर पण्डित, गुरु, भाई, बन्धु, भृत्य, जाति के लोग और सभासद् इन सबों को राज्यसभा में बुलाकर यथायोग्य सम्मान करने के बाद अपना अभीष्ट सिद्ध करने के लिये इस रीति से प्रार्थना करे । अर्थात् उपाय पूछे ।

आपदं प्रतरिष्यामो यूयं युक्त्या वदिष्यथ ।
भवन्तो मम मित्राणि भवत्सु नास्ति भृत्यता ॥ ५१ ॥

मैं आपत्ति को पार कर जाऊं इसके लिये आप लोग युक्ति बतायें । आप लोग मेरे मित्र हैं आप लोगों को मैं अपना केवल भृत्य नहीं मानता हूँ ।

न भवत्सदृशास्त्वन्ये सहायाः सन्ति मे ह्यतः ।
तृतीयांशं भृतेर्माह्यमर्धं वा भोजनार्थकम् ॥ ५२ ॥
दास्याम्यापत्समुत्तीर्णः शेषं प्रत्युपकारवित् ।

आप लोगों के समान मेरा कोई दूसरा सहायक नहीं है । अतः इस समय केवल भोजन के लिये वेतन का तृतीयांश या अर्द्धांशमात्र ही आप लोग ग्रहण करें । क्योंकि इस समय व्यय अधिक होने से मैं समग्र वेतन देने में असमर्थ हूँ और जब मैं आपत्ति को पार कर लूंगा तब आप लोगों के उपकार का बदला चुकाना उचित जानकर शेष भी वेतन चुका दूंगा ।

भृतिं विना स्वामिकार्यं भृत्यः कुर्यात् समाष्टकम् ॥ ५३ ॥
षोडशाब्दं धनी यः स्यादितरोऽर्थानुरूपतः ।

आपत्ति में विना वेतन के भी स्वामि-कार्य करने की कालमर्यादा का

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०५

**निर्देश—**जो भृत्य ऐसा धनी हो कि अपने पास से १५ वर्ष तक बिना वेतन लिये जीविका चला सकता है वह बिना वेतन लिये ८ वर्ष तक स्वामी का कार्य करे, और जो इससे भिन्न हों वे अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार जितना समय तक बिना वेतन के हो सके स्वामिकार्य करें।

निर्धनैरन्नवस्त्रं तु नृपाद् ग्राह्यं न चान्यथा ॥ ५४ ॥
यतो भुक्तं सुखं सम्यक् तद्दुःखैर्दुःखितो न चेत् ।
विनिन्दति कृतघ्नस्तु स्वामी भृत्योऽन्यएव वा ॥ ५५ ॥

और जो निर्धन हों वे राजा से अन्न-वस्त्र मात्र ग्रहण करें। इससे अन्यथा होने पर न ग्रहण करें। जिस स्वामी से आजतक जिसने भलीभांति सुख का उपभोग किया, आज यदि उसके दुःख से वह दुःखी न हो तो वैसे कृतघ्न भृत्य की स्वामी या अन्य कृतज्ञ भृत्य भी निन्दा करते हैं।

सकृत् सुभुक्तं यस्यापि तदर्थं जीवितं त्यजेत् ।
भृत्यः स एव सुश्लोको नापत्तौ स्वामिनं त्यजेत् ॥ ५६ ॥
स्वामी स एव विज्ञेयो भृत्यार्थं जीवितं त्यजेत् ।

**प्रशंसायोग्य भृत्य और स्वामी का वर्णन—**जो भृत्य जिसका सम्मान-पूर्वक दिया हुआ अन्न एक बार भी भोजन करले तो उसके रक्षार्थ समय पड़ने पर जीवन का भी त्याग कर दे। वही भृत्य सुन्दर यश वाला माना जाता है जो आपत्ति पड़ने पर भी स्वामी का साथ नहीं छोड़ता है और वही वस्तुतः स्वामी है जो आवश्यकता पड़ने पर भृत्य के रक्षार्थ अपना जीवन भी त्याग कर देता है।

न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत् ॥ ५७ ॥
सुभृत्यता तु यन्नीत्या वानरैरपि स्वीकृता ।

**योग्य स्वामी तथा भृत्य का उदाहरण—**इस पृथिवी पर राम के समान कोई दूसरा नीतिमान राजा नहीं हुआ, क्योंकि जिसकी नीति के द्वारा वानरों ने भी भलीभांति से भृत्यता स्वीकार कर ली थी।

अपि राष्ट्रविनाशाय चोराणामेकचित्तता ॥ ५८ ॥
शक्ता भवेन्न किं शत्रुनाशाय नृपभृत्ययोः ।

**एकचित्तता के भाव का वर्णन—**जब चोरों का मिल कर एकचित्त हो जाना राष्ट्र-विनाश करने में समर्थ हो जाता है, तब भला राजा और भृत्य का एकचित्त हो जाना क्या शत्रुविनाश करने के लिये समर्थ नहीं हो सकता है, अपितु अवश्य हो सकता है।

न कूटनीतिरभवच्छ्रीकृष्णसदृशो नृपः ॥ ५६ ॥
अर्जुनाद् ग्राहिता स्वस्य सुभद्रा भगिनी छलात् ।

४०६ | शुक्रनीतिः

श्रीकृष्ण की कूटनीति का वर्णन—श्रीकृष्ण भगवान के समान कोई दूसरा राजा कूटनीति का प्रयोग करनेवाला नहीं हुआ, जिन्होंने कूटनीति द्वारा जबर-दस्ती अपनी बहन सुभद्रा अर्जुन को दिला दी (ब्याह दी)

नीतिमत्तान्तु सा युक्तिर्या हि स्वश्रेयसेऽखिला ॥ ६० ॥

नीतिमानों की वही युक्ति वस्तुतः युक्ति (उपाय) है जो उनके संपूर्ण कल्याण करने में उचित हो।

आदौ तद्धितकृत्स्नेहं कार्यं स्नेहमनन्तरम् ।
कृत्वा सधर्मवादं च मध्यस्थः साधयेद्धितम् ॥ ६१ ॥

हित सिद्ध करने में मध्यस्थ पुरुष के व्यवहार का निर्देश—मध्यस्थ (उदासीन) पुरुष प्रथम किसी के हितैषी मित्र के साथ स्नेह, तदनन्तर कर्त्तव्य कर्म और धर्मकथनपूर्वक स्नेह-प्रदर्शन करके हित सिद्ध करे।

परस्परं भवेत् प्रीतिस्तथा तद्गुणवर्णनम् ।
इष्टान्नधनवसनैर्लोभनं कार्यसिद्धिदम् ॥ ६२ ॥

परस्पर जैसे प्रीति हो वैसे उसके प्रेम के गुणों का वर्णन करे। और अभीष्ट अन्न-वस्त्र का लोभ दिखाये। यह कार्य-सिद्धि करने वाला होता है।

दिव्यावलम्बनं मिथ्या संल्लापं धैर्य्यवर्धनम् ।
इमे उपाया मध्यस्थ-कुट्टिनीकारिणां मताः ॥ ६३ ॥

मध्यस्थ (उदासीन), कुट्टिनी और धूर्त्त लोगों को दिव्य (शपथ) का अवलम्बन, झूठमूठ (मनगढन्त) बात करना और धैर्य बँधाना ये सब उपाय इष्ट होते हैं। इससे वे लोग कार्य सिद्ध करते हैं।

नात्मसङ्गोपने युक्तिं चिन्तयेत् स पशोर्जडः ।
जारसङ्गोपने छद्म संश्रयन्ति स्त्रियोऽपि च ॥ ६४ ॥

अपनी रक्षा की युक्ति का विचार न करनेवाले की निन्दा का निर्देश—जो अपनी रक्षा करने के लिये उपाय नहीं सोचता है वह पशु से भी बढ़कर जड़ है। और स्त्रियां भी अपने जार पति को छिपाने में छल का आश्रय लेती हैं।

युक्तिश्छलात्मिका प्रायस्तथान्या योजनात्मिका ।
यच्छद्माचारी भवति तेन छद्मा समाचरेत् ॥ ६५ ॥
अन्यथा शीलनाशाय महतामपि जायते ।

कार्यसिद्धयर्थ दो प्रकार की युक्तियों का निर्देश—कार्यसिद्धि के लिये युक्ति (उपाय) दो प्रकार की होती है, उसमें प्रायः करके छलरूपा पहली और सत्यरूपा दूसरी होती है। जो छल करनेवाले हैं, उनके लिये छलरूपा युक्ति का प्रयोग करना चाहिये। अन्यथा छल करना बड़े लोगों के चरित्र को बिगाड़ देनेवाली हो जाती है।

पञ्चमाध्याये खलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०७

अस्ति बुद्धिमतां श्रेणिर्न त्वेको बुद्धिमानतः ॥ ६६ ॥
देशे काले च पुरुषे नीतिं युक्तिमनेकधाम् ।
कल्पयन्ति च तद्विद्या दृष्ट्वा रुद्धां तु प्राक्तनीम् ॥ ६७ ॥

और बुद्धिमानों की श्रेणी होती है न कि सिर्फ एक ही कोई बुद्धिमान होता है अतः चतुर लोग जहां पर सत्यरूपा युक्ति निष्फल देखते हैं वहां पर देश, काल तथा पात्र के अनुसार अनेक प्रकार की नीति तथा युक्ति की कल्पना करते हैं ।

मन्त्रौषधिपृथग्वेष-कालवागर्थसंश्रयात् ।
छद्म सञ्जनयन्तीह तद्विद्याकुशला जनाः ॥ ६८ ॥

छल का वर्णन— इस संसार में माया (छल) करने में निपुण लोग मन्त्र, औषध, नाना प्रकार के वेष, काल, वचन और अर्थ, इन सबों का आश्रय लेकर छल-प्रयोग करते हैं ।

लोकेऽधिकारिप्रत्यक्षं विक्रीतं दत्तमेव वा ।
वस्त्रभाण्डादिकं क्रीतं स्वचिह्नैरङ्कयेच्चिरम् ॥ ६९ ॥

लोक में बेंची हुई (वस्त्र-पात्र आदि), दी हुई (किसी को दान में दे दी गई) तथा खरीदी हुई वस्तुओं पर उनके अधिकारी (बेंचने, देने तथा खरीदनेवाले) लोगों के सामने उनको अपनी २ मुहरों से ऐसा चिह्न बना देना चाहिये, जो बहुत दिन तक न मिट सके ।

स्तेनकूटनिवृत्त्यर्थं राज्ञातं समाचरेत् ।
जडान्धबालद्रव्याणां दद्याद् वृद्धिं नृपः सदा ॥ ७० ॥

चोरों की जालसाजी रोकने के लिये अर्थात् चोरी का माल न बिकने पावे, इसके लिये उन बिकी हुई वस्तुओं की सूचना राजा को दे देनी चाहिये अर्थात् लिखा देनी चाहिये । और जड़, अन्ध तथा लड़कों के जो धन हों, उनको यदि राजा के पास रक्खा जाय तो राजा उसका सूद बराबर उन सबों को दे ।

स्वीया तथा च सामान्या परकीया तु स्त्री यथा ।
त्रिविधो भृतकस्तद्वदुत्तमो मध्यमोऽधमः ॥ ७१ ॥

तीन प्रकार के भृत्यों का निर्देश— जैसे स्त्री स्वीया (अपनी), सामान्या (वेश्या आदि) और परकीया (दूसरे की) भेद से ३ प्रकार की होती है। वैसे भृत्य भी उत्तम, मध्यम तथा तथा अधम भेद से तीन प्रकार का होता है ।

स्वामिन्येवानुरक्तो यो भृतकस्तूत्तमः स्मृतः ।
सेवते पुष्टवृत्तीदं प्रकरं स च मध्यमः ॥ ७२ ॥

४०८ | शुक्रनीतिः

पुष्टोऽपि स्वामिनाऽव्यक्तं भजतेऽन्यं स चाधमः ।

**उत्तमादि भृत्यों के लक्षण—**जो स्वामी में अनुरक्त रहे, वह भृत्य 'उत्तम' और जो पर्याप्त वेतन देनेवाले स्वामी की सेवा अधिक वेतन पाने के लोभ से करता है, वह 'मध्यम' एवं जो स्वामी से भलीभांति पालित होने पर भी छिपे रूप से दूसरे की भी सेवा करता है, वह 'अधम' भृत्य कहलाता है।

उपकरोत्यपकृतो ह्युत्तमोऽप्यन्यथाऽधमः ॥ ७३ ॥
मध्यमः साम्यमन्विच्छेदपरः स्वार्थतत्परः ।

**प्रकारान्तर से उत्तमादि भृत्यों के लक्षण—**जो अपकार करने पर भी स्वामी का उपकार करता है वही 'उत्तम' है इससे अन्यथा अर्थात् उपकार करने पर जो अपकार करता है, वह 'अधम' कहलाता है। और मध्यम 'भृत्य' तुल्य व्यवहार को पसन्द करता है अर्थात् उपकार करनेवाले के प्रति उपकार तथा अपकार करनेवाले के प्रति अपकार करना चाहता है, और इसके बाद का दूसरा जो अधम है वह केवल अपना स्वार्थ साधने में तत्पर रहता है।

नोपदेशं विना सम्यक् प्रमाणैर्ज्ञायतेऽखिलम् ॥ ७४ ॥
बाल्यं वाऽप्यथ तारुण्ये प्रारम्भितसमाप्तिदम् ।

**उपदेश के बिना सबका ज्ञान न होने का तथा बाल्य व युवा अवस्था में प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति का निर्देश—**उपदेश के बिना केवल प्रमाणों से सभी बातें भलीभांति नहीं जानी जा सकती हैं। और बाल्य तथा युवा ये दो अवस्थायें प्रारम्भ किये हुये की समाप्ति देनेवाली अर्थात् इनमें जो आरम्भ किया जाता है उसकी समाप्ति भी हो जाती है।

प्रायो बुद्धिमतो ज्ञेयं न वार्धक्यं कदाचन ॥ ७५ ॥
आरम्भं तस्य कुर्याद्धि यत्समाप्तिं सुखं व्रजेत् ।

**आरम्भ किये हुये की समाप्ति होने में वृद्धावस्था की अयोग्यता का निर्देश—**किन्तु वार्द्धक्य (वृद्धावस्था) को प्रायः बुद्धिमान उक्त भांति का कदापि नहीं मानते हैं। इसमें प्रारम्भ किये हुये कार्य की समाप्ति नहीं हो पाती, क्योंकि उसी कार्य का आरम्भ करना चाहिये। जिसकी समाप्ति बिना क्लेश के हो जाय।

नारम्भो बहुकार्याणामेकदैव सुखावहः ॥ ७६ ॥
नारम्भितसमाप्तिं तु विना चान्यं समाचरेत् ।

**बहुत कार्यों का एक साथ आरम्भ करने का निषेध—**बहुत कार्यों का एक साथ ही आरम्भ करना सुखावह नहीं होता है और आरम्भ किये हुये कार्य की बिना समाप्ति हुये किसी दूसरे कार्य को नहीं करना चाहिये।

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०९

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०९

सम्पाद्यते न पूर्वं हि नापरं लभ्यते यतः ॥ ७७ ॥
कृती तत् कुरुते नित्यं यत् समाप्तिं व्रजेत् सुखम् ।

**समाप्त होने योग्य कार्य का प्रारम्भ करने का निर्देश—**क्योंकि आरम्भ किये हुये कार्य की बिना समाप्ति किये दूसरा कार्य प्रारम्भ करने से पूर्व का कार्य तो संपन्न नहीं हो पाता और दूसरा भी नहीं हो पाता । अतः बुद्धिमान को चाहिये कि—वह सदा उसी कार्य का प्रारम्भ करे जो सुखपूर्वक समाप्त हो जाय ।

यदि सिद्ध्यति येनार्थः कलहेन वरस्तु सः ॥ ७८ ॥
अन्यथाऽऽयुर्धनसुहृद्-यशोधर्महरः सदा ।

**प्रयोजन की सिद्धि होने की संभावना में कलह करने का निर्देश—**जिस कलह के करने से यदि अपना कोई प्रयोजन सिद्ध होता हो तो वह अच्छा होता है अन्यथा वह (कलह) आयु, धन, मित्र, यश और धर्म का सदा केवल हरनेवाला होता है ।

ईर्ष्या लोभो मदः प्रीतिः क्रोधो भीतिश्च साहसम् ॥ ७६ ॥
प्रवृत्तिच्छिद्रहेतूनि कार्ये सप्त बुधा जगुः ।

**कार्ये में प्रवृत्ति तथा छिद्र (दोष) के कारणों का निर्देश—**ईर्ष्या, लोभ, मद, प्रीति, क्रोध, भय तथा साहस ये ७ कार्य में प्रवृत्ति तथा छिद्र (दोष) के हेतु पण्डितों द्वारा कहे हुये हैं ।

यथाच्छिद्रं भवेत् कार्यं तथैव हि समाचरेत् ॥ ८० ॥
अविसंवादि विद्वद्भिः कालेऽतीतेऽपि चापदि ।

**निर्दोष तथा अभिमत ही कार्य करने का निर्देश—**जिस प्रकार से कार्य निर्दोष हो, उसी प्रकार से करना चाहिये । आपत्ति न रहने पर समय बीत जाने पर भी पण्डितों को जो अभिमत हो उसी कार्य को करना चाहिये ।

दशग्रामी शनानीकः कपरीचारकसंयुतौ ॥ ८१ ॥
अश्वस्थौ विचरेयातां ग्रामपो ह्यपि चाश्वगः ।

**दशग्रामाधिपादिकों का विचरण करने के प्रकारों का निर्देश—**दश ग्रामों का स्वामी और १०० सैनिकों का नायक अपने २ भृत्यों के साथ घोड़े पर सवार होकर विचरण करें । और एक ग्राम के स्वामी भी घोड़े पर सवार होकर विचरण करें ।

साहस्रिकः शतग्रामी एकाश्वरथवाहनौ ॥ ८२ ॥
दशशस्त्रास्त्रिभिर्युक्तौ गच्छेतां वाऽश्वसङ्गतौ ।

१००० हजार सैनिकों के अधिपति और १०० ग्रामों के जो अधिपति हों, वे शस्त्र धारण किये हुये १० सैनिकों से युक्त होकर एक घोड़े जुते हुये रथ पर अथवा केवल घोड़े पर सवार हुये विचरण करें ।

४१० | शुक्रनीतिः

सहस्रग्रामपो नित्यं नराश्वद्वयश्वयानगः ॥ ८३ ॥ आयुतिको विंशतिभिः सेवकैर्हस्तिना व्रजेत् । १००० ग्रामों का या १०००० सैनिकों का अधिपति नित्य २० सैनिकों के साथ पालकी, घोड़ा या दो घोड़े जुते हुये रथ या हाथी पर सवार होकर विचरण करें ।

अयुतग्रामपः सर्वयानैश्च चतुरश्वगः ॥ ८४ ॥ पञ्चायुतो सेनपोऽपि सञ्चरेद् बहुसेवकः । १०००० ग्रामों का और ५०००० हजार सैनिकों का अधिपति ये दोनों बहुत से भृत्यों (सैनिकों) से युक्त होकर सभी प्रकार की सवारियों से या चार घोड़े जुते हुये रथ पर सवार होकर विचरण करें ।

यथाधिकाधिपत्यं तु धीट्याधिक्यं प्रकल्पयेत् ॥ ८५ ॥ कल्पयेच्च यथाधिक्यं धनिकेषु गुणिष्वपि । जैसी अधिक संख्या वाले ग्रामों या सैनिकों के ऊपर आधिपत्य हो उसी के अनुसार संमान की अधिकता की कल्पना करनी चाहिये । इसी प्रकार से धनिकों तथा गुणियों में भी उनकी जैसी धन तथा गुण की अधिकता हो उसी के अनुसार उनके सम्मान की कल्पना करनी चाहिये ।

श्रेष्ठो न मानहीनः स्यान्न्यूनो मानाधिकोऽपि न ॥ ८६ ॥ राष्ट्रे नित्यं प्रकुर्वीत श्रेयोऽर्थी नृपतिस्तथा । श्रेष्ठ तथा हीन पुरुष के संमान में न्यूनाधिक्य का निषेध—कल्याण के चाहने वाले राजा को अपने राज्य में इस तरह की व्यवस्था करनी चाहिये कि जिसमें श्रेष्ठ पुरुष—उचित सम्मान से हीन, न्यून पुरुष—उचित सम्मान से अधिक सम्मान न प्राप्त करे, अर्थात् सबका यथोचित सम्मान हो, उसमें न्यूनाधिक्य न होने पावे ।

हीनमध्योत्तमानां तु ग्रामभूमिं प्रकल्पयेत् ॥ ८७ ॥ कुटुम्बिनां गृहाऽर्थं तु पत्तनेऽपि नृपः सदा । उत्तमादि गृह-भूमि के प्रमाणों का निर्देश—राजा ग्राम में हीन, मध्यम तथा उत्तम लोगों के लिये तथा कुटुम्बियों के लिये नगर में घर बनाने के योग्य सदा उचित भूमि की व्यवस्था करे ।

द्वात्रिंशत्प्रमितैर्हस्तैर्दीर्घाऽर्द्धा विस्तृताधमे ॥ ८८ ॥ उत्तमा द्विगुणा मध्या सार्धमाना यथार्हतः । कुटुम्बसंस्थितिसमा न न्यूना वाऽधिकाऽपि न ॥ ८९ ॥ ३२ हाथ लम्बी तथा १६ हाथ चौड़ी अधमा, ६४ हाथ लम्बी तथा ३२ हाथ चौड़ी उत्तमा और ४८ हाथ लम्बी तथा २४ हाथ चौड़ी मध्या-

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४११

संज्ञक भूमि वासार्थ देनी चाहिये। और जैसी कुटुम्ब की स्थिति न्यून या अधिक हो उसी के समान भूमि-व्यवस्था करनी चाहिये। उससे न न्यून और न अधिक होनी चाहिये।

ग्रामाद् बहिर्वसेयुस्ते ये ये त्वधिकृता नृपैः ।
नृपकार्ये बिना कश्चिन्न ग्रामं सैनिको विशेत् ॥ ६० ॥

अधिकारी पुरुषों को ग्राम के बाहर रहने एवं सैनिकों को बिना राजकार्य के ग्राम-प्रवेश के निषेध का निर्देश— राजा द्वारा जो २ अधिकारी नियुक्त किये गये हों उन सबों को ग्राम से बाहर की भूमि में निवास करना चाहिये। बिना किसी राज-कार्य के किसी सैनिक को ग्राम के अन्दर नहीं प्रवेश करना चाहिये।

तथा न पीडयेत् कुत्र कदापि ग्रामवासिनः ।
सैनिकैर्न व्यवहरेन्नित्यं ग्राम्यजनोऽपि च ॥ ६१ ॥

सैनिकों को ग्रामवासियों को पीड़ा न पहुँचाने एवं ग्रामवासियों को सैनिक के साथ व्यवहार न करने का निर्देश— और सैनिक कहीं किसी ग्रामवासी को कभी पीड़ा न पहुँचावे और ग्रामवासी भी कभी किसी सैनिक के साथ किसी प्रकार का व्यवहार न रक्खे।

श्रावयेत् सैनिकान्नित्यं धर्मं शौर्यविवर्धनम् ।
सुवाद्यनृत्यगीतानि शौर्यवृद्धिकराण्युपि ॥ ९२ ॥

सैनिकों के शौर्यवर्धक उपायों को करने का निर्देश— राजा सैनिकों को नित्य शूरता को बढ़ानेवाले युद्ध-धर्म सुनवावे और उनके लिये सुन्दर बाजा, नृत्य-गीत आदि का भी प्रबन्ध रखे जो कि शूरता को बढ़ाने वाले हों अर्थात् अश्ली-लता युक्त न हों।

युद्धक्रियां विना सैन्यं योजयेन्नान्यकर्मणि ।

युद्धकार्य से अन्य में सैनिकों की नियुक्ति का निषेध— युद्धकार्य के अतिरिक्त अन्य कार्यों को करने के लिये सेना की नियुक्ति न करे।

सत्याचारास्तु धनिका व्यवहारे हता यदि ॥ ९३ ॥
राजा समुद्धरेत्तांस्तु तथाऽन्यांश्च कृषीबलान् ।

व्यवहार में विपन्न होने पर धनिक या किसान की रक्षा करने का निर्देश— सत्य (ईमानदारी) आचरण रखनेवाला कोई धनिक या किसान यदि व्यवहार (लेन-देन) के नाते बिगड़ गया हो (हीन अवस्था में पड़ गया हो) तो राजा उसकी सहायता कर उद्धार करे।

ये सैन्यधनिकास्तेभ्यो यथार्हा भृतिमावहेत् ॥ ९४ ॥
पारदेश्यं च त्रिंशांशमधिकं तद्धनव्ययात् ।

धनी सैनिक का वेतन व भत्ता के विषय में विचार— जो सेना के अन्दर धनी सैनिक हों उनको योग्यता के अनुसार उचित वेतन दे। और राजधानी

४१२ | शुक्रनीतिः

से बाहर परदेश में जाने पर उनका जो धन-व्यय हो उससे तीसवां भाग अधिक मिलाकर राजा उनको द्रव्य दे ।

धनं संरक्षयेत्तेषां यत्नतः स्वात्मकोशवत् ॥ ६५ ॥
संहरेद्धनिकात् सर्वं मिथ्याचाराद्धनं नृपः ।

**सैनिकों के धन की आत्मवत् रक्षा करने का एवं जालसाज धनिकों का धन हरण करने का निर्देश—**और सैनिकों के धन को अपने खजाने की भांति यत्न-पूर्वक रक्षा करे । यदि कोई धनिक जालसाजी का व्यवहार कर धन पैदा करे तो उसका संपूर्ण धन छीन ले ।

यदा चतुर्गुणा वृद्धिर्गृहीता धनिकेन च ॥ ६६ ॥
अधमर्णान्न दातव्यं धनिने तु धनं तदा ।

इति शुक्रनीतौ खिलनीतिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः ।
इति शुक्रनीतिः समाप्ता ।

**मूल से चौगुना सूद के चुकने पर धनी को कुछ न देने का निर्देश—**और जब मूल धन से चौगुनी वृद्धि (सूद) धनिक ने ऋण लेनेवाले से ले ली हो तब उससे अधिक धन लेने के लिये धनिक को रोक दे । अर्थात् ऋण पट गया इससे ऋण लेनेवाला धनी को कुछ न दे ।

इति शुक्रनीतिभाषाटीकायां खिलनीतिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ।


टीकाकार-परिचयः—

श्रीभार्गवीभर्तुरनुग्रहेण श्रीभार्गवीये ननु नीतिशास्त्रे ।
भर्गप्रियायामथिकाशि टीका समाप्ति राष्ट्रस्य गिराऽभ्युपेता ॥
वेदेन्दुशून्याक्षिमितोऽब्दमध्ये श्रीविक्रमादित्यप्रवर्त्तितेऽत्र ।
पौषे सितावाद्यतिथाविनेऽह्नि श्रीमद्ब्रह्मयुक्-शंकरनामकेन ॥
गोस्वामिदामोदरपादपद्म-सत्प्रमत्तेन च गौतमेन ।
राजेश्वरीताततया ब्रजेश्व-र्यात्मेश्वरत्वेन च विश्रुतेन ॥
'बस्ती' पुरीमध्यगत-प्रसिद्ध 'मिश्रौलिया' ग्रामसमुद्भवेन ।
विद्याविलासाख्यधिया सुधेन द्राक्षपद्यनिर्माणकृतश्रमेण ॥
टीकादिसम्पादनतः सदायूर्वेदागमग्रन्थविचारणायाम् ।
कृतश्रमेण प्रणयेन शश्वच्छब्दद्युनद्यम्ब्ववगाहनेन ॥
समाप्तश्चाऽयं ग्रन्थः

शुक्रनीति-श्लोकानुक्रमणिका

श्लोक/पादपृष्ठश्लोक/पादपृष्ठश्लोक/पादपृष्ठ
अंगानि वेदाश्चत्वारो२४अतिमृदुस्तुतिनति४००अधिकृतो दशग्रामे२९
अंगानां क्रमशो बह्र्ये१०अतोऽन्यथा विनाशाय६१अधीते सुस्वरं गाति२९०
अकर्तुं यद्धितमपि७०अतो यतेत तत्प्राप्त्यै१३८अधोगमा सदा कार्या३३५
अकृष्यबालस्थविर२८५अतो यतेत तत्प्राप्त्यै१५५अनन्यस्वस्वकामत्य१८१
अकृत्वाद्योऽपि शनैः२८६अतो विभागं दत्त्वैषां४०३अनन्याः स्वामिभक्ताश्च८४
अकातरत्वं शस्त्रास्त्र४८अल्पटनं चानशनं१७६अनर्थमप्यभिप्रेतं१४०
अकीर्ति लभते सोऽत्र१७९अत्यन्तविशदं वस्त्रं२०८अनागमं तु यो भुङ्क्ते१०४
अकुटुम्ब्यं कति च७२अत्यन्तविषयासक्तं३६६अनागमादपि या मुक्तिः
अकोपोऽपि सकोपाभः९२अल्पायासो हि विद्यासु१७६अनाचाराद्धर्महानि१६२
अगाधसलिले मग्नो१७अत्यावश्यं त्वसद्वेऽपि११९अनियुक्तो न वै ब्रूयात्१७९
अग्निदो गरदश्चैव१३२अत्युग्रदण्डरूपः स्यात्१९१अनियुक्तो नियुक्तो वा२७३
अग्निदो गरदो वैश्या१९७अथ कोशप्रकरणं२०१अनिषिद्धोपायकार्यः३७२
अग्नारस्यैव गन्धस्य३५९अथ मित्रप्रकरणं१८१अनिष्टवाक् परुषवाग्१९७
अङ्गीकर्तुं योग्यमिति११३अथ मित्रे तृतीयं तु२२१अनीतिरेव सच्छिद्रं
अङ्गीकृतं यथार्थं यद्२१२अथर्वणां चोपवेदः२२७अनीतिस्ते तु मनसि९०
अङ्गीकृतमिति लिखेन्११३अथ साधारणं नीति१२५अनुक्रमेण संयोज्यो७३
अङ्गीकृतापराधेन३८४अदत्तं यश्च गृह्णाति३२१अनुच्छेद्यमनाहार्यं१०३
अचिरात्तं दुरात्मानं२७०अदानेनापमानेन२२अनुनीय यथाशक्ति१६४
अजायाश्च गवांश्चैव स्यान्२१६अदीर्घसूत्रः सत्कार्ये६५अनुभूतस्मारकं तु२९६
अजायाश्चैव शङ्घर्णं२०९अदुष्टऋत्विजं याज्यो३२०अनुयायात्प्रतिपदं१३५
अजाविगोमहिष्यश्च२१९अदेयं यस्य वै नास्ति४७अनुरागं सुस्वरं च८५
अजाविगोमहिष्येन७८अद्रोहसमयं कृत्वा३६५अनूपे तु तृणाधानां३५३
अतः सदानीतिशास्त्रअधमर्णस्थितं चापि१५९अनेकतन्तुसंयोगैः२३५
अतत्परनरस्यैव१८अधमर्णात् दातव्यं४१२अनेकासनसन्धाने२३२
अतिकामक्रोधलोभै३१३अधमा धनमिच्छन्ति१२१अनेन कर्मणा वेते२७७
अतिदण्डाच्च गुणिनि१८४अधरोष्ठोऽनुचिबुकं३३७अन्तःपुरं वासगृहं२८०
अतिदानतपःसत्य४०२अधर्मतः प्रवृत्तं तं३१३अन्तःपुंमविपकार्तं३५८
अतिदानेन दारिद्र्यं१६२अधर्मशीलन्नृपतेः२०२अन्त्यजश्वादिपरिधि३३५
अतिदुष्टाञ्छठमिता३४१अधर्मशीलो नृपतिः१९९अन्त्यौ द्वौ पञ्चमाब्दे तु३५१
अतिमौढ्यमतिदीर्घं२२अधिकान् कृषिकृत्स्यै वा२४३अन्नं न निन्द्यात् सुस्वस्थ१४४
अतिमद्यं हि पिबतो१८अधिकारमदं पीत्वा७३अन्नं मुक्त्वा जलं१४८
अतो नृपः सूचितोऽपि१९२अधिकारिगणैः कार्य५४अन्नसंस्कारदोषेषु३७७
अधिकारिणमेकं वा७४अन्यगृद्धदारविदं३५

२७ शु०

४१४ | शुक्रनीतिः

चरण / प्रतीकपृष्ठचरण / प्रतीकपृष्ठचरण / प्रतीकपृष्ठ
अन्यथा दुःखमाप्नोति१६१अभावे क्षत्रिया योज्या१२३अवाहितो भवेन्मन्दः३४५
अन्यथा दुःखमाप्नोति१७८अभावे वीथिनो माता३१५अविचिन्त्य नृपस्त्वर्यं३१३
अन्यथा मृतिगुह्यन्तं२८७अभिमानाच्च लोभाच्च२९९अविमर्देऽपि विमर्दे१४६
अन्यथाऽऽसुर्धनमुद्धर्४०९अभियुक्तनिरुद्धैर्वा३९अविवेकी यत्र राजा१३३
अन्यथाऽऽसुर्धनमुद्धृद्१४५अभियुक्तस्तथाऽन्येन२८५अविसंवादि विद्वद्भिः४०९
अन्यथाऽऽसुर्धनहरा२४८अभियुक्ताय दातव्यं३०९अव्यक्तमेव क्रीणाति३२०
अन्यथा योजितास्ते तु३९०अभियोगानुरूपेण२८८अभ्यास्यागम्यमित्येतत्२९१
अन्यथा शक्तितान्सन्ध्यान्३०३अभेद्यं व्यूहविद्वीर१२४अभ्याहताशः संतुष्ये५०
अन्यथा शीलनाशाय४०६अमात्यः प्राङ्‌विवाकश्च६७अभ्याहताङ्गस्तेजस्वी२७
अन्यथा स्वप्रजातापो२०५अमात्यः प्राड्विवाको३१४अभ्यङ्क्तिनक्षमो येन४७
अन्यथा ह्यभियोक्तारं३१४अमात्यमपि संवीक्ष्य५४अशक्यो निर्णयो ह्यन्यैः२७१
अन्यद्रजोधिकं तेज१७१अमात्यो दूत इत्येता६७अशिक्षितमसारं वा३६२
अन्यस्यावर्तकस्त्वारम्१०५अमितस्य प्रदातारं२४२अशीतिवत्सरं यावद्३५०
अन्यान् सूनृतया तस्यै१२१अयं सहस्रापराधी१३१अशीत्यश्वान् रथे चैकं३३१
अन्यायकारो कलह१९७अयुक्तं यत् कृतं चोक्तं१३१अशुभं चातिसंलग्न२४२
अन्यायगामिनि पत्न्यौ६५अयोग्यः पुरुषो नास्ति७५अशोधकनृपान्नैव४९
अन्यायवर्तिनां राज्यं५४अरक्षितारं नृपतिं१९अशोधयित्वा पक्षं ये२८३
अन्यायेनाभितो यस्माद्२०२अरिमेदश्च पीतद्रुः२४६अशौचं निर्दया दर्पः१५३
अन्यार्थमर्थहीनं च२८९अरेद्विषत्गुणाम् ज्ञात्वा१७८अश्वः सन्ताड्यते प्राज्ञैः१४६
अन्येषांमन्यधीनाञ्च२३७अर्जने तु महद्दुःखं२०६अश्वत्थो विचरेद्यातां४०९
अन्योदवासहिष्णुश्च१६७अर्जुनाद् ग्राहिता स्वस्य४०५अश्वस्य षट् सिता दन्ता३५१
अन्योदयासहिष्णुश्च१९७अर्थमपहुते वादी३०५अश्वानां च गजानां च३६९
अन्योन्ययोः समक्षं तु२९३अर्थशास्त्रं कामशास्त्रं२२५अश्वे जयो वृषे धैर्यं१६५
अपराधं मातृस्नुषा१५३अर्थस्य पुरुषो दासो४०२अष्टतालप्रमाणस्य२६६
अपशब्दाश्च नो वाच्या१७८अर्थाद् धर्मश्च कामश्च४०२अष्टतालवपुस्त्यैव२१६
अपसृत्याक्षसिद्धयर्थं३७०अर्थानर्थों तु वार्तायां२४अष्टताला द्वापरे तु२५१
अपाणयः पाणिमता३७६अर्थिना लिखितो ह्यर्थः२९२अष्टप्रकृतिभिर्युक्तो६७
अपि ज्ञेयस्करं नृणां२४९अर्थिनः पूरयेद्दीनं२८३अष्टमांशं पारितोष्यं१२०
अपि स्यात्तुमुदासीत९१अर्थिप्रत्यर्थिसाक्षिभ्यो३००अष्टमे पतितोत्पन्नौ३५२
अपृष्टो नैव कथयेद्१३५अर्थो वा यदि वा धर्मे४०२अष्टाङ्गुलं ललाटं स्याद्२५३
अप्रयत्नेन च स्त्रिया२९८अर्धचन्द्रां वर्तुलां वा३२अष्टादशाब्दतस्तो हि३५१
अप्रशस्तं तयोर्नैव२९५अर्धशेनारमभोगश्च४६असंमतं विरुद्धं वा६३
अप्रधानः प्रधानः स्याद्९४अर्धाङ्गुलाधिका वापि३३६असंवलितपद्म्यां तु३४९
अप्रवासी गृही नित्यं१८०अर्ध्य शतधनुः प्रोक्त३४७असत्यं कार्यघातित्वं१६६
अप्रसिद्धं निराधारं२९०अल्पायुर्मूत्रकृच्छ्रार्थंअसाहाय्यं च तत्कार्ये१५९
अप्रेरितहितकरंअस्वीकृतं विभागेन५०असिद्धस्तं परासेध२८६
अडाका मध्यवयसः७७अवश्यंभाविभावानांअसूयकः शत्रुसेवी१९७
अशक्यमक्षणे चैव२८८अवश्यपोष्यभरणा११८अस्तीति न च मिथ्ये२८९
असमर्थं च वरं दद्याद्२५८अवश्यमेव भोक्तव्ये१४अस्त्रं तु द्विविधं ज्ञेयं३५६

श्लोकानुक्रमणिका

४१५

अक्षाद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थं३६१आन्वीक्षिक्षात्मविज्ञाना२५
अस्मिन्नर्थे समानेन२१२आपत्कालेऽन्यदुर्गाणा३२५ईर्ष्यास्ते चोपसन्धाने३७७
अस्य क्षिप्यते यत्तु३५६आपत्स्वपि न देयानि३१९ईशता चाधिकतरा२२१
अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः३१५आपदं प्रतरिष्यामो४०४ईषत्कुटिलदण्डाग्र२६३
अस्वामिकं कति प्राहुं७२आपद्युन्मार्गगमने९०ईषदूत्प्लुत्य गमन३४९
अहिंसेवासाधुहिंसा१८९आपन्नः सन्धिमन्विच्छेत्३६४
आप्तवाक्यमनादृत्य१९१उक्तं राष्ट्रप्रकरणं३२३
आकुञ्चिताम गदाभ्यां३४९आयः साहसिकः सैव१०७उक्तं संक्षेपतो लक्ष्म२२५
आचारप्रेरको राजाआयव्ययप्रविज्ञाता६९उक्ते तु साक्षिणा साध्ये३०१
आचार्यः सर्वचेष्टासु१३१आयुक्तिको विंशतिभिः४१०उचितं तु व्ययं काले१५८
आज्ञापयामतश्चाहं१६आयुर्बीजहरी राज्ञा२७०उच्चैः पदण्यासगतिः३४४
आशामुलंघयन्ति स्म१००आरम्भं तस्य कुर्याद्धि४०८उच्चैः प्रहसनं कासं८९
आशामग्रस्तु महतां१४५आरामकृत्रिमवन८६उत्फतिंतुं समर्थोपि१७
आशाशुकांश्च भूनकान्८७आर्जकस्यैव दुःखं स्यात्२०६उत्कृती सस्यघाती वा२८२
आशोल्लङ्घनकारित्वं२८२आवर्तकविहीनौ तु११०उत्कृष्टमातिशीतानां२७२
आततायित्वमापन्नो३७८अनुक्तार्थं स्मृतं मान१२१उत्कोचं नैव गृह्णीयात्९८
आत्मनो विपरीतश्च३६२आवर्तौ जायते येषां३३९उत्कोचग्रहणं नैव४३
आत्मपितृभ्रातरश्च१८१आवेदयति यत्कार्यं४८उत्तमा द्विगुणा मध्या४१०
आत्मपितृमातृगुणैः१५९आवेदयति यत्पूर्वं२८०उत्तमाऽधममध्यानां२७४
आत्मवत् सततं पश्ये१२६आशीविषमिव क्रुद्धं८९उत्तमार्थं तदर्धं२१२
आत्मशुद्धिपराणां च३०९आसमन्ताच्चतुर्दिक्षु१८४उत्तमैरननुज्ञातं१४९
आत्मस्त्रीधनगुह्यानां१३आसिंधुनौगमाकूले३२उत्तमो नीचसंसर्गाद्२२३
आत्मस्त्रीधनगुह्यानां१८१आसीनः स्याद्विमुक्ताक्षः३७०उत्तमो मध्यमो नीचो१५९
आत्मस्त्रीपुत्रमित्राणि१५६आसेधकाल आसिद्ध२८४उत्तरे मद्यपा नार्यः२७६
आत्मानं गोपयेत् काले३६५आसेधयेद्विवादार्थी३१उत्थाप्य शयनीयानि२३८
आत्मानं प्रथमं राजा१५आ स्तनात् पृष्ठदेशान्ता२५५उत्थाय पश्चिमे यामे४०
आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी३०१उत्पन्नोत्पत्स्यमानानां१९३
आदानमाशुकारित्वं२३६इङ्गितं चेष्टितं यत्नात्४८उत्सगार्थं गुहान्कुर्यां३३
आदौ तद्धितकृत्स्नेहं४०६इङ्गिताकारचेष्टाभ्य९२उत्सृष्टं रिपुणा वापि३२९
आदौ वरं निर्धनत्वं१७३इङ्गिताकारतत्त्वज्ञो६७उत्सृष्टा वृषभाद्या४५
आद्यः पुनस्त्वदन्तिमांशं३९२इच्छ्या ताडितं कृत्वा११५उदग्गृहान् प्रकुर्वीत३४
आधर्यकेभ्यश्चोरेभ्यो८२इच्छया स्थितरः कुर्यात्३०९उदग्गच्छतहस्तां प्राक्३७
आधपणं न कुर्वेन्तु४५इज्याध्ययनदानानि२२३उदरं च तथा बस्ति२६६
आधराधेयरूपौ वा११४इतरः कीर्तितस्तज्ज्ञै१०८उदुम्बराश्वत्थवट२४४
आधिः सीमा बालधनं१०४इति ज्ञेयं निराबाधं२९०उद्धृतेषुमयो शृङ्गा३७८
आनृशंस्यं परो धर्मः२५इति शक्तिमयोगेन३०३उद्धम्य शस्त्रमायान्तं३७८
आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता२४इन्द्रनीलं पुष्परागो२०८उद्वेजते जनः कौर्याद्१६२
आन्वीक्षिक्यां तर्कशास्त्रं२५इन्द्राग्नौ तावुभौ शस्तौ३४०उपदेशो हि मूर्खाणां१८४
इन्द्रानिलयमार्काणा१२

४१६ | शुक्रनीतिः


पाद/विषयपृष्ठपाद/विषयपृष्ठपाद/विषयपृष्ठ
उपभोगाय च धनं२८एकस्यैव हि योऽशक्तो१६कन्याया अपि विक्रेता१९७
उपमानेन तज्ज्ञानं१८०एकशीलवयोविद्या१८४कफोणिपातोऽप्यसकृत्३८०
उपहारस्य भेदास्तु३६४एकार्थचर्यां साहित्ये९२करदाश्च मवन्त्यन्ये१८८
उपहारादृते यस्मात्३६४एकेनैकश्च श्लोकेन१८४करदीकरणं राज्ञा२०
उपायनञ्च गृह्णाति९३एकैकं वादयेत्तत्र३००करत्रयात्मिका पथ्या३९
उपायान्तरनाशे तु३६६एकैकशो दिशो वाऽपि३७०कराग्रे परिधिर्ज्ञेयः२६४
उपायान् षड्गुणं मन्त्रं३६१एकैकशो विनिर्घ्नन्ति२७करिष्यामीति ते कार्यं९१
उपायान् षड्गुणं मन्त्रं१८२एकोदरा अपि प्रायो१५८करैः पंचसहस्रैर्वा३०
उपायान् षड्गुणान् वीक्ष्य३७४एणो गजः पतङ्गश्च१२८करैर्वा प्रमितेर्माने१८६
उपायेन पदं मूर्ध्नि३७३एतावती भृतिं तेऽहं११७करोति निष्फलं कर्म१७१
उपायेन यथा व्यालो१८४एते वश्यकरोपाया१५१करोति विविधान् पन्थान्३४०
उपेक्षया च निपुणैः३६६एनमर्थि दापयिष्ये२८८करोति स नृपः श्रेष्ठो२०४
उपेक्षेत प्रनष्टं यत्१४१एवं परिचरन्ती सा२४०करोत्यकार्यं साशोऽन्यं१६७
उपेक्ष्य तस्मिन् तद्धानं२६७एवंविधानमाधूंश्च१९९करोत्याथर्वणं नैव१८८
उभयं दुर्बलं प्रोक्तं३२९एवंविधान् नृपो राष्ट्रे२६८कर्णचूर्णाग्निदानेन३५९
उभयानुमतः साक्षी२८९एवंविधा राजसभा३७कर्णनेत्रान्तरं नित्यं२६४
उभयोः प्रतिभूग्राह्यः२८९एवं विग्रोऽनिष्टगमो३३२कर्णयोरन्तरे व्यासो२६४
उभौ तत्र स्थिरा लक्ष्मी१५एवंविधो रथो राज्ञा३३१कर्णग्रन्ध्यन्तरं तु२५४
एवं विहरतो राज्ञः४२कर्णे श्यामः श्यामकणैः३४१
ऊढया कन्यया वापि३१८एवमादिषु जातेषु१८२कर्णौ च भूसमी ज्ञेयौ२५४
ऊनविंशत्यङ्गुलः स्यात्२५५एषां लङ्घनैर्विमिश्रितो३३२कर्तव्यं यामिकैरेवं४३
ऊरुमूलस्य परिधिः२६४एषां संख्या निकृष्टानां१०८कर्तव्याः प्रागुदक्श्वेता३७
ऊरुपु च शुभागतौं३४२एषु स्पर्शो वरस्त्रीणां१२८कर्मणा विग्रदस्तं तु३६३
कर्मणोत्तमनीचत्वं२२३
ऋग्यजुः साम चाथर्व२२५ऐकमर्त्यं विना युद्धं४०२कर्मशीलगुणाः पूज्या६५
ऋग्रूपा यत्र ये मन्त्राः२२६कर्मैव कारणं चात्र
औषधं तु मुखमानेन३३४कर्ममात्रॉस्तण्डुलांश्च१०८
एकं शास्त्रमधीयानो२७४कलहे न सहायः स्यात्१५२
एकं शास्त्रमधीयानो१४७कटिश्लक्ष्णानुमुष्क३४२कलादशकमैतद्धि२३३
एकः स्वादु न भुञ्जीत१३४कठाधोमुखमानेन२६५कलाऽभिलाक्षीते देशे२३४
एकद्वित्रिचतुर्हस्तं२५७कथं वसेत्तदुद्वृत्तं१५८कल्पयित्वोदरं सम्यै२१४
एकभूमिं समारोप्य२५७कथा विचित्राः कुर्वाणाः३७७कल्पयेच्च यथायिक्यं४१०
एकवारमप्यशितं९४कथितं प्राड्विवाकादौ२८३कल्पयेन्मध्यमं मध्ये३९
एकवासास्तथाऽन्यञ्चो२८०कदापि नोग्रदण्डः स्यात्१३९कल्पयेत्सावनं नित्यं११७
एकविंशाङ्गुलं सन्धि२६६कनिष्ठिकानामिकातो२५२कश्चितस्त्वविमूढो वा२३१
एकस्मिन्नधिकारे तु२०७कनिष्ठिकायाः परिधिः२५६कवचं सशिरस्त्राण३६०
एकस्यैकेन वा द्वाभ्यां३६१कन्यां दद्यादुत्तमं चेन्१५४कश्चित्तु तद्गिलोऽस्तीति१६२
एकस्यैव न पर्याप्ता१६७कन्याभिका पालनीया१५३कस्यापि नेश्वरः कर्त्ता२३०
कांचित् सुकुशलप्रश्ने१३१

श्लोकानुक्रमणिका

४१७

श्लोकार्ध / पादपृष्ठश्लोकार्ध / पादपृष्ठश्लोकार्ध / पादपृष्ठ
काचपात्रादिकरण२३६कुटुम्बिनां गृहार्थं तु४१०कोपं करोति दौरात्म्या२१
का जातिः किं कुलं नाम४०कुडाको लवली धात्री२४४कोशभूतस्य द्रव्यस्य४०
कामः प्रजापालने च२९कुनृपस्य छलं नित्यं१७०कोशवृद्धिं सदा कुर्यात्३१४
कामः क्रोधस्तथा मोहो२३कुमार्गगं नृपमपि५८कोष्ठकानां च भूमीर्वा३७
कामक्रोधौ तु संयम्य३१५कुम्भकर्णोऽथ नमुचिः२५०कोष्ठविस्तारषष्ठांश३४
कामक्रोधौ मदस्तमौ१९२कुम्भकाराः शौल्विकाश्च८६कौटिल्येन प्रदानेन३५५
कामादिनेकशयने१८३कुर्यात्संशयं सीमान्तं४०कौशेयेन कलामिश्र१५०
कारणात् पूर्वपक्षोऽपि२९४कुर्याद्धि विग्रहे पुंसां३६६कौसीदवृद्धया पण्येन१५६
कारणादिसमायोगाव१११कुर्याद्यथा समीक्षेतत१५२क्रमश्रो वा नृपा ज्ञेया१८४
कारुशिल्पिगणाल्पत्वे२१९कुर्याद्विहारमाहारं१४४क्रमात्स्वदशगुणिताः१२६
कार्य न चिन्तयेद्राजा३०२कुर्वन्ति लेखपत्रं यत्१०४क्रमादभावे दौहित्र५१
कार्यं पृथक् पृथक् सम्यै२७४कुर्वन्त्यन्यत् तद्विधं वा२१९क्रमादर्थं रक्षयेद्वा२०५
कार्यं निवेद्यते येन१०२कुर्वीत नृपतिर्नित्यं४०३क्रमाद्वन्दे च भवतश्च१५२
कार्यं हि साध्यमित्युक्तं२९१कुलगुणशीलवृद्धान्५८क्रयं वा विक्रयं वापि४४
कार्यक्षमश्च प्राचीनः७०कुलटा पतिपुत्रघ्नी१९७क्रयविक्रयकुशला ये
कार्यमादिश्यते येन१०२कुलमर्क्षाञ्च यो द्वेष्टि१९९क्रयविक्रयातिखिप्सां१३५
कार्या व्यापकमाप्यानां११२कुलादिभ्योऽधिकाः२७४क्रियतेऽन्यर्हणीयाय२६
कार्येऽप्यावश्यके प्राप्ते३६२कुलोद्भवं सत्यमार्यं३७२क्रियया कार्यिकं वीक्ष्य२९२
कार्यो द्वौ सर्वदा तो तु३७३कुबेरामङ्गलाशोच१९७क्रियाफलमभिधाय१३७
कालं नियम्य कार्याणि१७५कुशलादिपरिमश्नी९३क्रियावसानबिरसे१६
काष्ठं मृत्यव्यये देयं३८९कुसन्तत्या कुलं चात्मा१७४क्रीडयेन्नृपत्यां कुर्याद्४८
कालमानं त्रिधा ज्ञेयं११७कुसीदं कृषि बाणिज्यं२४क्रूरकर्मा सदोषुक्को५५
कालस्य कारणं राजा१०कूटपण्यस्य विक्रेता३२१कश्चित् बालस्तुरङ्गं२६८
कालानुकूल्ये विस्पष्टंकूटसाक्ष्यं कूटलेख्य४४कञ्चित्तेवोचमा वृत्तिः१७२
कालेऽतीते विस्मृतिर्वा१०२कूटेन निहतो वाजिः१८४कञ्चिन्मेवासकृच्छुल्कं२१७
काले यदुचितं कर्तुं९४कूपवापी पुष्करिण्यः२४६खगं युद्धाय सञ्जेत१८६
काले विपन्ने पूर्वोक्ते३०५कूर्मपृष्ठा मार्गभूमिः३९क्षणे क्षणे यामिकानां३९२
काले वृष्टिः सुपोपाय४२कृतं चेत्क्षम्यते देवाद१६१क्षत्रियादीनांन्यथा१७१
काले हितमिताहार१४४कृतगुल्मं स्वयं गुल्मं३२९क्षत्रियो नास्य तद् कर्म३७५
किं पुनर्मनुजा नित्यं२२कृतपूर्वाऽहृकाभ्यर्थे२३८क्षमते योऽपराधं स१३
किमल्पसाधनोऽशूरः३५४कृतो तत् कुरुते नित्यं४०९क्षमया यत्तु पुण्यं स्यात्१८९
किमाश्चर्यमतो लोके६२कृत्वा तु यौवराज्यार्हान्६०क्षमाच्छिद्रानि चान्यानि२९७
किमुच्येत कुटुम्बीति१९कृत्वा स्वस्य तुलासाम्यं३०७क्षमाशीलस्य वै राज्ञो१९६
कीनाशाः कारुकाः शिल्प२७१कृतोत्सर्गे तु विष्णुं हि८८क्षमिणं बलिनं साधुः१७७
कीर्तनं चार्थशास्त्राणां२२९कृष्णं सितं क्रमाद् रक्तं२११क्षिपन्ति चाग्निसंयोगाद्३५९
कीर्तिमन्त्यनृपाणां वा९०कृष्णं सितं पीतरक्तं२१०क्षुभ्यस्तनोति मर्माणि२३
कीटकोडे तु स्वर्णादि३९२कृष्णतालुः कृष्णजिह्व१४४क्षुरधारेण मनसो१८४
कुटीकन्दुकानेपम्य७१कृष्णपादो ऽरिनिन्द्यः"क्षुरप्रान्तो नाभिसमो३६०
कुटुम्बपोषणे स्वामी१५३केवलैः साक्षिभिर्नैव३०३

४१८ | शुक्रनीतिः


श्लोकांश / सूत्रपृष्ठ
खादिराश्मन्तशाखाभि२४६
खनिः सर्वधनस्थेयं२८
खलसत्यमपथ्यं तु तद्१७४
खलीनस्योर्ध्वसम्बन्धौ द्वौ३५३
खादन्न गच्छेद्ध्यानं१४९
खारिका स्यान्निधत्ते तद्११६

श्लोकांश / सूत्रपृष्ठश्लोकांश / सूत्रपृष्ठ
गच्छेत् षोडशमात्राभि३४६गुणहीनोऽप्यहीनः सन्१४६
गजमाने शङ्कुखं स्याद्३३३गुणाधिक्यं कीर्तयति१७६
गजानां च तथाऽश्वानां७०गुणी तावद् देवतार्थं३२
गजाश्वरथगत्या तु२३४गुणो सुनीतिनैन्द्योऽपि४००
गजाश्वरथपथादीन्५३गुणेनैव तु मूल्यं हि१९४
गजाश्वरथपादात७४गुप्तं क्लिांसवे नैव१४२
गजो गवेन यातव्य१८३गुरुत्वात् प्रभया वर्णाद्२०९
गजो निबध्यते नैव१९३गुरोरप्यवलिप्तस्य१८९
गजोष्ट्रभूषणाद्यर्थ३३१गुल्मीभूतं साधिकारि३२९
गङ्गागृहं पृथु ग्रामाद्२४४गुह्यं कर्म च मन्त्रं च९१
गणनाकुशलो यस्तु८२गुह्यपुच्छत्रिकावत्तौ१४१
गणेशस्य रवेश्चैव्याः२४७गूढसन्धयस्थिधमनी२५९
गतयः षड्विधा धारा३४९गूढास्तु प्रकटाः सभ्यैः२९५
गतवेदस्य शान्तस्य३४८गृहं बहुकुटुम्बेन१६५
गति संवर्धयेन्नित्यं१४७गृहपंक्तिमुखे द्वारं४२
गतिं शिक्षां चिकित्सां च७६गृहिणो न पराधीनाः२९९
गतिमभ्यासनः३५२गृहीत्वा तत्प्रतिमुखं२२०
गत्वा स्वकार्यशालां वा८८गृह्णीयात् सुप्रयत्नेन२०६
गरीयस्तारमेताभ्यां८७गोऽजाश्वोष्ट्रमहिषी४४
गरीयांसो वराः सर्वे४९गोप्यमोग्यक्रियायुक्तं१०४
गर्भं धत्ते न बन्ध्येयं२९०गोमांसमुदकञ्चैति२४५
गलमध्ये पृष्ठमध्ये३४२गोमेदः प्रियकृद्दाहो२०८
गलमध्ये शुभ्रस्त्वेकः३४२गोलो लोहमयो गर्भं३५८
गवां समं सार्धगुणं२१६ग्रामाद् बहिर्वसेयुस्ते४११
गवादिदुग्धाङ्गफलं२२०ग्रामायैकैऽचडाग्रैकै१५६
गारुत्मतं तृणं चेन्२१३ग्रामाद्बहिः समीपे तु३८७
गिरिन्द्रशिखराकारो१७ग्रामे ग्राम्यान् वने वन्यान्२४४
गुणं हि दुर्गुणीकृत्य१७६ग्रीवामूलस्य परिधिः३३६
गुणसाधनसंसद्धः१३ग्रीष्मसूर्यांशुसंतप्त२५
गुणस्थापनसंरक्षा४५

श्लोकांश / सूत्रपृष्ठश्लोकांश / सूत्रपृष्ठ
चक्रवर्ती स विज्ञेयो३४०चतुर्गुणं हि पादात्३३०
चण्डरश्मातातयित्वं१८८चतुर्गुणेन यत्नेन६५
चण्डीभैरववेताल२५०चतुर्थमाक्षिकबलं१२७
चतुष्करात्मको दंडो३०चतुर्थांशं तु हृदयं१३७
चतुःषष्टिकला ह्येताः२३७चतुर्थांशान् गजानुष्ट्रान्३३०
चतुरङ्गुलं ललाटं स्या२५१चतुर्दशाङ्गुलानूरू३३४
चतुरङ्गुल उत्सेधो२५५चतुर्दिक्ष्वथवा देशा५०
चतुरङ्गुला भवेद् ग्रीवा२५२चतुर्दिक्ष्वष्टपरिधिः३७१
चतुर्दिक्ष्वण्डपं वापि२५७-
चतुर्धा भेदिता जातिः२२२
चतुर्भिः क्षत्रियं हन्यात्२८१
चतुर्भिः पञ्चभिः पद्भिः३३
चतुर्मुखैः समं प्रोक्तं३१
चतुर्माषमितं स्वर्णं२१७-
चतुर्विंशतिभिर्मक्तो२१३
चतुर्विंशत्यंगुलैस्तैः३०
चतुर्विंशाक्षरैरेव१२
चतुर्विधस्तथा पार१०९
चतुर्विधोऽपराधः स१९२
चतुष्पाद् व्यवहारः स्यात्२९६
चतुस्तालात्मको बाहू२५२
चत्वार आत्ममास्तस्य३७६
चत्वारिंशत्समा नीताः१२०
चत्वार्येतानि सन्त्यज्य१५२
चित्तापनयनं चैव३०५
चिन्तनीयं बुधैर्लोकात्२१७
चिन्तामणिः स विज्ञेयः३४१
चिरं संशृणुयान्नित्यं१३५
चीरैर्दन्तं पापदत्तं१६१

श्लोकांश / सूत्रपृष्ठ
छत्रातपत्रचमर१२१
छन्नभूप्रैस्तु तद्रूपै१५१
छायेव वर्तते नित्यं१६७
छायेवानुगता स्वच्छा२३९
छिद्रं सश्रखनं पातो३५१

श्लोकांश / सूत्रपृष्ठ
जंगमस्थावराणां च११
जङ्घामूले तु परिधिः२४५

श्लोकानुक्रमणिका

४१६

श्लोकांशपृष्ठश्लोकांशपृष्ठश्लोकांशपृष्ठ
जहे उत्समे कार्ये२५१ततोऽर्हति प्रमाणं तु२९९तथाविभापोरगहस्त७५
जल्पत्याशयमूह्यैव१२७तत्कर्म नियतं कुर्याद्३३तया श्वम्बादिसन्धानं७९
जपहोमार्चनं यस्य२२६तत्कर्मजातकेल्यं तु१०१तथैव ते पालनीयाः२७६
जपोपवासनियम८३तत्कर्म्ये कुशलं चान्यं७३तदनीत्या न वर्तेयुः३१९
जयप्रेम्ण सम्धेयां२९१तत्कर्मेषु कुशलाम्७५तदंगु स्वात्मतिथिभिः३७
जलस्थस्करराक्षाभि२१८तत्कृतं मन्यते राजा१४तदयौ तत्कृतां वार्ता९३
जलदुर्गं स्मृतं तज्ज्ञैः१२४तत्तन्मतानुगैः सर्वैःतदर्थेच तदर्थश्च२००
जातिं तुलां च मौर्यं च८०पत्तेजसोऽनुतेजांसि१७१तदर्भा कटके ज्ञेया३२३
जातो संघे प्रातिकूल्यं१६८पत्तेनैव कृतं ज्ञेय२८७तदाज्ञां धारयित्वादी८९
जाख्यानान्यर्थं तु सम्प्राप्तं२२३तत्पृष्ठांश्च पादातान्१८१तदापि ब्राह्मणा युद्धे१७९
जानाति युद्धसम्भारं७८तत्प्राप्तिपत्रं गृह्णीयाद्३८९तदाख्यानि तज्जाति२४७
जानानि स शतानीकः७७तत्वं सत्यार्थामिधाथि२९५तदीयकुशलप्रश्नेः१४३
जानुसंस्थ्यां यदावर्त्तः१४१तत्पत्रं वादिमान्यं चेज्१०४तदुर्ण्णं तु भवेद्राजा२८
जायते राष्ट्रहासश्च१९१तत्यापभागन्वथा स्याद्११८तदेव हि भवेद् वेष्य२२१
जारजारो बलिद्विष्टो१५२तत्पुत्रो विवदेद्यज्जो२८८तदैव नृपतिः पूज्यो३९२
जितेन्द्रियस्य नृपते२४तत्र प्राप्नोति फलं तस्ये१२६तद्गुणो यदि तत्पुत्र७३
जितेन्द्रियो जितक्रोधी६८तत्रत्यानि देनिकानि४२तद्दण्डाब्जायते कीर्ति१८९
जीवत्तोरस्वतन्त्रः स्यात्३१५तत्रस्थगुणदोषाणां तु२७२तद्दत्तवस्त्रभूषादि९३
जीवन्नेव मृतः सोऽपि१७९तत्राधिकगुणानां च१००तद्नं द्विगुणं याव३९२
जीवन्रसम्विता पुत्रे३१८तत्राभियोक्ता प्राक् पृष्टो२९१तद्सृत्यंर्थं तु सन्दद्यात्२००
जीवामि शतवर्षं तु१५५तत्रैव कल्पयेद् द्वारं३५तद्वेषणं च संवेत्ति८०
ज्ञात्वा पूर्वं भागमिच्छुः२१८तत्सन्देहविनाशार्थं२११तन्नामस्य वशीकुर्यात्३९७
ज्ञानकर्मोपासनाभितत्सहायबलं नैव१८४तद्विचिकुरुते द्वास्तु८८
ज्ञानलवदोर्विदग्ध्वा१७३तत्त्ासाधनं तु द्विविधं२९४तद्वद् बुद्धिस्तदीयेषु३५
ज्ञायेत हृष्टवदनः९३तत्सिरयं सञ्जयन्तिस्म२००तद्वाक्यं तर्कतोऽनयं१३९
ज्ञेया षोडशतास्रा तु२५०तथा कोशस्तु संधार्य्यः२०३तद्वृद्धिनर्निीतिनेपुण्याव२०४
ज्ञेयोऽप्रमत्तमो भृत्यः९९तथा चत्वरचैत्यं न१३०तनु कण्ठदन्तरुग्णं३३२
तथा चापाणिकेभ्यस्तु२२१तनोति मात्रया पीतं१८
टङ्केश्चतुभिस्तोलः स्यात्२११तथा न क्रीडयेत् केश्चित्१७८तन्तुवायाः शाकुनिका८६
तथा न पीडयेत् कुत्र४१०तन्त्रीकण्ठोस्थितान् सप्त८५
त एव तेनं दुष्येयु२७७तथा नान्येन मार्गेण२४८तन्न्यूनतां नैव कुर्यात्१६१
त एव हि विजानाति२२१तथापि नैव कुर्वीत१३८तन्मण्डपक्ष ततुख्यः२४८
तडागवापिकाकूप२१८तथा भवन्ति ते नित्यं१७४तन्मन्त्रस्य प्रमेत्ता च२८२
तणागवापीप्रासाद२३४तथाभिजनमचस्तु१४०तन्मोक्षार्थं च यदत्तं३१९
ततः संरोधनं नित्यं१९५तथा भृतिस्तु संयोज्या११८तपःस्वीकृषिसंवासू१७७
ततः स्वगोश्मिक्रगणो३८तथा भोगाय भवति१४तपसा तेज आदत्ते
ततस्तु कोटिपर्य्यन्तः२८तथा लेखकघटके वि१३१तपोविशेषैः सम्प्राप्ता२४३
ततोऽग्रसाधनं कृत्वा२३९तथाविधा गजोष्ट्रादे७८तपोविशेषैर्विबिधे२२४
तथाविधा च पंव्यञ्ची८५तप्ताङ्गारैषु वा गच्छेद्३०७
४२०शुक्रनीतिः
तमाचरेच्च सा नाति २४१तृतीयेऽङ्गे तु सन्दंशौ ३५१दशताले तु विज्ञेयो २६७
तरुण्यस्या वा महती २१५तेजस्वी क्षमते सर्वं १४९दशतालोर्ध्वमानं तु २६७
तस्माच्छास्त्रत एव स्यात् ३१६ते राष्ट्रगुप्तये सन्ध्यायां २२२दशनैः अवणैर्येन २१८
तस्मात् सर्वप्रयत्नेन १९६त्यक्तस्वधर्माचरणा ७दशमापमितं ताम्रं २००
तस्मादेतत् त्रयं त्यक्त्वा १९१त्यक्त्वा नीतिबलं स्वीय २०२दश वाऽष्टौ पलं मूल्यं २१६
तस्मान्न केवलसामर्थ्या ३०३त्यक्त्वेतान् दुर्गुणान् यज्ञा १२९दशशखाखिभियुक्तो ४०९
तस्मिन् स्थितं चेन्न बहु १५७त्यजन्तु सैनिका नित्यं १८८दस्युभिः पीडनं शत्रोः १८६
तस्य तेभ्यो न साहाय्यं स्याद् २१९त्रयोदशाङ्गुलं चाधः २५२दशहस्तमितः कुन्तः ३६०
तस्य सर्वगुणैः किन्तु १४६त्रिंशद्भोजनगन्ता वै २१६दशाङ्गुला विस्तृतितस्तद् २५५
तस्यापि शासनं तैस्तु ३१९त्रिकंसस्यो यदावर्त्त ३४१दशैकाङ्गुलपरिधी ३३५
ताडनं द्रव्यहरणं १८८त्रिकूटः स परिक्षेपो ३३९दातृत्वं धनिके शौर्यं १६५
ताडनं बन्धनं पश्चात् १९४त्रिकोष्ठैः पञ्चकोष्ठैर्वा ३६दातॄणां धार्मिकाणां च १४३
ताडयेन्मध्यमातेन ३४५त्रिगुणा वा यथाकाम ३६दानं सेवैव शूद्रादेः २१४
तादृक् संचारयेद् कौश ३७०त्रिचतुःपञ्चकृत्वो वा ३०६दानक्षीणा विवर्धिष्णुः १६१
तानप्याह्वानयेद्राजा २८६त्रिधा वा पञ्चधा कृत्वा २१९दानमानस्सत्यशौर्यं ४०४
तामसी कृष्णवर्णा तु २६१त्रिभिर्दोषैर्बलं भार्यं ४६दानमानापमानं च १४७
ताम्राधिकं सार्धगुणं २१५त्रिभिर्वा पञ्चभिर्वापि ७३दानमानैर्विमुक्तोऽपि ३१७
तालज्ञो ह्यमतेऽपार्थ ३१८त्रिशतं दारपुत्रास्ते ३३१दानशौण्डः क्षमी शूरो ५
तावद् भवन्ति ते दोषा ३४६त्रिहस्तदण्डाञ्छिखिनो ३६०दानार्थं च विना स्वेतः १५५
तावुभौ चौरवच्छास्यौ ३२०त्रेतायुगे पूर्णदण्डः १९०दानेन वर्धते नित्यं १५५
तिर्यगूर्ध्वच्छिद्रमूलं ३५७त्र्यङ्गुलं तु भवेद्धानु २५६दान्तं कुलीनं मध्यस्थ २७०
तिक्तमांसादिलेहानां २३५दान्तः शूरश्च शक्ताश्च १४
तिष्ठन्ति सधनद्वारे १५६दान्तास्तु सधनो यस्तु ७९
तिष्ठन्तौ सूपविष्टां वा २५९दंडक्यो नृपतिः कामात् २३दासे भृत्येष्व भार्यायां ४३
तिष्ठन्ती नाहनस्था २४९दक्षत्र्यंशगता चानु ११२दास्यमेके च गच्छन्ति १५६
तीक्ष्णवाक्यानमित्रमपि १६४दक्षसंस्था वामसंस्था ५१दास्यामि कार्यमाना सा ११७
तीरितं चानुशिष्टं च ३१३दण्डभूभागशुल्काना २०२दास्याभ्यापत्समुत्तीर्णं ४०४
तुरं मन्दं च कुटिलं ७६दण्डभूभागशुल्केस्तु २०३दिव्यावलम्बने मिथ्या ४०६
तुरप्रचण्डवेगश्च ११८दत्तं लेख्यं साक्षिमथ १०४दीर्घदर्शी सदा च स्यात् १३७
तुलाकृषितमूल्यं स्यात् २११दद्यात्प्रतिकर्षकाय २२०दीर्घद्वेषी क्रूरमद ३६२
तुलापूतखलीनः स्याद् ३४५दद्याद्गृहीतमिष १५९दीर्घं चतुर्भागभूत ११२
तुज्ञाशासनमानानां ४३दद्याद्देशानुरूपं तु १०२दीर्घोरुजङ्घा विकटा २६७
तूर्यमङ्गलघोषेण ३८६दन्तः षडङ्गुलो दीर्घं २६४दुःखदो विपरीतो यो १६७
तृतीयः शपथः प्रोक्तः ३०५दन्तोल्लेखनकश्चैव २८१दुःखाय कन्यकाऽन्येषां १६९
तृतीयांशं चतुर्थांश २१८दम्पत्योः कलहे साक्ष्यं १३६दुरात्मनां च प्राबल्यं १६१
तृतीयांरुकमूलो वा ३५दम्मो दंड इति स्यात २४दुष्कर्मदण्डको राजा १२
तृतीयांशाग्निहीनं तु २१२दयाङ्कुमुंदुवाग्दान ८१दुष्टनिग्रहणं कुर्यात् २६९
तृतीयांशविहीनेन ३३६दर्पस्तु परहासेच्छा ४०१दुष्टनिग्रहणं दानं २०
तृतीयांशाधिकं दैर्ध्यं ३३४दर्शयन् मार्दवं नित्यं ३१७दुष्टयानात्पादगसी १७३