शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
पृष्ठ 504, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 504
४१८ | शुक्रनीतिः
ख
| श्लोकांश / सूत्र | पृष्ठ |
|---|---|
| खादिराश्मन्तशाखाभि | २४६ |
| खनिः सर्वधनस्थेयं | २८ |
| खलसत्यमपथ्यं तु तद् | १७४ |
| खलीनस्योर्ध्वसम्बन्धौ द्वौ | ३५३ |
| खादन्न गच्छेद्ध्यानं | १४९ |
| खारिका स्यान्निधत्ते तद् | ११६ |
ग
| श्लोकांश / सूत्र | पृष्ठ | श्लोकांश / सूत्र | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| गच्छेत् षोडशमात्राभि | ३४६ | गुणहीनोऽप्यहीनः सन् | १४६ |
| गजमाने शङ्कुखं स्याद् | ३३३ | गुणाधिक्यं कीर्तयति | १७६ |
| गजानां च तथाऽश्वानां | ७० | गुणी तावद् देवतार्थं | ३२ |
| गजाश्वरथगत्या तु | २३४ | गुणो सुनीतिनैन्द्योऽपि | ४०० |
| गजाश्वरथपथादीन् | ५३ | गुणेनैव तु मूल्यं हि | १९४ |
| गजाश्वरथपादात | ७४ | गुप्तं क्लिांसवे नैव | १४२ |
| गजो गवेन यातव्य | १८३ | गुरुत्वात् प्रभया वर्णाद् | २०९ |
| गजो निबध्यते नैव | १९३ | गुरोरप्यवलिप्तस्य | १८९ |
| गजोष्ट्रभूषणाद्यर्थ | ३३१ | गुल्मीभूतं साधिकारि | ३२९ |
| गङ्गागृहं पृथु ग्रामाद् | २४४ | गुह्यं कर्म च मन्त्रं च | ९१ |
| गणनाकुशलो यस्तु | ८२ | गुह्यपुच्छत्रिकावत्तौ | १४१ |
| गणेशस्य रवेश्चैव्याः | २४७ | गूढसन्धयस्थिधमनी | २५९ |
| गतयः षड्विधा धारा | ३४९ | गूढास्तु प्रकटाः सभ्यैः | २९५ |
| गतवेदस्य शान्तस्य | ३४८ | गृहं बहुकुटुम्बेन | १६५ |
| गति संवर्धयेन्नित्यं | १४७ | गृहपंक्तिमुखे द्वारं | ४२ |
| गतिं शिक्षां चिकित्सां च | ७६ | गृहिणो न पराधीनाः | २९९ |
| गतिमभ्यासनः | ३५२ | गृहीत्वा तत्प्रतिमुखं | २२० |
| गत्वा स्वकार्यशालां वा | ८८ | गृह्णीयात् सुप्रयत्नेन | २०६ |
| गरीयस्तारमेताभ्यां | ८७ | गोऽजाश्वोष्ट्रमहिषी | ४४ |
| गरीयांसो वराः सर्वे | ४९ | गोप्यमोग्यक्रियायुक्तं | १०४ |
| गर्भं धत्ते न बन्ध्येयं | २९० | गोमांसमुदकञ्चैति | २४५ |
| गलमध्ये पृष्ठमध्ये | ३४२ | गोमेदः प्रियकृद्दाहो | २०८ |
| गलमध्ये शुभ्रस्त्वेकः | ३४२ | गोलो लोहमयो गर्भं | ३५८ |
| गवां समं सार्धगुणं | २१६ | ग्रामाद् बहिर्वसेयुस्ते | ४११ |
| गवादिदुग्धाङ्गफलं | २२० | ग्रामायैकैऽचडाग्रैकै | १५६ |
| गारुत्मतं तृणं चेन् | २१३ | ग्रामाद्बहिः समीपे तु | ३८७ |
| गिरिन्द्रशिखराकारो | १७ | ग्रामे ग्राम्यान् वने वन्यान् | २४४ |
| गुणं हि दुर्गुणीकृत्य | १७६ | ग्रीवामूलस्य परिधिः | ३३६ |
| गुणसाधनसंसद्धः | १३ | ग्रीष्मसूर्यांशुसंतप्त | २५ |
| गुणस्थापनसंरक्षा | ४५ |
च
| श्लोकांश / सूत्र | पृष्ठ | श्लोकांश / सूत्र | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| चक्रवर्ती स विज्ञेयो | ३४० | चतुर्गुणं हि पादात् | ३३० |
| चण्डरश्मातातयित्वं | १८८ | चतुर्गुणेन यत्नेन | ६५ |
| चण्डीभैरववेताल | २५० | चतुर्थमाक्षिकबलं | १२७ |
| चतुष्करात्मको दंडो | ३० | चतुर्थांशं तु हृदयं | १३७ |
| चतुःषष्टिकला ह्येताः | २३७ | चतुर्थांशान् गजानुष्ट्रान् | ३३० |
| चतुरङ्गुलं ललाटं स्या | २५१ | चतुर्दशाङ्गुलानूरू | ३३४ |
| चतुरङ्गुल उत्सेधो | २५५ | चतुर्दिक्ष्वथवा देशा | ५० |
| चतुरङ्गुला भवेद् ग्रीवा | २५२ | चतुर्दिक्ष्वष्टपरिधिः | ३७१ |
| चतुर्दिक्ष्वण्डपं वापि | २५७- | ||
| चतुर्धा भेदिता जातिः | २२२ | ||
| चतुर्भिः क्षत्रियं हन्यात् | २८१ | ||
| चतुर्भिः पञ्चभिः पद्भिः | ३३ | ||
| चतुर्मुखैः समं प्रोक्तं | ३१ | ||
| चतुर्माषमितं स्वर्णं | २१७- | ||
| चतुर्विंशतिभिर्मक्तो | २१३ | ||
| चतुर्विंशत्यंगुलैस्तैः | ३० | ||
| चतुर्विंशाक्षरैरेव | १२ | ||
| चतुर्विधस्तथा पार | १०९ | ||
| चतुर्विधोऽपराधः स | १९२ | ||
| चतुष्पाद् व्यवहारः स्यात् | २९६ | ||
| चतुस्तालात्मको बाहू | २५२ | ||
| चत्वार आत्ममास्तस्य | ३७६ | ||
| चत्वारिंशत्समा नीताः | १२० | ||
| चत्वार्येतानि सन्त्यज्य | १५२ | ||
| चित्तापनयनं चैव | ३०५ | ||
| चिन्तनीयं बुधैर्लोकात् | २१७ | ||
| चिन्तामणिः स विज्ञेयः | ३४१ | ||
| चिरं संशृणुयान्नित्यं | १३५ | ||
| चीरैर्दन्तं पापदत्तं | १६१ |
छ
| श्लोकांश / सूत्र | पृष्ठ |
|---|---|
| छत्रातपत्रचमर | १२१ |
| छन्नभूप्रैस्तु तद्रूपै | १५१ |
| छायेव वर्तते नित्यं | १६७ |
| छायेवानुगता स्वच्छा | २३९ |
| छिद्रं सश्रखनं पातो | ३५१ |
ज
| श्लोकांश / सूत्र | पृष्ठ |
|---|---|
| जंगमस्थावराणां च | ११ |
| जङ्घामूले तु परिधिः | २४५ |