शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
४१७
| श्लोकार्ध / पाद | पृष्ठ | श्लोकार्ध / पाद | पृष्ठ | श्लोकार्ध / पाद | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| काचपात्रादिकरण | २३६ | कुटुम्बिनां गृहार्थं तु | ४१० | कोपं करोति दौरात्म्या | २१ |
| का जातिः किं कुलं नाम | ४० | कुडाको लवली धात्री | २४४ | कोशभूतस्य द्रव्यस्य | ४० |
| कामः प्रजापालने च | २९ | कुनृपस्य छलं नित्यं | १७० | कोशवृद्धिं सदा कुर्यात् | ३१४ |
| कामः क्रोधस्तथा मोहो | २३ | कुमार्गगं नृपमपि | ५८ | कोष्ठकानां च भूमीर्वा | ३७ |
| कामक्रोधौ तु संयम्य | ३१५ | कुम्भकर्णोऽथ नमुचिः | २५० | कोष्ठविस्तारषष्ठांश | ३४ |
| कामक्रोधौ मदस्तमौ | १९२ | कुम्भकाराः शौल्विकाश्च | ८६ | कौटिल्येन प्रदानेन | ३५५ |
| कामादिनेकशयने | १८३ | कुर्यात्संशयं सीमान्तं | ४० | कौशेयेन कलामिश्र | १५० |
| कारणात् पूर्वपक्षोऽपि | २९४ | कुर्याद्धि विग्रहे पुंसां | ३६६ | कौसीदवृद्धया पण्येन | १५६ |
| कारणादिसमायोगाव | १११ | कुर्याद्यथा समीक्षेतत | १५२ | क्रमश्रो वा नृपा ज्ञेया | १८४ |
| कारुशिल्पिगणाल्पत्वे | २१९ | कुर्याद्विहारमाहारं | १४४ | क्रमात्स्वदशगुणिताः | १२६ |
| कार्य न चिन्तयेद्राजा | ३०२ | कुर्वन्ति लेखपत्रं यत् | १०४ | क्रमादभावे दौहित्र | ५१ |
| कार्यं पृथक् पृथक् सम्यै | २७४ | कुर्वन्त्यन्यत् तद्विधं वा | २१९ | क्रमादर्थं रक्षयेद्वा | २०५ |
| कार्यं निवेद्यते येन | १०२ | कुर्वीत नृपतिर्नित्यं | ४०३ | क्रमाद्वन्दे च भवतश्च | १५२ |
| कार्यं हि साध्यमित्युक्तं | २९१ | कुलगुणशीलवृद्धान् | ५८ | क्रयं वा विक्रयं वापि | ४४ |
| कार्यक्षमश्च प्राचीनः | ७० | कुलटा पतिपुत्रघ्नी | १९७ | क्रयविक्रयकुशला ये | ७ |
| कार्यमादिश्यते येन | १०२ | कुलमर्क्षाञ्च यो द्वेष्टि | १९९ | क्रयविक्रयातिखिप्सां | १३५ |
| कार्या व्यापकमाप्यानां | ११२ | कुलादिभ्योऽधिकाः | २७४ | क्रियतेऽन्यर्हणीयाय | २६ |
| कार्येऽप्यावश्यके प्राप्ते | ३६२ | कुलोद्भवं सत्यमार्यं | ३७२ | क्रियया कार्यिकं वीक्ष्य | २९२ |
| कार्यो द्वौ सर्वदा तो तु | ३७३ | कुबेरामङ्गलाशोच | १९७ | क्रियाफलमभिधाय | १३७ |
| कालं नियम्य कार्याणि | १७५ | कुशलादिपरिमश्नी | ९३ | क्रियावसानबिरसे | १६ |
| काष्ठं मृत्यव्यये देयं | ३८९ | कुसन्तत्या कुलं चात्मा | १७४ | क्रीडयेन्नृपत्यां कुर्याद् | ४८ |
| कालमानं त्रिधा ज्ञेयं | ११७ | कुसीदं कृषि बाणिज्यं | २४ | क्रूरकर्मा सदोषुक्को | ५५ |
| कालस्य कारणं राजा | १० | कूटपण्यस्य विक्रेता | ३२१ | कश्चित् बालस्तुरङ्गं | २६८ |
| कालानुकूल्ये विस्पष्टं | ९ | कूटसाक्ष्यं कूटलेख्य | ४४ | कञ्चित्तेवोचमा वृत्तिः | १७२ |
| कालेऽतीते विस्मृतिर्वा | १०२ | कूटेन निहतो वाजिः | १८४ | कञ्चिन्मेवासकृच्छुल्कं | २१७ |
| काले यदुचितं कर्तुं | ९४ | कूपवापी पुष्करिण्यः | २४६ | खगं युद्धाय सञ्जेत | १८६ |
| काले विपन्ने पूर्वोक्ते | ३०५ | कूर्मपृष्ठा मार्गभूमिः | ३९ | क्षणे क्षणे यामिकानां | ३९२ |
| काले वृष्टिः सुपोपाय | ४२ | कृतं चेत्क्षम्यते देवाद | १६१ | क्षत्रियादीनांन्यथा | १७१ |
| काले हितमिताहार | १४४ | कृतगुल्मं स्वयं गुल्मं | ३२९ | क्षत्रियो नास्य तद् कर्म | ३७५ |
| किं पुनर्मनुजा नित्यं | २२ | कृतपूर्वाऽहृकाभ्यर्थे | २३८ | क्षमते योऽपराधं स | १३ |
| किमल्पसाधनोऽशूरः | ३५४ | कृतो तत् कुरुते नित्यं | ४०९ | क्षमया यत्तु पुण्यं स्यात् | १८९ |
| किमाश्चर्यमतो लोके | ६२ | कृत्वा तु यौवराज्यार्हान् | ६० | क्षमाच्छिद्रानि चान्यानि | २९७ |
| किमुच्येत कुटुम्बीति | १९ | कृत्वा स्वस्य तुलासाम्यं | ३०७ | क्षमाशीलस्य वै राज्ञो | १९६ |
| कीनाशाः कारुकाः शिल्प | २७१ | कृतोत्सर्गे तु विष्णुं हि | ८८ | क्षमिणं बलिनं साधुः | १७७ |
| कीर्तनं चार्थशास्त्राणां | २२९ | कृष्णं सितं क्रमाद् रक्तं | २११ | क्षिपन्ति चाग्निसंयोगाद् | ३५९ |
| कीर्तिमन्त्यनृपाणां वा | ९० | कृष्णं सितं पीतरक्तं | २१० | क्षुभ्यस्तनोति मर्माणि | २३ |
| कीटकोडे तु स्वर्णादि | ३९२ | कृष्णतालुः कृष्णजिह्व | १४४ | क्षुरधारेण मनसो | १८४ |
| कुटीकन्दुकानेपम्य | ७१ | कृष्णपादो ऽरिनिन्द्यः | " | क्षुरप्रान्तो नाभिसमो | ३६० |
| कुटुम्बपोषणे स्वामी | १५३ | केवलैः साक्षिभिर्नैव | ३०३ |