शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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४१६ | शुक्रनीतिः
| पाद/विषय | पृष्ठ | पाद/विषय | पृष्ठ | पाद/विषय | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| उपभोगाय च धनं | २८ | एकस्यैव हि योऽशक्तो | १६ | कन्याया अपि विक्रेता | १९७ |
| उपमानेन तज्ज्ञानं | १८० | एकशीलवयोविद्या | १८४ | कफोणिपातोऽप्यसकृत् | ३८० |
| उपहारस्य भेदास्तु | ३६४ | एकार्थचर्यां साहित्ये | ९२ | करदाश्च मवन्त्यन्ये | १८८ |
| उपहारादृते यस्मात् | ३६४ | एकेनैकश्च श्लोकेन | १८४ | करदीकरणं राज्ञा | २० |
| उपायनञ्च गृह्णाति | ९३ | एकैकं वादयेत्तत्र | ३०० | करत्रयात्मिका पथ्या | ३९ |
| उपायान्तरनाशे तु | ३६६ | एकैकशो दिशो वाऽपि | ३७० | कराग्रे परिधिर्ज्ञेयः | २६४ |
| उपायान् षड्गुणं मन्त्रं | ३६१ | एकैकशो विनिर्घ्नन्ति | २७ | करिष्यामीति ते कार्यं | ९१ |
| उपायान् षड्गुणं मन्त्रं | १८२ | एकोदरा अपि प्रायो | १५८ | करैः पंचसहस्रैर्वा | ३० |
| उपायान् षड्गुणान् वीक्ष्य | ३७४ | एणो गजः पतङ्गश्च | १२८ | करैर्वा प्रमितेर्माने | १८६ |
| उपायेन पदं मूर्ध्नि | ३७३ | एतावती भृतिं तेऽहं | ११७ | करोति निष्फलं कर्म | १७१ |
| उपायेन यथा व्यालो | १८४ | एते वश्यकरोपाया | १५१ | करोति विविधान् पन्थान् | ३४० |
| उपेक्षया च निपुणैः | ३६६ | एनमर्थि दापयिष्ये | २८८ | करोति स नृपः श्रेष्ठो | २०४ |
| उपेक्षेत प्रनष्टं यत् | १४१ | एवं परिचरन्ती सा | २४० | करोत्यकार्यं साशोऽन्यं | १६७ |
| उपेक्ष्य तस्मिन् तद्धानं | २६७ | एवंविधानमाधूंश्च | १९९ | करोत्याथर्वणं नैव | १८८ |
| उभयं दुर्बलं प्रोक्तं | ३२९ | एवंविधान् नृपो राष्ट्रे | २६८ | कर्णचूर्णाग्निदानेन | ३५९ |
| उभयानुमतः साक्षी | २८९ | एवंविधा राजसभा | ३७ | कर्णनेत्रान्तरं नित्यं | २६४ |
| उभयोः प्रतिभूग्राह्यः | २८९ | एवं विग्रोऽनिष्टगमो | ३३२ | कर्णयोरन्तरे व्यासो | २६४ |
| उभौ तत्र स्थिरा लक्ष्मी | १५ | एवंविधो रथो राज्ञा | ३३१ | कर्णग्रन्ध्यन्तरं तु | २५४ |
| ऊ | एवं विहरतो राज्ञः | ४२ | कर्णे श्यामः श्यामकणैः | ३४१ | |
| ऊढया कन्यया वापि | ३१८ | एवमादिषु जातेषु | १८२ | कर्णौ च भूसमी ज्ञेयौ | २५४ |
| ऊनविंशत्यङ्गुलः स्यात् | २५५ | एषां लङ्घनैर्विमिश्रितो | ३३२ | कर्तव्यं यामिकैरेवं | ४३ |
| ऊरुमूलस्य परिधिः | २६४ | एषां संख्या निकृष्टानां | १०८ | कर्तव्याः प्रागुदक्श्वेता | ३७ |
| ऊरुपु च शुभागतौं | ३४२ | एषु स्पर्शो वरस्त्रीणां | १२८ | कर्मणा विग्रदस्तं तु | ३६३ |
| ऋ | ऐ | कर्मणोत्तमनीचत्वं | २२३ | ||
| ऋग्यजुः साम चाथर्व | २२५ | ऐकमर्त्यं विना युद्धं | ४०२ | कर्मशीलगुणाः पूज्या | ६५ |
| ऋग्रूपा यत्र ये मन्त्राः | २२६ | औ | कर्मैव कारणं चात्र | ६ | |
| ए | औषधं तु मुखमानेन | ३३४ | कर्ममात्रॉस्तण्डुलांश्च | १०८ | |
| एकं शास्त्रमधीयानो | २७४ | क | कलहे न सहायः स्यात् | १५२ | |
| एकं शास्त्रमधीयानो | १४७ | कटिश्लक्ष्णानुमुष्क | ३४२ | कलादशकमैतद्धि | २३३ |
| एकः स्वादु न भुञ्जीत | १३४ | कठाधोमुखमानेन | २६५ | कलाऽभिलाक्षीते देशे | २३४ |
| एकद्वित्रिचतुर्हस्तं | २५७ | कथं वसेत्तदुद्वृत्तं | १५८ | कल्पयित्वोदरं सम्यै | २१४ |
| एकभूमिं समारोप्य | २५७ | कथा विचित्राः कुर्वाणाः | ३७७ | कल्पयेच्च यथायिक्यं | ४१० |
| एकवारमप्यशितं | ९४ | कथितं प्राड्विवाकादौ | २८३ | कल्पयेन्मध्यमं मध्ये | ३९ |
| एकवासास्तथाऽन्यञ्चो | २८० | कदापि नोग्रदण्डः स्यात् | १३९ | कल्पयेत्सावनं नित्यं | ११७ |
| एकविंशाङ्गुलं सन्धि | २६६ | कनिष्ठिकानामिकातो | २५२ | कश्चितस्त्वविमूढो वा | २३१ |
| एकस्मिन्नधिकारे तु | २०७ | कनिष्ठिकायाः परिधिः | २५६ | कवचं सशिरस्त्राण | ३६० |
| एकस्यैकेन वा द्वाभ्यां | ३६१ | कन्यां दद्यादुत्तमं चेन् | १५४ | कश्चित्तु तद्गिलोऽस्तीति | १६२ |
| एकस्यैव न पर्याप्ता | १६७ | कन्याभिका पालनीया | १५३ | कस्यापि नेश्वरः कर्त्ता | २३० |
| कांचित् सुकुशलप्रश्ने | १३१ |