शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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श्लोकानुक्रमणिका
४१५
| अक्षाद्यैः स्वार्थसिद्धयर्थं | ३६१ | आन्वीक्षिक्षात्मविज्ञाना | २५ | ई | |
| अस्मिन्नर्थे समानेन | २१२ | आपत्कालेऽन्यदुर्गाणा | ३२५ | ईर्ष्यास्ते चोपसन्धाने | ३७७ |
| अस्य क्षिप्यते यत्तु | ३५६ | आपत्स्वपि न देयानि | ३१९ | ईशता चाधिकतरा | २२१ |
| अस्वतन्त्राः प्रजाः सर्वाः | ३१५ | आपदं प्रतरिष्यामो | ४०४ | ईषत्कुटिलदण्डाग्र | २६३ |
| अस्वामिकं कति प्राहुं | ७२ | आपद्युन्मार्गगमने | ९० | ईषदूत्प्लुत्य गमन | ३४९ |
| अहिंसेवासाधुहिंसा | १८९ | आपन्नः सन्धिमन्विच्छेत् | ३६४ | उ | |
| आ | आप्तवाक्यमनादृत्य | १९१ | उक्तं राष्ट्रप्रकरणं | ३२३ | |
| आकुञ्चिताम गदाभ्यां | ३४९ | आयः साहसिकः सैव | १०७ | उक्तं संक्षेपतो लक्ष्म | २२५ |
| आचारप्रेरको राजा | ४ | आयव्ययप्रविज्ञाता | ६९ | उक्ते तु साक्षिणा साध्ये | ३०१ |
| आचार्यः सर्वचेष्टासु | १३१ | आयुक्तिको विंशतिभिः | ४१० | उचितं तु व्ययं काले | १५८ |
| आज्ञापयामतश्चाहं | १६ | आयुर्बीजहरी राज्ञा | २७० | उच्चैः पदण्यासगतिः | ३४४ |
| आशामुलंघयन्ति स्म | १०० | आरम्भं तस्य कुर्याद्धि | ४०८ | उच्चैः प्रहसनं कासं | ८९ |
| आशामग्रस्तु महतां | १४५ | आरामकृत्रिमवन | ८६ | उत्फतिंतुं समर्थोपि | १७ |
| आशाशुकांश्च भूनकान् | ८७ | आर्जकस्यैव दुःखं स्यात् | २०६ | उत्कृती सस्यघाती वा | २८२ |
| आशोल्लङ्घनकारित्वं | २८२ | आवर्तकविहीनौ तु | ११० | उत्कृष्टमातिशीतानां | २७२ |
| आततायित्वमापन्नो | ३७८ | अनुक्तार्थं स्मृतं मान | १२१ | उत्कोचं नैव गृह्णीयात् | ९८ |
| आत्मनो विपरीतश्च | ३६२ | आवर्तौ जायते येषां | ३३९ | उत्कोचग्रहणं नैव | ४३ |
| आत्मपितृभ्रातरश्च | १८१ | आवेदयति यत्कार्यं | ४८ | उत्तमा द्विगुणा मध्या | ४१० |
| आत्मपितृमातृगुणैः | १५९ | आवेदयति यत्पूर्वं | २८० | उत्तमाऽधममध्यानां | २७४ |
| आत्मवत् सततं पश्ये | १२६ | आशीविषमिव क्रुद्धं | ८९ | उत्तमार्थं तदर्धं | २१२ |
| आत्मशुद्धिपराणां च | ३०९ | आसमन्ताच्चतुर्दिक्षु | १८४ | उत्तमैरननुज्ञातं | १४९ |
| आत्मस्त्रीधनगुह्यानां | १३ | आसिंधुनौगमाकूले | ३२ | उत्तमो नीचसंसर्गाद् | २२३ |
| आत्मस्त्रीधनगुह्यानां | १८१ | आसीनः स्याद्विमुक्ताक्षः | ३७० | उत्तमो मध्यमो नीचो | १५९ |
| आत्मस्त्रीपुत्रमित्राणि | १५६ | आसेधकाल आसिद्ध | २८४ | उत्तरे मद्यपा नार्यः | २७६ |
| आत्मानं गोपयेत् काले | ३६५ | आसेधयेद्विवादार्थी | ३१ | उत्थाप्य शयनीयानि | २३८ |
| आत्मानं प्रथमं राजा | १५ | आ स्तनात् पृष्ठदेशान्ता | २५५ | उत्थाय पश्चिमे यामे | ४० |
| आत्मैव ह्यात्मनः साक्षी | ३०१ | इ | उत्पन्नोत्पत्स्यमानानां | १९३ | |
| आदानमाशुकारित्वं | २३६ | इङ्गितं चेष्टितं यत्नात् | ४८ | उत्सगार्थं गुहान्कुर्यां | ३३ |
| आदौ तद्धितकृत्स्नेहं | ४०६ | इङ्गिताकारचेष्टाभ्य | ९२ | उत्सृष्टं रिपुणा वापि | ३२९ |
| आदौ वरं निर्धनत्वं | १७३ | इङ्गिताकारतत्त्वज्ञो | ६७ | उत्सृष्टा वृषभाद्या | ४५ |
| आद्यः पुनस्त्वदन्तिमांशं | ३९२ | इच्छ्या ताडितं कृत्वा | ११५ | उदग्गृहान् प्रकुर्वीत | ३४ |
| आधर्यकेभ्यश्चोरेभ्यो | ८२ | इच्छया स्थितरः कुर्यात् | ३०९ | उदग्गच्छतहस्तां प्राक् | ३७ |
| आधपणं न कुर्वेन्तु | ४५ | इज्याध्ययनदानानि | २२३ | उदरं च तथा बस्ति | २६६ |
| आधराधेयरूपौ वा | ११४ | इतरः कीर्तितस्तज्ज्ञै | १०८ | उदुम्बराश्वत्थवट | २४४ |
| आधिः सीमा बालधनं | १०४ | इति ज्ञेयं निराबाधं | २९० | उद्धृतेषुमयो शृङ्गा | ३७८ |
| आनृशंस्यं परो धर्मः | २५ | इति शक्तिमयोगेन | ३०३ | उद्धम्य शस्त्रमायान्तं | ३७८ |
| आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता | २४ | इन्द्रनीलं पुष्परागो | २०८ | उद्वेजते जनः कौर्याद् | १६२ |
| आन्वीक्षिक्यां तर्कशास्त्रं | २५ | इन्द्राग्नौ तावुभौ शस्तौ | ३४० | उपदेशो हि मूर्खाणां | १८४ |
| इन्द्रानिलयमार्काणा | १२ |