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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 488

४०२ | शुक्रनीतिः

निन्दित होता है वह अधर्म गिना जाता है। अतः धर्म का तत्त्व गहन है, उसका किसी के द्वारा समझ सकना असंभव है।

अतिदानंतपःसत्ययोगो दारिद्र्यकृत्त्विह ।
धर्मार्थों यत्र न स्यातां तद्वाक् कामं निरर्थकम् ॥ ३७ ॥

अत्यंत दानादि करने की निषिद्धता का निर्देश — संसार में अतिदान, तपस्या तथा सत्य का संसम्बन्ध ये तीनों दरिद्रता उत्पन्न करने वाले होते हैं अर्थात् अतिदान से दरिद्र हो जाना जगतप्रसिद्ध ही है, इसी तरह तपस्या में भी धर्मानुष्ठानुष्ठान के द्वारा धन-व्यय होने से एवं धनप्राप्ति धूसंतता करने से होतो है उसमें यदि सत्य का संबन्ध हो तो धनप्राप्ति के असम्भव होने से दरिद्रता होना उचित ही है। जिस वाणी में धर्म और अर्थ न हों तो वह (वाणी) अत्यन्त निरर्थक समझी जाती है।

अर्थे वा यदि वा धर्मे समर्थो देशकालवित् ।
निःसंशयो नरः पूज्यो नष्टः संशयिता सदा ॥ ३८ ॥

धर्मानुसार अर्थार्जन करने वाले की पूज्यता का निर्देश — यदि कोई मनुष्य धर्म तथा अर्थ में समर्थ है अर्थात् धर्मानुसार अर्थार्जन करने में निपुण है और देश-काल का ज्ञाता अर्थात् तदनुसार कार्य करने वाला एवं संशय-रहित है तो वही सदा पूज्य होता है। और जो संशय करने वाला है वह नहीं माननीय होता है।

अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित् ।
अतोऽर्थाय यतेतैव सर्वदा यत्नमास्थितः ॥ ३६ ॥
अर्थाद्धर्मश्च कामश्च मोक्षश्चापि भवेन्नृणाम् ।

अर्थ के लिये अवश्य यत्न करने का निर्देश — अर्थ का दास पुरुष ही होता है न कि पुरुष का दास अर्थ होता है। अतः अर्थ के लिये सर्वदा प्रयत्न-पूर्वक यत्नशील रहना चाहिये। और मनुष्यों के अर्थ से ही धर्म, काम और मोक्ष सभी पुरुषार्थ प्राप्त होते हैं।

शस्त्रास्त्राभ्यां बिना शौर्यं गार्हस्थ्यं तु श्रियं विना · ४० ॥
ऐकमत्यं विना युद्धं कौशल्यं ग्राह्यकं विना ।
दुःखाय जायते नित्यं सुसहायं बिना विपत् ॥ ४१ ५
न विद्यते तु विपदि सुसहायं सुहृत्-समम् ।

शौर्यादिकों का शस्त्रास्त्रादि के बिना दुःखदायी होने का निर्देश — शस्त्र और अस्त्र के बिना शूरता, स्त्री के बिना गार्हस्थ्य (गृहस्ती), सैनिकों की एकता के बिना युद्ध, समझने वाले के बिना चतुराई, और सुन्दर सहायक के बिना