शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०३
विपत्ति नित्य दुःख देने के लिये ही होती है । और विपत्ति में सुन्दर मित्र के समान अन्य कोई सच्चा सहायक नहीं होता है ।
अविभक्तधनान् मैत्र्या भृत्या भक्तधनान् सदा ॥ ४२ ॥
मित्रं स्वसदृशैर्भोगैः सत्यैश्च परितोषयेत् ।
अविभक्त और विभक्त ज्ञातिवर्ग तथा मित्र के साथ व्यवहार के प्रकार का निर्देश— जिनके साथ धन का बँटवारा नहीं हुआ है अर्थात् एक साथ रहनेवाले जो ज्ञाति-वर्ग के हैं, उन्हें सौहार्द भाव से, और जिनके साथ धन का बटवारा हो चुका है, ऐसे लोगों को मासिक या वार्षिक वृत्ति-प्रदान द्वारा, एवं मित्रों को अपने सदृश भोग ( भोजनादि ) का प्रबन्ध तथा सत्य व्यवहार द्वारा सदा राजा सन्तुष्ट रखे ।
नृपसम्बन्धिस्त्रीपुत्रसुहृद्भृत्याविदस्युभिः ॥ ४३ ॥
अतो विभागं दत्त्वैषां भुङ्क्ते यस्तु स्वकं धनम् ।
अपने सम्बन्धी स्त्री-पुत्रादि को सन्तुष्ट रखते हुये धनोपभोग करने का निर्देश— जो राजा अपने सम्बन्धी, स्त्री, पुत्र, मित्र भृत्य तथा दस्यु गणों को जिस प्रकार से ये संतुष्ट हो सकें वैसा प्रबन्ध करके अपने धन का उपभोग करता है, वस्तुतः वही सुखी होता है ।
त्यक्त्वा तु दर्पकार्पण्यमानोद्वेगभयानि च ॥ ४४ ॥
कुर्वीत नृपतिर्नित्यं स्वार्थसिद्धयै तु नान्यथा ।
विशेषभृतितो भृत्यं प्रेममानाधिकारतः ॥ ४५ ॥
स्वकार्य-सिद्ध्यर्थ भृत्य को सर्वथा संचय रखने का निर्देश— राजा अपने कार्य की सिद्धि के लिये ही दर्प ( अहङ्कार ), कृपणता, मान, उद्वेग और भय को छोड़कर विशिष्ट जीविका का प्रदान, प्रेम तथा संमान-प्रदर्शन एवं अधिकार-प्रदान से भृत्य को नित्य युक्त करता रहे, इससे अन्यथा न करे ।
ब्राह्मणाग्निजलैः सर्वैर्धनवान् भक्ष्यते सदा ।
स सुखी मोदते नित्यमन्यथा दुःखमश्नुते ॥ ४६ ॥
ब्राह्मणादि द्वारा यज्ञादि करने में धन का व्यय करने से ही सुखी होने का निर्देश— दान करने से ब्राह्मण द्वारा, यज्ञ करने से अग्नि द्वारा, पौंसला आदि का प्रबन्ध करने से जल द्वारा जिस धनी का धन व्यय होता रहता है । वह धनी नित्य सुखी होने से प्रसन्न रहता है अन्यथा रीति से व्यय होने पर दुःखी रहता है ।
दर्पस्तु परहासेच्छा मानोऽहं सर्वतोऽधिकः ।
कार्पण्यं तु व्यये दैन्यं भयं स्वोच्छेदशङ्कनम् ॥ ४७ ॥