शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 490, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४०४ | शुक्रनीतिः |
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मानसस्यानवस्थानमुद्वेगः परिकीर्तितः ।
दर्पं, मान, कार्पण्य, भय तथा उद्वेग के लक्षण— दूसरे के हास की इच्छा को 'दर्प', मैं सबसे अधिक गुणादि में हूँ इसे 'मान', व्यय में कंजूसी करने को 'कार्पण्य', अपने उच्छेद होने की शङ्का को 'भय' और मन का स्थिर न रहने को 'उद्वेग' कहते हैं ।
लघोरप्यपमानस्तु महावैराय जायते ॥ ४८ ॥
दानमानसत्यशौर्यमार्दवं सुसुहृत्करम् ।
महान वैर तथा मित्रता के कारणों का निर्देश— क्षुद्रजन के लिये भी किया हुआ अपमान महावैर को पैदा करने में समर्थ होता है । किसी को कुछ देना, संमान करना, सत्य व्यवहार करना, शूरता और मृदुता ये सब अत्यन्त मित्रता पैदा करनेवाले होते हैं ।
सर्वानापदि सदसि समाहूय बुधान् गुरून् ॥ ४९ ॥
भ्रातॄन् बन्धूंश्च भृत्यांश्च ज्ञातीन् सभ्यान् पृथक् पृथक् ।
यथार्हं पूज्य विनतः स्वामीष्टं याचयेन्नृपः ॥ ५० ॥
आपत्ति पड़ने पर राजा के कर्त्तव्य का निर्देश— राजा आपत्ति पड़ने पर विनम्र होकर पण्डित, गुरु, भाई, बन्धु, भृत्य, जाति के लोग और सभासद् इन सबों को राज्यसभा में बुलाकर यथायोग्य सम्मान करने के बाद अपना अभीष्ट सिद्ध करने के लिये इस रीति से प्रार्थना करे । अर्थात् उपाय पूछे ।
आपदं प्रतरिष्यामो यूयं युक्त्या वदिष्यथ ।
भवन्तो मम मित्राणि भवत्सु नास्ति भृत्यता ॥ ५१ ॥
मैं आपत्ति को पार कर जाऊं इसके लिये आप लोग युक्ति बतायें । आप लोग मेरे मित्र हैं आप लोगों को मैं अपना केवल भृत्य नहीं मानता हूँ ।
न भवत्सदृशास्त्वन्ये सहायाः सन्ति मे ह्यतः ।
तृतीयांशं भृतेर्माह्यमर्धं वा भोजनार्थकम् ॥ ५२ ॥
दास्याम्यापत्समुत्तीर्णः शेषं प्रत्युपकारवित् ।
आप लोगों के समान मेरा कोई दूसरा सहायक नहीं है । अतः इस समय केवल भोजन के लिये वेतन का तृतीयांश या अर्द्धांशमात्र ही आप लोग ग्रहण करें । क्योंकि इस समय व्यय अधिक होने से मैं समग्र वेतन देने में असमर्थ हूँ और जब मैं आपत्ति को पार कर लूंगा तब आप लोगों के उपकार का बदला चुकाना उचित जानकर शेष भी वेतन चुका दूंगा ।
भृतिं विना स्वामिकार्यं भृत्यः कुर्यात् समाष्टकम् ॥ ५३ ॥
षोडशाब्दं धनी यः स्यादितरोऽर्थानुरूपतः ।
आपत्ति में विना वेतन के भी स्वामि-कार्य करने की कालमर्यादा का