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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४०५

**निर्देश—**जो भृत्य ऐसा धनी हो कि अपने पास से १५ वर्ष तक बिना वेतन लिये जीविका चला सकता है वह बिना वेतन लिये ८ वर्ष तक स्वामी का कार्य करे, और जो इससे भिन्न हों वे अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार जितना समय तक बिना वेतन के हो सके स्वामिकार्य करें।

निर्धनैरन्नवस्त्रं तु नृपाद् ग्राह्यं न चान्यथा ॥ ५४ ॥
यतो भुक्तं सुखं सम्यक् तद्दुःखैर्दुःखितो न चेत् ।
विनिन्दति कृतघ्नस्तु स्वामी भृत्योऽन्यएव वा ॥ ५५ ॥

और जो निर्धन हों वे राजा से अन्न-वस्त्र मात्र ग्रहण करें। इससे अन्यथा होने पर न ग्रहण करें। जिस स्वामी से आजतक जिसने भलीभांति सुख का उपभोग किया, आज यदि उसके दुःख से वह दुःखी न हो तो वैसे कृतघ्न भृत्य की स्वामी या अन्य कृतज्ञ भृत्य भी निन्दा करते हैं।

सकृत् सुभुक्तं यस्यापि तदर्थं जीवितं त्यजेत् ।
भृत्यः स एव सुश्लोको नापत्तौ स्वामिनं त्यजेत् ॥ ५६ ॥
स्वामी स एव विज्ञेयो भृत्यार्थं जीवितं त्यजेत् ।

**प्रशंसायोग्य भृत्य और स्वामी का वर्णन—**जो भृत्य जिसका सम्मान-पूर्वक दिया हुआ अन्न एक बार भी भोजन करले तो उसके रक्षार्थ समय पड़ने पर जीवन का भी त्याग कर दे। वही भृत्य सुन्दर यश वाला माना जाता है जो आपत्ति पड़ने पर भी स्वामी का साथ नहीं छोड़ता है और वही वस्तुतः स्वामी है जो आवश्यकता पड़ने पर भृत्य के रक्षार्थ अपना जीवन भी त्याग कर देता है।

न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत् ॥ ५७ ॥
सुभृत्यता तु यन्नीत्या वानरैरपि स्वीकृता ।

**योग्य स्वामी तथा भृत्य का उदाहरण—**इस पृथिवी पर राम के समान कोई दूसरा नीतिमान राजा नहीं हुआ, क्योंकि जिसकी नीति के द्वारा वानरों ने भी भलीभांति से भृत्यता स्वीकार कर ली थी।

अपि राष्ट्रविनाशाय चोराणामेकचित्तता ॥ ५८ ॥
शक्ता भवेन्न किं शत्रुनाशाय नृपभृत्ययोः ।

**एकचित्तता के भाव का वर्णन—**जब चोरों का मिल कर एकचित्त हो जाना राष्ट्र-विनाश करने में समर्थ हो जाता है, तब भला राजा और भृत्य का एकचित्त हो जाना क्या शत्रुविनाश करने के लिये समर्थ नहीं हो सकता है, अपितु अवश्य हो सकता है।

न कूटनीतिरभवच्छ्रीकृष्णसदृशो नृपः ॥ ५६ ॥
अर्जुनाद् ग्राहिता स्वस्य सुभद्रा भगिनी छलात् ।