शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished526 पृष्ठ
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शुक्रनीति-श्लोकानुक्रमणिका
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| श्लोक/पाद | पृष्ठ | श्लोक/पाद | पृष्ठ | श्लोक/पाद | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|---|
| अंगानि वेदाश्चत्वारो | २४ | अतिमृदुस्तुतिनति | ४०० | अधिकृतो दशग्रामे | २९ |
| अंगानां क्रमशो बह्र्ये | १० | अतोऽन्यथा विनाशाय | ६१ | अधीते सुस्वरं गाति | २९० |
| अकर्तुं यद्धितमपि | ७० | अतो यतेत तत्प्राप्त्यै | १३८ | अधोगमा सदा कार्या | ३३५ |
| अकृष्यबालस्थविर | २८५ | अतो यतेत तत्प्राप्त्यै | १५५ | अनन्यस्वस्वकामत्य | १८१ |
| अकृत्वाद्योऽपि शनैः | २८६ | अतो विभागं दत्त्वैषां | ४०३ | अनन्याः स्वामिभक्ताश्च | ८४ |
| अकातरत्वं शस्त्रास्त्र | ४८ | अल्पटनं चानशनं | १७६ | अनर्थमप्यभिप्रेतं | १४० |
| अकीर्ति लभते सोऽत्र | १७९ | अत्यन्तविशदं वस्त्रं | २०८ | अनागमं तु यो भुङ्क्ते | १०४ |
| अकुटुम्ब्यं कति च | ७२ | अत्यन्तविषयासक्तं | ३६६ | अनागमादपि या मुक्तिः | ॥ |
| अकोपोऽपि सकोपाभः | ९२ | अल्पायासो हि विद्यासु | १७६ | अनाचाराद्धर्महानि | १६२ |
| अगाधसलिले मग्नो | १७ | अत्यावश्यं त्वसद्वेऽपि | ११९ | अनियुक्तो न वै ब्रूयात् | १७९ |
| अग्निदो गरदश्चैव | १३२ | अत्युग्रदण्डरूपः स्यात् | १९१ | अनियुक्तो नियुक्तो वा | २७३ |
| अग्निदो गरदो वैश्या | १९७ | अथ कोशप्रकरणं | २०१ | अनिषिद्धोपायकार्यः | ३७२ |
| अग्नारस्यैव गन्धस्य | ३५९ | अथ मित्रप्रकरणं | १८१ | अनिष्टवाक् परुषवाग् | १९७ |
| अङ्गीकर्तुं योग्यमिति | ११३ | अथ मित्रे तृतीयं तु | २२१ | अनीतिरेव सच्छिद्रं | ३ |
| अङ्गीकृतं यथार्थं यद् | २१२ | अथर्वणां चोपवेदः | २२७ | अनीतिस्ते तु मनसि | ९० |
| अङ्गीकृतमिति लिखेन् | ११३ | अथ साधारणं नीति | १२५ | अनुक्रमेण संयोज्यो | ७३ |
| अङ्गीकृतापराधेन | ३८४ | अदत्तं यश्च गृह्णाति | ३२१ | अनुच्छेद्यमनाहार्यं | १०३ |
| अचिरात्तं दुरात्मानं | २७० | अदानेनापमानेन | २२ | अनुनीय यथाशक्ति | १६४ |
| अजायाश्च गवांश्चैव स्यान् | २१६ | अदीर्घसूत्रः सत्कार्ये | ६५ | अनुभूतस्मारकं तु | २९६ |
| अजायाश्चैव शङ्घर्णं | २०९ | अदुष्टऋत्विजं याज्यो | ३२० | अनुयायात्प्रतिपदं | १३५ |
| अजाविगोमहिष्यश्च | २१९ | अदेयं यस्य वै नास्ति | ४७ | अनुरागं सुस्वरं च | ८५ |
| अजाविगोमहिष्येन | ७८ | अद्रोहसमयं कृत्वा | ३६५ | अनूपे तु तृणाधानां | ३५३ |
| अतः सदानीतिशास्त्र | २ | अधमर्णस्थितं चापि | १५९ | अनेकतन्तुसंयोगैः | २३५ |
| अतत्परनरस्यैव | १८ | अधमर्णात् दातव्यं | ४१२ | अनेकासनसन्धाने | २३२ |
| अतिकामक्रोधलोभै | ३१३ | अधमा धनमिच्छन्ति | १२१ | अनेन कर्मणा वेते | २७७ |
| अतिदण्डाच्च गुणिनि | १८४ | अधरोष्ठोऽनुचिबुकं | ३३७ | अन्तःपुरं वासगृहं | २८० |
| अतिदानतपःसत्य | ४०२ | अधर्मतः प्रवृत्तं तं | ३१३ | अन्तःपुंमविपकार्तं | ३५८ |
| अतिदानेन दारिद्र्यं | १६२ | अधर्मशीलन्नृपतेः | २०२ | अन्त्यजश्वादिपरिधि | ३३५ |
| अतिदुष्टाञ्छठमिता | ३४१ | अधर्मशीलो नृपतिः | १९९ | अन्त्यौ द्वौ पञ्चमाब्दे तु | ३५१ |
| अतिमौढ्यमतिदीर्घं | २२ | अधिकान् कृषिकृत्स्यै वा | २४३ | अन्नं न निन्द्यात् सुस्वस्थ | १४४ |
| अतिमद्यं हि पिबतो | १८ | अधिकारमदं पीत्वा | ७३ | अन्नं मुक्त्वा जलं | १४८ |
| अतो नृपः सूचितोऽपि | १९२ | अधिकारिगणैः कार्य | ५४ | अन्नसंस्कारदोषेषु | ३७७ |
| अधिकारिणमेकं वा | ७४ | अन्यगृद्धदारविदं | ३५ |
२७ शु०