शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४१२ | शुक्रनीतिः
से बाहर परदेश में जाने पर उनका जो धन-व्यय हो उससे तीसवां भाग अधिक मिलाकर राजा उनको द्रव्य दे ।
धनं संरक्षयेत्तेषां यत्नतः स्वात्मकोशवत् ॥ ६५ ॥
संहरेद्धनिकात् सर्वं मिथ्याचाराद्धनं नृपः ।
**सैनिकों के धन की आत्मवत् रक्षा करने का एवं जालसाज धनिकों का धन हरण करने का निर्देश—**और सैनिकों के धन को अपने खजाने की भांति यत्न-पूर्वक रक्षा करे । यदि कोई धनिक जालसाजी का व्यवहार कर धन पैदा करे तो उसका संपूर्ण धन छीन ले ।
यदा चतुर्गुणा वृद्धिर्गृहीता धनिकेन च ॥ ६६ ॥
अधमर्णान्न दातव्यं धनिने तु धनं तदा ।
इति शुक्रनीतौ खिलनीतिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः ।
इति शुक्रनीतिः समाप्ता ।
**मूल से चौगुना सूद के चुकने पर धनी को कुछ न देने का निर्देश—**और जब मूल धन से चौगुनी वृद्धि (सूद) धनिक ने ऋण लेनेवाले से ले ली हो तब उससे अधिक धन लेने के लिये धनिक को रोक दे । अर्थात् ऋण पट गया इससे ऋण लेनेवाला धनी को कुछ न दे ।
इति शुक्रनीतिभाषाटीकायां खिलनीतिनिरूपणं नाम पञ्चमोऽध्यायः समाप्तः ।
टीकाकार-परिचयः—
श्रीभार्गवीभर्तुरनुग्रहेण श्रीभार्गवीये ननु नीतिशास्त्रे ।
भर्गप्रियायामथिकाशि टीका समाप्ति राष्ट्रस्य गिराऽभ्युपेता ॥
वेदेन्दुशून्याक्षिमितोऽब्दमध्ये श्रीविक्रमादित्यप्रवर्त्तितेऽत्र ।
पौषे सितावाद्यतिथाविनेऽह्नि श्रीमद्ब्रह्मयुक्-शंकरनामकेन ॥
गोस्वामिदामोदरपादपद्म-सत्प्रमत्तेन च गौतमेन ।
राजेश्वरीताततया ब्रजेश्व-र्यात्मेश्वरत्वेन च विश्रुतेन ॥
'बस्ती' पुरीमध्यगत-प्रसिद्ध 'मिश्रौलिया' ग्रामसमुद्भवेन ।
विद्याविलासाख्यधिया सुधेन द्राक्षपद्यनिर्माणकृतश्रमेण ॥
टीकादिसम्पादनतः सदायूर्वेदागमग्रन्थविचारणायाम् ।
कृतश्रमेण प्रणयेन शश्वच्छब्दद्युनद्यम्ब्ववगाहनेन ॥
समाप्तश्चाऽयं ग्रन्थः