भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 497, कुल 526 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 497

पञ्चमाध्याये खिलनीतिनिरूपणप्रकरणम् ४११

संज्ञक भूमि वासार्थ देनी चाहिये। और जैसी कुटुम्ब की स्थिति न्यून या अधिक हो उसी के समान भूमि-व्यवस्था करनी चाहिये। उससे न न्यून और न अधिक होनी चाहिये।

ग्रामाद् बहिर्वसेयुस्ते ये ये त्वधिकृता नृपैः ।
नृपकार्ये बिना कश्चिन्न ग्रामं सैनिको विशेत् ॥ ६० ॥

अधिकारी पुरुषों को ग्राम के बाहर रहने एवं सैनिकों को बिना राजकार्य के ग्राम-प्रवेश के निषेध का निर्देश— राजा द्वारा जो २ अधिकारी नियुक्त किये गये हों उन सबों को ग्राम से बाहर की भूमि में निवास करना चाहिये। बिना किसी राज-कार्य के किसी सैनिक को ग्राम के अन्दर नहीं प्रवेश करना चाहिये।

तथा न पीडयेत् कुत्र कदापि ग्रामवासिनः ।
सैनिकैर्न व्यवहरेन्नित्यं ग्राम्यजनोऽपि च ॥ ६१ ॥

सैनिकों को ग्रामवासियों को पीड़ा न पहुँचाने एवं ग्रामवासियों को सैनिक के साथ व्यवहार न करने का निर्देश— और सैनिक कहीं किसी ग्रामवासी को कभी पीड़ा न पहुँचावे और ग्रामवासी भी कभी किसी सैनिक के साथ किसी प्रकार का व्यवहार न रक्खे।

श्रावयेत् सैनिकान्नित्यं धर्मं शौर्यविवर्धनम् ।
सुवाद्यनृत्यगीतानि शौर्यवृद्धिकराण्युपि ॥ ९२ ॥

सैनिकों के शौर्यवर्धक उपायों को करने का निर्देश— राजा सैनिकों को नित्य शूरता को बढ़ानेवाले युद्ध-धर्म सुनवावे और उनके लिये सुन्दर बाजा, नृत्य-गीत आदि का भी प्रबन्ध रखे जो कि शूरता को बढ़ाने वाले हों अर्थात् अश्ली-लता युक्त न हों।

युद्धक्रियां विना सैन्यं योजयेन्नान्यकर्मणि ।

युद्धकार्य से अन्य में सैनिकों की नियुक्ति का निषेध— युद्धकार्य के अतिरिक्त अन्य कार्यों को करने के लिये सेना की नियुक्ति न करे।

सत्याचारास्तु धनिका व्यवहारे हता यदि ॥ ९३ ॥
राजा समुद्धरेत्तांस्तु तथाऽन्यांश्च कृषीबलान् ।

व्यवहार में विपन्न होने पर धनिक या किसान की रक्षा करने का निर्देश— सत्य (ईमानदारी) आचरण रखनेवाला कोई धनिक या किसान यदि व्यवहार (लेन-देन) के नाते बिगड़ गया हो (हीन अवस्था में पड़ गया हो) तो राजा उसकी सहायता कर उद्धार करे।

ये सैन्यधनिकास्तेभ्यो यथार्हा भृतिमावहेत् ॥ ९४ ॥
पारदेश्यं च त्रिंशांशमधिकं तद्धनव्ययात् ।

धनी सैनिक का वेतन व भत्ता के विषय में विचार— जो सेना के अन्दर धनी सैनिक हों उनको योग्यता के अनुसार उचित वेतन दे। और राजधानी