शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
प्रथमोऽध्यायः २५
प्रथमोऽध्यायः २५
दमको 'दण्ड' कहते हैं। इससे (दण्ड देने से) राजा दण्ड रूप है। उसकी नीति को दण्डनीति कहते हैं। नयन अर्थात् ले जाने से नीति कहते हैं। भावार्थ यह है कि—दण्ड नीति से राजनीति का ग्रहण किया है क्योंकि इसी से वह प्रजाओं को अपने २ धर्म की ओर ले जाता है।
आन्वीक्षिक्यात्मविज्ञानाद्धर्षशोकौ व्युदस्यति ।
उभौ लोकाववाप्नोति त्रय्यां तिष्ठन्यथाविधि ॥ १५८ ॥
आन्वीक्षिकी विद्या आत्मज्ञान कराने से हर्ष तथा शोक को दूर करती है। त्रयी विद्या के अनुसार यथाविधि-कार्य करता हुआ राजा इहलोक तथा परलोक दोनों में सुख प्राप्त करता है।
आनृशंस्यं परो धर्मः सर्वप्राणभृतां यतः ।
तस्माद्राजाऽऽनृशंस्येन पालयेत्कृपणं जनम् ॥ १५९ ॥
सब प्राणियों के संबन्ध में क्रूरता न करना ही परम धर्म है। अतः राजा अक्रूरता से दीन-निःसहाय जन का पालन करे।
नहि स्वसुखमन्विच्छन्पीडयेत्कृपणं जनम् ।
कृपणः पीड्यमानः स्वमृत्युना हंति पार्थिवम् ॥ १६० ॥
और केवल, अपने सुख की इच्छा से दीनजन को पीडा न पहुँचाये, क्योंकि पीडित किया जाता हुआ दीन अपनी मृत्यु से (पीडा पहुँचाने से) राजा को नष्ट कर देता है।
सुजनैः संगमं कुर्याद्धर्माय च सुखाय च ।
सेव्यमानस्तु सुजनैर्महानतिविराजते ॥ १६१ ॥
सुजनों के साथ संगति करने का निर्देश—धर्म और सुख पाने के लिये सुजनों के साथ संगति रखनी चाहिये, क्योंकि सुजनों से सेवित राजा अत्यन्त महत्त्व को प्राप्त कर सुशोभित होता है।
हिमांशुमालीव तथा नवोत्फुल्लोत्पलं सरः ।
आनंदयति चेतांसि यथा सुजनचेष्टितम् ॥ १६२ ॥
जैसे चन्द्रमा तथा नवीन खिले कमलोंवाला तालाब लोगों के चित्त को आनन्दित करता है उसी भांति सुजनों का व्यवहार भी आनन्दित करता है॥
ग्रीष्मसूर्यांशुसंतप्तमुद्वेजनमनाश्रयम् ।
मरुस्थलमिवोद्दण्डं त्यजेद् दुर्जनसंगतम् ॥ १६३ ॥
ग्रीष्मऋतु के सूर्य की किरणों से अत्यन्त संतप्त, उद्वेग पैदा करनेवाला, छाया के लिये वृक्षादि के आश्रय से हीन मरुभूमि की भांति उद्दण्ड दुर्जन की संगति का परित्याग करना चाहिये।
निःश्वासोद्गीर्णहुतभुग्-धूमधूम्रीकृताननैः ।
२६ | शुक्रनीतिः
वरमाशीविषैः संगं कुर्यान्न त्वेव दुर्जनैः ॥ १६४ ॥ निःश्वास से निकले हुये विषाग्नि के धूम से धूमिल मुखवाले सर्पों का साथ रखना अच्छा है किन्तु दुर्जनों का साथ अच्छा नहीं है।
क्रियतेऽभ्यर्हणीयाय सुजनाय यथांऽजलिः ।
ततः साधुतरः कार्यो दुर्जनाय हितार्थिना ॥ १६५ ॥
हित चाहनेवाले व्यक्ति के लिये उचित है कि वह जिस प्रकार आदरणीय सज्जनों के लिये हाथ जोड़ता है उससे अधिक दुर्जन के लिये हाथ जोड़े अर्थात् सुजन से अधिक दुर्जन का संमान उसके प्रसन्नतार्थ करे ।
नित्यं मनोपहारिण्या वाचा प्रह्लादयेज्जगत् ।
उद्वेजयति भूतानि क्रूरवाग्धनदोऽपि सन् ॥ १६६ ॥
**मनोहर वचन बोलने का निर्देश—**नित्य मनोहर वचनों से जगत् को आनन्दित करना चाहिये । क्योंकि यदि धन देनेवाला कुबेर के समान भी हो किन्तु क्रूर वाणी बोलने से वह मनुष्यों को उद्विग्न ही करता है ।
हृदि विद्ध इवात्यर्थं यथा संतप्यते जनः ।
पीडितोऽपि हि मेधावी न तां वाचमुदीरयेत् ॥ १६७ ॥
पीडित होने पर भी बुद्धिमान व्यक्ति ऐसी वाणी न बोले जिससे सुनने वाला व्यक्ति हृदय में बाण से विद्ध हुये की भांति अत्यन्त छटपटाने लगे ।
प्रियमेवाभिधातव्यं नित्यं सत्सु द्विषत्सु वा ।
शिखीव केकां मधुरां वाचं ब्रूते जनप्रियः ॥ १६८ ॥
सज्जन अथवा दुर्जन सभी के साथ सदा मधुर वचन बोलना चाहिये, क्योंकि जो मनुष्य मयूर की भांति प्रिय वचन बोलता है वह जनप्रिय होता है ।
मदरक्तस्य हंसस्य कोकिलस्य शिखंडिनः ।
हरंति न तथा वाचो यथा वाचो विपश्चिताम् ॥ १६९ ॥
मद से युक्त हंस, कोकिल या मयूर की वाणी वैसा मनको नहीं हरण करती है जैसा अच्छे विद्वानों की वाणी ।
ये प्रियाणि प्रभाषंते प्रियमिच्छंति सत्कृतम् ।
श्रीमन्तो वंद्यचरिता देवास्ते नरविग्रहाः ॥ १७० ॥
जो लोग प्रिय वचन बोलते हैं और अपने प्रिय का सत्कार करना चाहते हैं, ऐसे प्रशंसनीय चरितवाले श्रीमान लोग मनुष्य रूप में देवता ही हैं ॥
नहीदृशं संवननं त्रिषु लोकेषु विद्यते ।
दया मैत्री च भूतेषु दानं च मधुरा च वाक् ॥ १७१ ॥
तीनों लोकों में ऐसा दूसरा कोई वशीकरण नहीं है जैसा कि—प्राणियों
प्रथमोऽध्यायः २७
पर दया तथा मैत्री का भाव रखना एवं उन्हें अभीष्ट दान देना तथा प्रिय वचन बोलना है, इनसे मनुष्य वशीभूत हो जाता है।
श्रुतिरास्तिक्यपूतात्मा पूजयेद्देवतां सदा।
देवतावद् गुरुजनमात्मवच्च सुहृज्जनम् ॥ १७२ ॥
आस्तिकता से पवित्र चित्त होकर सदा देवता की पूजा करै और देवता की भांति गुरुजनों की एवं अपने समान सुहृज्जनों का संमान करै ॥
प्रणिपातेन हि गुरून् सतोऽनूचानचेष्टितैः।
कुर्वीताभिमुखान्देवान् भृत्यै सुकृतकर्मणाम् ॥ १७३ ॥
साङ्ग-वेदज्ञ ब्राह्मणों से युक्त होकर राजा प्रणाम के द्वारा गुरुजनों तथा सज्जनों एवं देवताओं को अपने अनुकूल करै। इससे पुण्य की वृद्धि होती है और उससे वह सुखी होता है।
सद्भावेन हरेन्मित्रं सद्भावेन च बांधवान्।
स्त्रीभृत्यो प्रेममानाभ्यां दाक्षिण्येनेतरं जनम् ॥ १७४ ॥
सद्भाव से मित्र तथा बान्धवों के, प्रेम तथा मान (सत्कार) से स्त्री और भृत्य के एवं मनके अनुकूल कार्य करने से मूर्ख के चित्त को अपने वशीभूत करे।
बलवान्बुद्धिमाञ्शूरो यो हि युक्तपराक्रमो।
वित्तपूर्णां महीं भुंक्ते स भूयो भूपतिर्भवेत् ॥ १७५ ॥
जो राजा बलवान, बुद्धिमान, शूर तथा उचित समय पर पराक्रम करने-वाला होता है, वह धन से पूर्ण पृथ्वी का उपभोग करता है और वही राजा वस्तुतः राजा है।
पराक्रमो बलं बुद्धिः शौर्यमेते वरा गुणाः।
एभिर्हीनोऽन्यगुणयुग्महीभुक् सधनोऽपि च ॥ १७६ ॥
महीं स्वल्पां नैव भुंक्ते द्रुतं राज्याद्विनश्यति।
महाधनाच्च नृपतेर्विमात्यल्पोऽपि पार्थिवः ॥ १७७ ॥
अव्याहताज्ञस्तेजस्वी एभिरेव गुणैर्भवेत्।
राज्ञः साधारणास्त्वन्ये न शक्ता भूप्रसाधने ॥ १७८ ॥
पराक्रम, बल, बुद्धि, शूरता ये श्रेष्ठ गुण कहलाते हैं। इन गुणों से हीन होकर यदि इनसे भिन्न गुणों से युक्त भी हो और धनवान भी हो तो वह राजा थोड़ी भी भूमि का स्वामी नहीं होता है और यदि हो तो उसका राज्य शीघ्र नष्ट हो जाता है। महाधनवान् राजा की अपेक्षा छोटा राजा भी सुशोभित होता है क्योंकि पराक्रमादि इन्हीं गुणों से उसकी आज्ञा नहीं टाली जाती है और वह तेजस्वी होता है। राजा के इससे भिन्न सभी गुण साधारण माने जाते हैं उनसे पृथ्वी-पालन या राज्य का विस्तार नहीं हो सकता है।
२८ | शुक्रनीतिः
खनिः सर्वधनस्येयं देवदैत्यविमर्दिनी । भूम्यर्थे भूमिपतयः स्वात्मानं नाशयन्त्यपि ॥ १७९ ॥
यह पृथ्वी सब धनों की खान तथा देवता और दैत्यों का नाश कराने वाली है क्योंकि राजा लोग पृथ्वी के लिये अपने को भी नष्ट कर देते हैं ।
उपभोगाय च धनं जीवितं येन रक्षितम् । न रक्षिता तु भूर्येन किं तस्य धनजीवितैः ॥ १८० ॥
जिसने उपभोग करने के लिये अपने धन तथा जीवन की रक्षा की, किन्तु पृथ्वी की रक्षा नहीं की, उसके धन तथा जीवन से क्या है अर्थात् कुछ लाभ नहीं है।
न यथेष्टव्ययायालं संचिते नु धनं भवेत् । सदागमाद्विना कस्य कुबेरस्यापि नाञ्जसा ॥ १८१ ॥
चाहे वह कुबेर ही क्यों न हो किसी का भी संचित धन नित्य धनागम के बिना इच्छानुसार व्यय करने के लिये योग्य नहीं होता है अर्थात् एक दिन समाप्त हो जाता है । इसलिये पृथ्वी धन से बढ़कर अन्य कोई धन नहीं है ।
पूज्यस्त्वेभिर्गुणैर्भूषो न भूपः कुलसंभवः । न कुले पूज्यते यादृग्बलशौर्यपराक्रमैः ॥ १८२ ॥
इन पूर्वोक्त गुणों से ही राजा वस्तुतः पूज्य होता है, राजकुल में केवल उत्पन्न होने से नहीं, क्योंकि जैसी प्रतिष्ठा बल, शूरता और पराक्रम से होती है वैसी केवल कुल से राजा की प्रतिष्ठा नहीं होती ।
लक्षकर्षमितो भागो राजतो यस्य जायते । वत्सरे वत्सरे नित्यं प्रजानां त्वविपीडनैः ॥ १८३ ॥ सामंतः स नृपः प्रोक्तो यावल्लक्षत्रयावधि । तदूर्ध्वं दशलक्षांतो नृपो मांडलिकः स्मृतः ॥ १८४ ॥ तदूर्ध्वं तु भवेद्राजा यावद्विंशतिलक्ष्षकः । पंचाशल्लक्षपर्यन्तो महाराजः प्रकीर्तितः ॥ १८५ ॥
**राजा के सामन्तादि भेदों का निर्देश—**जिसके राज्य से प्रतिवर्ष बिना प्रजा को पीडित किये ही एक लक्ष (१०००००) रजत (चांदी का) कर्ष (रूपया) से लेकर ३ लक्ष तक वार्षिक कर (मालगुजारी) मिलता है वह राजा 'सामन्त' कहलाता है । उसके बाद १० लक्ष पर्यन्त वार्षिक कर मिलने से 'माण्डलिक' राजा और उसके बाद २० लक्षतक वार्षिक कर मिलने से 'राजा' कहलाता है एवं ५० लक्ष तक वार्षिक कर मिलने से 'महाराज' कहलाता है ।
ततस्तु कोटिपर्यतः स्वराट् सम्राट् ततः परम् ।
प्रथमोऽध्यायः २६
प्रथमोऽध्यायः २६
दशकोटिमितो यावद्विराट् तु तदनन्तरम् ॥ १८६ ॥ उसके बाद १ कोटि ( करोड़ ) पर्यन्त वार्षिक आय होने से राजा 'स्वराट्' कहलाता है और उसके बाद १० कोटि पर्यन्त आय होने से 'सम्राट्' कहलाता है । उसके बाद ५० कोटि पर्यन्त 'विराट्' कहलाता है ।
पञ्चाशत्कोटिपर्यतं सार्वभौमस्ततः परम् । सप्तद्वीपा च पृथिवी यस्य वश्या भवेत्सदा ॥ १८७ ॥ इससे अधिक वार्षिक आय होने से राजा 'सार्वभौम' कहलाता है और इसके सदा अधीन सातो द्वीपों से युक्त संपूर्ण पृथ्वी रहती है ।
स्वभागभृत्या दास्यत्वे प्रजानां च नृपः कृतः । ब्रह्मणा स्वामिरूपस्तु पालनार्थं हि सर्वदा ॥ १८८ ॥ प्रजाओं से अपना वार्षिक कर रूप वेतन स्वीकार करने से स्वामी रूप में स्थित राजा को ब्रह्मा जी ने प्रजाओं के पालनार्थ सदा दास बनाया है।
सामन्तादिसमा ये तु भृत्या अधिकृता भुवि । तेन सामन्तसंज्ञाः स्यु राजभागहराः क्रमात् ॥ १८६ ॥ राजा के द्वारा भूमि का कर संग्रह करने के लिये रखे हुये जो नौकर सामन्त आदि के तुल्य हैं अर्थात् १ लाख कर संग्रह करते हैं वे 'अनुसामन्त' कहलाते हैं।
सामन्तादिपदभ्रष्टास्तत्तुल्यं भृतिपोषिताः । महाराजादिभिस्ते तु हीनसामन्तसंज्ञकाः ॥ १९० ॥ जो महाराज आदि के द्वारा सामन्त आदि पद से हटाकर उसके तुल्य वेतन देकर पालित होते हैं वे 'हीनसामन्त' कहलाते हैं ।
शतग्रामाधिपो यस्तु सोऽपि सामन्तसंज्ञकः । शतग्रामे चाधिकृतोऽनुसामन्तो नृपेण सः ॥ १९१ ॥ और १०० ग्रामों का जो अधिपति होता है वह भी 'सामन्त' कहलाता है । और जो राजा द्वारा १०० ग्रामों का कर-संग्रहार्थ वेतन देकर नियुक्त किया जाता है वह भी 'अनुसामन्त' कहलाता है ।
अधिकृतो दशग्रामे नायकः स च कीर्तितः । आशापालोऽयुतग्रामभागभाक् च स्वराडपि ॥ १९२ ॥ दश ग्रामों का कर-संग्रहार्थ जो अधिकारी (वेतन देकर) नियुक्त किया जाता है वह 'नायक' कहलाता है। और १०००० दश हजार ग्रामों से कर ग्रहण करने वाला 'आज्ञापाल' अथवा 'स्वराट्' कहलाता है ।
भवेत्क्रोशात्मको ग्रामो रूप्यकर्षसहस्रकः । ग्रामार्धकं पल्लिसंज्ञं पल्ल्यर्धं कुंभसंज्ञकम् ॥ १६३ ॥
| ३० | शुक्रनीतिः |
|---|
भूमि के मानभेदों का निर्देश—ग्राम १ क्रोश वर्ग का होता है । और उसकी मालगुजारी १००० रजत मुद्रा (रुपये) की होती है । ग्राम का आधा प्रमाण 'पल्ली' का होता है और पल्ली का आधा प्रमाण 'कुम्भ' का होता है ।
करैः पंचसहस्रैर्वा क्रोशः प्रोक्तः प्रजापतेः ।
हस्तैश्चतुःसहस्रैर्वा मनोः क्रोशस्य बिस्तरः ॥ १६४ ॥
पांच हजार ५००० हाथों का प्रजापति-संबन्धी 'क्रोश' होता है । और चार हजार ४००० हाथों का विस्तार मनु-सम्बन्धी क्रोश का होता है ।
सार्ध द्विकोटिहस्तैश्च क्षेत्रं क्रोशस्य ब्रह्मणः ।
पंचविंशशतैः प्रोक्तं क्षेत्रं तद्विनिवर्तनैः ॥ १६५ ॥
ढाई २॥ करोड़ हाथों का ब्रह्मा के क्रोश का क्षेत्र होता है । और उसके २५०० विनिवर्तनों से क्षेत्र कहलाता है ।
मध्यमामध्यमपर्वदैर्घ्यं यच्चतुरंगुलम् ।
यवोदरैरष्टभिस्तु दैर्घ्यं स्थौल्यं तु पंचभिः ॥ १६६ ॥
मध्यमा अंगुलि के मध्यम पर्व की भांति लम्बाई १ अंगुल की होती है । और ८ जौ के उदर के समान लम्बाई तथा पांच जौ के उदर की भांति मुटाई १ अंगुल की होती है ।
चतुर्विंशत्यंगुलैस्तैः प्राजापत्यः करः स्मृतः ।
स श्रेष्ठो भूमिमाने तु तदन्यास्त्वधमा मताः ॥ १६७ ॥
वैसी २४ अंगुलियों का १ प्राजापत्य कर (हाथ) होता है । और भूमि के नापने में यही श्रेष्ठ होता है, इससे अन्य सभी अधम कहलाते हैं ।
चतुःकरात्मको दंडो लघुः पंचकरात्मकः ।
तदङ्गुलं पंचयवैर्मानवं मानमेव तत् ॥ १६८ ॥
४ हाथ का जो 'दण्ड' होता है वह 'लघु' कहलाता है । और ५ हाथ का दण्ड 'दीर्घ' कहलाता है । और जो ५ जौ का अंगुल होता है वह मानव-मान से होता है ।
वसुषण्मुनिसंख्याकैर्यवैर्दण्डः प्रजापतेः ।
यवोदरैः षट्शतैस्तु मानवो दण्ड उच्यते ॥ १६९ ॥
७६८ यव-प्रमाण 'प्रजापति' का दण्ड होता है । ६०० यव-प्रमाण 'मानव दण्ड' होता है ।
पंचविंशतिभिर्दण्डैरुभयोस्तु निवर्तनम् ।
त्रिंशच्छतैरङ्गुलैर्यवैश्चापि पञ्चसहस्रकैः ॥ २०० ॥
२५ पचीस दण्डों का दोनों का निवर्तन होता है । अथवा ३००० अंगुल या १५००० यवों का उक्त निवर्तन होता है ।
प्रथमोऽध्यायः ३१
सपादशतहस्तैश्च मानवं तु निवर्त्तनम् ।
ऊनविंशतिसाहस्रैर्द्विशतैश्च यवोदरैः ॥ २०१ ॥
१२५ हाथों का मानव निवर्त्तन होता है या १९२०० यवों का होता है ।
चतुर्विंशशतैरेव ह्यंगुलैश्च निवर्त्तनम् ।
प्राजापत्यं तु कथितं शतैश्चैव करैः सदा ॥ २०२ ॥
२४०० अंगुलों का निवर्त्तन होता है, १०० हाथों का प्राजापत्य निवर्त्तन होता है ।
सपादषट्शतं दंडा उभयोश्च निवर्त्तने ।
निवर्त्तनान्यपि सदोभयोर्वै पंचविंशतिः ॥ २०३ ॥
दोनों के निवर्त्तन में ६२५ दण्ड होते हैं । उन दोनों के निवर्त्तन सदा २५ होते हैं ।
पंचसप्ततिसाहस्रैरंगुलैः परिवर्त्तनम् ।
मानवं षष्टिसाहस्रैः प्राजापत्यं तथांगुलैः ॥ २०४ ॥
७५००० अङ्गुलों का 'मानव'-संज्ञक परिवर्त्तन और ६०००० अङ्गुलों का 'प्राजापत्य' परिवर्त्तन होता है ।
पञ्चविंशाधिकैर्हस्तैरेकत्रिंशशतैर्मनोः ।
परिवर्त्तनमाख्यातं पञ्चविंशशतैः करैः ॥ २०५ ॥
प्राजापत्यं पादहीनचतुर्लक्षयवोन्मनोः ।
अशीत्यधिकसाहस्रचतुर्लक्षयवैः परम् ॥ २०६ ॥
३१२५ हाथों का 'मानव' परिवर्त्तन और २५०० हाथों का 'प्राजापत्य' परिवर्त्तन होता है । और ३००००० यवों का 'मानव परिवर्त्तन' होता है । ३८०००० यवों का 'प्राजापत्य परिवर्त्तन' होता है ।
निवर्त्तनानि द्वात्रिंशन्मनुमानेन तस्य वै ।
चतुःसहस्रहस्ताः स्युर्दंडाश्चाष्टशतानि हि ॥ २०७ ॥
मनु के मान से ३२ निवर्त्तनों का ४००० हाथ, और ८०० दण्ड होते हैं ।
पंचविंशतिभिर्दण्डैर्भुजः स्यात्परिवर्त्तने ।
करैरयुतसंख्याकैः क्षेत्रं तस्य प्रकीर्त्तितम् ॥ २०८ ॥
परिवर्त्तन में २५ दण्डों का भुज होता है १०००० दश हजार हाथों का परिवर्त्तन का क्षेत्र होता है ।
चतुर्भुजैः समं प्रोक्तं कृष्टभूपरिवर्त्तनम् ।
प्राजापत्येन मानेन भूभागहरणं नृपः ॥ २०९ ॥
सदा कुर्याच्च स्वायत्तैर्मनुमानेन नान्यथा ।
लोभात् सङ्कर्षयेद्यस्तु हीयते सप्रजो नृपः ॥ २१० ॥
३२ शुक्रनीतिः
जोती हुई भूमि का परिवर्तन ४ भुजों के समान कहा गया है। राजा सदा 'प्राजापत्य' मान से पृथ्वी के भाग का ग्रहण करे। और आपत्ति-काल में 'मानव' मान से ग्रहण करे। इससे अन्यथा रीति से भूभाग न ग्रहण करे। यदि लोभवश प्रजा से उक्त नियम से अधिक भूभाग ग्रहण करता है तो वह प्रजा-सहित हीन हो जाता है।
न दद्याद् द्व्यंगुलमपि भूमेः स्वत्वनिवर्तकम्।
वृत्त्यर्थं कल्पयेद्वापि यावद्ब्रूयात्स्तु जीवति ॥ २११ ॥
और दो अङ्गुल भी भूमि बिना कर की न छोड़े अर्थात् सब पर कर लगाकर देवे। अथवा जितने से वह अपनी जीविका चला सके उतनी भूमि उसे दे देवे। ऐसा राजा का कर्त्तव्य है।
गुणी तावद् देवतार्थं विसृजेच्च सदैव हि।
आरामार्थं गृहार्थं वा दद्याद् दृष्ट्वा कुटुम्बिनम् ॥ २१२ ॥
गुणवान राजा देवता के मन्दिर या बगीचा-निर्माणार्थ सदा भूमि का बिना कर के दान करे और कुटुम्बी को देखकर उसे गृह-निर्माणार्थ भूमि देवे।
नानावृक्षलताकीर्णे पशुपक्षिगणावृते।
सुबहूदकधान्ये च तृणकाष्ठसुखे सदा ॥ २१३ ॥
आसिंधुनौगमाकूले नातिदूरमहीधरे।
सुरम्यसमभूदेशे राजधानीं प्रकल्पयेत् ॥ २१४ ॥
राजधानी बनाने योग्य प्रदेश के लक्षण—नाना प्रकार के वृक्ष तथा लता से व्याप्त, पशु तथा पक्षिगणों से युक्त, बहुत जल तथा धान्य से पूर्ण, सदा तृण तथा काष्ठ मिलने की सुविधा से युक्त, समुद्र पर्यन्त नौका से गमन करने लायक नदी के तट एवं सुरम्य सम भूमिवाले ऐसे भूप्रदेश में राजा राजधानी का निर्माण करे।
अर्धचन्द्रां वर्तुलां वा चतुरस्रां सुशोभनाम्।
सप्राकारां सपरिखां ग्रामादीनां निवेशिनीम् ॥ २१५ ॥
सभामध्यां कूपवापीतडागादियुतां सदा।
चतुर्दिक्षु चतुर्द्वारां सुमार्गारामवीथिकाम् ॥ २१६ ॥
दृढसुरालयमठपान्थशालाभिरजिताम् ।
कल्पयित्वा वसेत्तत्र सुगुप्तः सप्रजो नृपः ॥ २१७ ॥
देखने में अर्धचन्द्र या गोल या चौकोर आकारवाली, अत्यन्त शोभायमान, प्राकार (चहारदीवारी) और परिखा (खाई) से युक्त, ग्रामादि बसाने लायक हो और जिसके मध्य में सभा-मण्डप हो, एवं सदा, कूप, बावली, तड़ाग आदि से युक्त, चारों दिशाओं में ४ द्वार बने हुये, सुन्दर मार्ग, बगीचा,
प्रथमोऽध्यायः ३३
प्रथमोऽध्यायः ३३
गढी से युक्त, मजबूत मन्दिर, मठ, धर्मशाला से सुशोभित ऐसी राजधानी बनाकर राजा उसमें प्रजासहित सुरक्षित रह कर निवास करे ।
राजगृहं सभामध्यं गवाश्वगजशालिकम् । प्रशस्तवापीकूपादिजलयन्त्रैः सुशोभितम् ॥ २१८ ॥
सर्वतः स्यात्समभुजं दक्षिणोच्चमुदङ्नतम् । शालां विना नैकभुजं तथा विषमबाहुकम् ॥ २१९ ॥
प्रायः शाला नैकभुजा चतुःशालं बिना शुभा । शस्त्रास्त्रधारिसंयुक्तप्राकारं सुष्ठु यन्त्रकम् ॥ २२० ॥
सत्रिकक्षचतुर्द्वारं चतुर्दिक्षु सुशोभनम् । दिवा रात्रौ सशस्त्रास्त्रैः प्रतिकक्षासु गोपितम् ॥ २२१ ॥
चतुर्भिः पंचभिः षड्भिर्यामिकैः परिवर्तकैः । नानागृहोपकार्यादृ्ट्रिसंयुतं कल्पयेत्सदा ॥ २२२ ॥
राजधानी में राजोचित विविध शालायें बनाने का निर्देश—और राज- धानी में राजा का गृह ऐसा हो कि जिसके मध्य में सभामवन हो, और उसके अन्दर गोशाला, अश्वशाला तथा गजशाला बनी हो, अच्छी बावड़ी, कूप आदि एवं फुआरों से भलीभांति सुशोभित हो । और जिसके चारों भुज सम हों एवं जो दक्षिण की तरफ ऊँचा और उत्तर की तरफ नीचा हो, जिसमें शाला के बिना एक भुज तथा विषम भुज न हो । क्योंकि चतुःशाल ( जिसके चारो तरफ गृह हों ) के बिना अन्य शाला एक भुज होने से शुभदायिका नहीं होती है । शस्त्र तथा अस्त्र के धारण करनेवाले सैनिकों से युक्त, और अच्छे-अच्छे यन्त्रों से युक्त परिखा तथा चहारदीवारी से घिरा, तीन कक्षायों एवं चारों दिशाओं में ४ द्वारों से युक्त, सुन्दर हो और जिसमें दिन-रात शस्त्रास्त्र-धारी प्रहर २ पर बदलते हुये घूम २ कर पहरा देनेवाले ४, ५ या ६ चौकीदारों से प्रत्येक कक्षायें सुरक्षित हों, सदा नाना प्रकार के गृह, तम्बू, शामियाना, अटारो से युक्त ऐसा राजभवन सदा बनावें ।
वस्त्रादिमार्जनार्थं च स्नानार्थं यजनार्थकम् । भोजनार्थं च पाकार्थं पूर्वस्यां कल्पयेद् गृहम् ॥ २२३ ॥
और उसमें वस्त्र धोने के लिये और स्नान तथा यज्ञ करने के लिये एवं भोजन खाने-पकाने के लिये पूर्व दिशा में गृहों का निर्माण करे ।
निद्रार्थं च विहारार्थं पानार्थं रोदनार्थकम् । धान्यार्थं घरटार्थं दासीदासार्थमेव च ॥ २२४ ॥
उत्सर्गार्थं गृहान्कुर्याद्दक्षिणस्यामनुक्रमात् । गोमृगोष्ट्रगजाद्यार्थे गृहान्प्रत्यक् प्रकल्पयेत् ॥ २२५ ॥
३ शु०
३४ · शुक्रनीतिः
और सोने के लिये, विहार, जलपान तथा रोदन करने के लिये, धान्य आदि तथा जांत रखने के लिये, दासी-दासों के रहने के लिये एवं मल-मूत्रादि त्याग करने के लिये क्रम से ( सिलसिलेवार ) गृह दक्षिण दिशा में बनवावे । और गो, मृग, ऊंट, हाथी आदि के लिये पश्चिम दिशा में गृह बनवावे ।
रथवाज्यस्त्रशस्त्रार्थं व्यायामायामिकार्थकम् ।
वस्त्रार्थकं तु द्रव्यार्थं विद्याभ्यासार्थमेव च ॥ २२६ ॥
उदग्गृहान् प्रकुर्वीत सुगुप्तान् सुमनोहरान् ।
यथासुखानि वा कुर्याद् गृहाण्येतानि वै नृपः ॥ २२७ ॥
रथ, घोड़े, अस्त्र, शस्त्र के लिये, कसरत का विस्तार करने के लिये, वस्त्र तथा द्रव्य रखने एवं विद्याभ्यास करने के लिये सुरक्षित तथा सुन्दर गृह उत्तर दिशा में बनवाये । अथवा राजा अपनी सुविधा के अनुसार इन सब गृहों को बनवावे ।
धर्माधिकरणं शिल्पशालां कुर्यादुदग्गृहात् ।
पंचमांशाधिकोच्छ्राया भित्तिर्विस्तारतो गृहे ॥ २२८ ॥
राजा भवन से उत्तर दिशा की ओर कचहरी और शिल्पशाला ( चित्रादि-गृह ) बनवावे । गृह की लम्बाई से पांचवें भाग के बराबर ऊंची भीत बनवावे ।
कोष्ठविस्तारषष्ठांशस्थूला सा च प्रकीर्तिता ।
एकभूमेरिदं मानमूर्ध्वमूर्ध्वं समं ततः ॥ २२९ ॥
कोठरी के लम्बान से छठवां भाग के समान मोटी भीत उठानी चाहिये । यह एक मञ्जिले मकान के लिये मान कहा है । इसके बाद ऊपर-ऊपर के अन्य मंजिलों का भी इसी भांति समझना चाहिये ।
स्तम्भैश्च भित्तिभिर्वापि पृथक्कोष्ठानि संन्यसेत् ।
त्रिकोष्ठं पञ्चकोष्ठं वा सप्तकोष्ठं गृहं स्मृतम् ॥ २३० ॥
स्तम्भों अथवा भित्तियों से पृथक् कोठरियों को बनवावे । और एक गृह में ३-५ अथवा ७ कोठरियां बनवावे ।
द्वारार्थमष्टधा भक्तं द्वारस्यांशौ तु मध्यमौ ।
द्वौ द्वौ ज्ञेयौ चतुर्दिक्षु धनपुत्रप्रदौ नृणाम् ॥ २३१ ॥
द्वार बनाने के लिये गृह के आठ भाग करके उसमें से बीच के दो भागों में द्वार बनाना चाहिये । इसी भांति से चारो दिशाओं में मध्यम के दो २ भागों में द्वार बनाना चाहिये । ऐसे द्वार मनुष्यों के धन तथा पुत्र देनेवाले होते हैं ।
प्रथमोऽध्यायः ३५
तत्रैव कल्पयेद् द्वारं नान्यथा तु कदाचन ।
वातायनं पृथक्कोष्ठे कुर्याद्वाह्यत्सुखावहम् ॥ २३२ ॥
उन्हीं भागों में द्वार बनाना चाहिये इससे अन्य भागों में कभी नहीं द्वार बनाना चाहिये । और प्रत्येक कोठरियों में सुविधानुसार हवा आने के लिये जंगले बनवावे ।
अन्यगृहद्वारविद्धं गृहद्वारं न चिन्तयेत् ।
वृक्षकोणस्तम्भमार्गपीठकूपैश्च वेधितम् ॥ २३३ ॥
अन्य किसी गृह के द्वार से विद्ध (वेध खाता हुआ) गृह का द्वार नहीं बनाना चाहिये। एवं वृक्ष, कोण, स्तम्भ, मार्ग बैठने का चबूतरा तथा कूप से भी विद्ध गृहद्वार नहीं होना चाहिये ।
प्रासादमण्डपद्वारे मार्गवेधो न विद्यते ।
गृहपीठं चतुर्थांशमुद्रा यस्य प्रकल्पयेत् ॥ २३४ ॥
प्रासाद (राजा या देवता का मन्दिर) और मण्डप के द्वार में मार्ग के वेध का विचार नहीं करना चाहिये । गृहपीठ का प्रमाण प्रासाद या मण्डप के चतुर्थांश तुल्य होना चाहिये ।
प्रासादानां मण्डपानामर्धांशं वाऽपरे जगुः ।
परवातायनैर्विद्धं नापि वातायनं स्मृतम् ॥ २३५ ॥
कोई २ ऋषि प्रासाद या मण्डप के अर्द्धांश तुल्य गृहपीठ का प्रमाण बताते हैं। दूसरे जंगलों से जंगला विंधा हुआ नहीं होना चाहिये ।
विस्ताराधार्शामण्डोच्चाच्छर्द्दिः खर्परसम्भवा ।
पतितं तु जलं तस्यां सुखं गच्छति वाप्यधः ॥ २३६ ॥
हीना निम्ना छदिर्न स्याद्याष्टकोष्ठस्य विस्तरः ।
गृह के विस्तार के अर्द्धांश के तुल्य खपड़े की छाजन की मूल ऊंचाई होनी चाहिये। जिससे उसके ऊपर गिरी हुई जल की धारा सुखपूर्वक नीचे गिर जाय । जैसा कोठरी का विस्तार हो उससे हीन या निम्न उसका छाजन नहीं होना चाहिये ।
स्वोच्छ्रायस्यार्धमूलो वा प्राकारः सममूलकः ॥ २३७ ॥
तृतीयांशकमूलो वा ह्युच्छ्रायार्धप्रविस्तरः ।
उच्छ्रितस्तु तथा कार्यो दस्युभिर्न विलंघ्यते ॥ २३८ ॥
और अपनी ऊँचाई से आधा या समान मूल भाग जिसका है ऐसा प्राकार (चाहारदीवारी) होना चाहिये । अथवा ऊंचाई के तृतीयांश के बराबर मूलभाग एवं ऊंचाई की आधी चौड़ाई प्राकार की होनी चाहिये । और उसकी ऊंचाई उतनी होनी चाहिये, जिससे डाकू लोग उसे नाघ न सकें ।
३६ | शुक्रनीतिः
यामिकै रक्षितो नित्यं नाळिकास्त्रैश्च संयुतः ।
सुबहुदृढगुल्मश्च सुगवाक्षप्रणालिकः ॥ २३९ ॥
स्वहीनप्रतिप्राकारो ह्यसमीपमहीधरः ।
परिखा च ततः कार्या खाताद् द्विगुणविस्तरा ॥ २४० ॥
नातिसमीपप्राकारा ह्यगाधसलिला शुभा ।
राजा के योग्य दुर्ग बनाने का निर्देश— चौकीदारों से नित्य सुरक्षित तथा नालिकास्त्रों (तोपों) से युक्त भलीभांति से बहुत से कुशादि के गुच्छे जिस पर उगे हुये हों और जिसमें सुन्दर रीति से खिड़कियों की नालियां बनी हों, एवं जिसके बाद में उससे छोटा दूसरा प्राकार बना हो और जिसके समीप में पर्वत न हो ऐसा प्राकार (परकोटा) बनाना चाहिये। और उसके बाद ऐसी परिखा (खाई) बनानी चाहिये। जिसकी चौड़ाई उसकी गहराई से दुगुनी हो। और जिसके अत्यन्त समीप में प्राकार (परकोटा) न खिंचा हो, एवं जिसमें अगाध जल भरा हो।
युद्धसाधनसम्भारैः सुयुद्धकुशलैर्विना ॥ २४१ ॥
न श्रेयसे दुर्गवासो राज्ञः स्याद् बन्धनाय सः ।
युद्ध करने के योग्य साधन-सामग्रियों (शस्त्रास्त्र, गोला, बारूद) एवं युद्ध में निपुण योद्धाओं के बिना दुर्ग में केवल निवास करना राजा के लिये कल्याणकारक नहीं होता है प्रत्युत उससे उसका बन्धन हो जाता है।
राज्ञा राजसभा कार्या सुगुप्ता सुमनोरमा ॥ २४२ ॥
त्रिकोष्ठैः पञ्चकोष्ठैर्वा सप्तकोष्ठैः सुविस्तृता ।
दक्षिणोदक्तयादीर्घा प्राक्प्रत्यग्द्विगुणाथवा ॥ २४३ ॥
त्रिगुणा वा यथाकाममेकभूमिर्द्विभूमिका ।
त्रिभूमिका वा कर्तव्या सोपकार्याशिरोगृहा ॥ २४४ ॥
परितः प्रतिकोष्ठे तु वातायनविराजिता ।
राजसभा कैसी बनानी चाहिये इसका निर्देश— राजा ऐसी राजसभा बनवावे, जो भलीभांति सुरक्षित, अत्यन्त सुन्दर दक्षिण से उत्तर की तरफ लम्बी अथवा पूर्व से पश्चिम की तरफ दुगुनी किंवा तिगुनी लम्बी हो। एवं अपनी इच्छानुसार एकमंजिल, दुमंजिल या तीन मंजिल की हो, और जिसमें ऊपर के गृह में शामियाना तना हो और जिसके प्रत्येक गृहों में खिड़कियां हों।
पार्श्वकोष्ठात्तु द्विगुणो मध्यकोष्ठस्य विस्तरः ॥ २४५ ॥
पञ्चमांशधिकं त्वौच्चं मध्यकोष्ठस्य विस्तरात् ।
वस्तारेण समं त्वौच्चं पञ्चमांशाधिकं तु वा ॥ २४६ ॥
प्रथमोऽध्यायः ३७
बगल के कमरे की अपेक्षा मध्य के कमरे का विस्तार दूना होना चाहिये। और उसकी ऊंचाई कमरे के विस्तार से पञ्चमांश अधिक अथवा विस्तार के समान होना चाहिये।
कोष्ठकानां च भूमिर्वा छदिर्वा तत्र कारयेत् ।
द्विभूमिके पार्श्वकोष्ठे मध्यं त्वेकभूमिकम् ॥ २४७ ॥
पृथक्स्तम्भान्तसत्कोष्ठा चतुर्मार्गागमा शुभा ।
जलोर्ध्वपातियन्त्रैश्च युता सुस्वरयन्त्रकैः ॥ २४८ ॥
वातप्रेरकयन्त्रैश्च यन्त्रैः कालप्रबोधकैः ।
प्रतिष्ठिता च स्वादर्शैस्तथा च प्रतिरूपकैः ॥ २४६ ॥
एवंविधा राजसभा मन्त्रार्था कार्यदर्शने ।
कमरों के ऊपर छत या खपड़ों का छाजन बनाना चाहिये। दुमञ्जिले यदि बगल के कमरे हों तो मध्य का कमरा एक-मञ्जिला होना चाहिये। पृथक् २ स्तम्भों के अन्त में अच्छे कमरों से युक्त, चारों दिशाओं में बने हुए द्वारों से सुशोभित जलयन्त्रों (फव्वारों) तथा सुन्दर स्वरवाले बाजों से हवा पहुंचानेवाले यन्त्रों (यन्त्र-चालित, पङ्खों) से, तथा समयसूचक यन्त्रों (घड़ी) एवं सुन्दर शीशों तथा चित्रों से सुसज्जित इस प्रकार की राजसभा विचार करने एवं कार्य देखने के लिये होनी चाहिये।
तथाविधामात्यलेख्यसभ्याधिकृतशालिकाः ॥ २५० ॥
कर्तव्याः प्रागुदक्वेतास्तदर्थाश्च पृथक्पृथक् ।
शतहस्तमितां भूमिं त्यक्त्वा राजगृहात्सदा ॥ २५१ ॥
**मन्त्री आदि के लिये भवन बनाने का निर्देश—**इसी प्रकार से मन्त्री, लेख तथा सभा के सदस्य (कौंसिल के मेम्बर) तथा अधिकारी पुरुषों के कमरे होने चाहिये। इन सब कमरों को पूर्वोक्त प्रत्येक कार्यों के लिये पृथक् पृथक् सदा राजभवन से १०० हाथ की दूरी पर बनवाना चाहिये।
तद्वद्द्विशतहस्तां प्राक्सेनासंवेशनार्थिकाम् ।
आराद्राजगृहस्यैव प्रजानां निलयानि च ॥ २५२ ॥
सधनश्रेष्ठजात्यानुक्रमतश्च सदा बुधः ।
समन्ताद्धि चतुर्दिक्षु विन्यसेच्च ततः परम् ॥ २५३ ॥
**सेनानिवेश-स्थान तथा प्रजावर्गों के स्थानों का क्रम—**राजभवन से उत्तर अथवा पूर्व सेनाओं के रहने के लिये गृह होना चाहिये। उसके बाद प्रजाओं का गृह राजभवन से दूर होना चाहिये। धनिक और उत्तम वंशवालों का क्रमानुसार राजभवन के चारो दिशाओं में गृह होना चाहिये।
प्रकृत्यनुप्रकृतयो ह्यधिकारिगणस्ततः ।
| ३८ | शुक्रनीतिः |
|---|
सेनाधिपाः पदातीनां गणः सादिगणस्ततः ॥ २५४ ॥
साश्वश्च सगजश्चापि गजपालगणस्ततः ।
बृहन्नालिकयन्त्राणि ततः स्वतुरंगोगणः ॥ २५५ ॥
ततः स्वगौल्मिकगणो ह्यारण्यकगणस्ततः ।
क्रमादेषां गृहाणि स्युः शोभनानि पुरे सदा ॥ २५६ ॥
और नगर में प्रकृति (मन्त्री), अनुप्रकृति (मन्त्री के नीचे काम करने वाले), अधिकारियों (अफसरों) के गण, सेनापति, पैदल सिपाहियों का गण, घुड़ सवारों का गण, हयशाला, गजशाला और गजपालों (हस्तिरक्षकों) का गण, बड़ी २ तोपें, धोबियों का गण, गोपालों का गण, आरण्यकों (जंगली भिल्लादिकों) का गण इन सबों के लिये क्रम से गृह होने चाहिये।
पान्थशाला ततः कार्या सुगुप्ता सुजलाशया ।
सजातीयगृहाणां हि समुदायेन पंक्तितः ॥ २५७ ॥
निवेशनपुरे ग्रामे प्रागुदङ्मुखमेव वा ।
सजातिपण्यनिवहैरापणे पण्यवेशनम् ॥ २५८ ॥
धनिकादिक्रमेणैव राजमागंस्य पार्श्वयोः ।
एवं हि पत्तनं कुर्याद् ग्रामं चैव नराधिपः ॥ २५९ ॥
**धर्मशाला के निर्माण का निर्देश—**और यात्रियों के ठहरने के लिये धर्मशाला होनी चाहिये जो कि सुरक्षित हो तथा सुन्दर जलाशय (कूप आदि) से युक्त हो और जिसमें समान आकारवाले गृहों का समुदाय कतार से हों ऐसे गृह पुर अथवा ग्राम में पूर्व अथवा उत्तर मुख का बनवाने चाहिये। और आपण (बाजार) में एक जाति के पण्यों (बिकनेवाली वस्तुओं) के समूह से युक्त दुकानें बनवानी चाहिये। धनिक आदियों के क्रम से राजमार्ग के दोनों तरफ दुकानें बनवानी चाहिये। इस प्रकार से राजा नगर या ग्राम का निर्माण करावे।
राजमार्गास्तु कर्तव्याश्चतुर्दिक्षु नृपगृहात् ।
उत्तमो राजमार्गस्तु त्रिंशद्धस्तमितो भवेत् ॥ २६० ॥
मध्यमो विंशतिकरो दशपञ्चकरोऽधमः ।
पण्यमार्गास्तथा चैते पुरग्रामादिषु स्थिताः ॥ २६१ ॥
**राजमार्गादि-निर्माण का निर्देश—**राजभवन के चारों दिशाओं में राजमार्ग (प्रधान सड़क) बनवाना चाहिये। उत्तम राजमार्ग ३० हाथ चौड़ी होती है। मध्यम २० हाथ चौड़ी, अधम राजमार्ग १५ हाथ चौड़ा होता है। पुर तथा ग्रामादिकों में इन्हीं ३ प्रकार के पण्यमार्ग (बाजार की सड़कें) बनाये जाते हैं।
प्रथमोऽध्यायः ३९
करत्रयात्मिका पद्या वीथिः पञ्चकरात्मिका ।
मार्गो दशकरः प्रोक्तो ग्रामेषु नगरेषु च ॥ २६२ ॥
ग्राम और नगरों में पद्या (पगडण्डी) ३ हाथ चौड़ी, वीथि (गली) ५ हाथ चौड़ी और मार्ग १० हाथ चौड़ा बनाया जाता है ।
प्राक्पश्चाद्दक्षिणोदक्तान् याममध्यात् प्रकल्पयेत् ।
पुरं दृष्ट्वा राजमार्गांत्सुबहून्कल्पयेन्नृपः ॥ २६३ ॥
राजा ग्राम के मध्य भाग से पूर्व से पश्चिम और दक्षिण से उत्तर जाने वाले राजमार्ग बनवाये । और उन्हें नगर के अनुसार बहुत सा भी बनवा सकता है ।
न वीथि न च पद्यां हि राजधान्यां प्रकल्पयेत् ।
षड्योजनान्तरेऽरण्ये राजमार्गं तु चोत्तमम् ॥ २६४ ॥
कल्पयेन्मध्यमं मध्ये तयोर्मध्ये तथाधमम् ।
दशहस्तात्मकं नित्यं ग्रामे ग्रामे नियोजयेत् ॥ २६५ ॥
राजधानी में पद्या (पगडण्डी), वीथि (गली) नहीं बनवानी चाहिये । ६ योजन (२४ क्रोश) के अन्तर पर जङ्गल में उत्तम राजमार्ग (३० हाथ चौड़ी सड़क) बनवाना चाहिये । मध्य में मध्यम राजमार्ग (२० हाथ चौड़ी सड़क) बनवाना चाहिये । उन दोनों के मध्य में दस हाथ चौड़ाई का अधम-संज्ञक राजमार्ग प्रत्येक ग्राम में सदा बनवाना चाहिये ।
कूर्मपृष्ठा मार्गभूमिः कार्या ग्राम्यैः सुसेतुका ।
कुर्यान्मार्गांन्पार्श्वखातान्निर्गमार्थं जलस्य च ॥ २६६ ॥
ग्रामवालों को अपने २ ग्राम की सड़कों की भूमि का आकार कछुये की पीठ की भांति बनवाना चाहिये । और उसमें आवश्यकतानुसार पुल भी होना चाहिये । और ऐसे मार्ग बनवाने चाहिये, जिसमें जल बहने के लिये दोनों तरफ नालियां बनी हों ।
राजमार्गमुखानि स्युर्गृहाणि सकलान्यपि ।
गृहपृष्ठे दासवीथी मलनिर्हरणस्थलम् ॥ २६७ ॥
पंक्तिद्वयगतानां हि गेहानां कारयेत्तथा ।
मार्गांत्सुधाशर्करैर्वा घटितान्प्रतिवत्सरम् ॥ २६८ ॥
अभियुक्तनिरुद्धैर्वा कुर्याद् ग्राम्यजनैर्नृपः ।
और जितने गृह हों उनके सभी मुख (प्रधान द्वार) राजमार्ग की तरफ हों । और गृह के पिछवारे नौकरों के आने-जाने के लिये गली एवं पाखाना हो । गृहों की दो पङ्क्तियों के बीच में जो रास्ते हों उन्हें प्रतिवर्ष चूना-कङ्कर
४० शुक्रनीतिः
आदि डालकर मरम्मत कराते रहना चाहिये। राजा इसे ग्रामवालों से या कैदियों से ठीक करावे।
ग्रामद्वयान्तरे चैव पान्थशाला प्रकल्पयेत् ॥ २६९ ॥
नित्यं सम्मार्जितां चैव ग्रामपैश्च सुगोपिताम् ।
तत्रागतं तु संपृच्छेत्पान्थं शालाधिपः सदा ॥ २७० ॥
प्रयातोसि कुतः कस्मात्क गच्छसि ऋतंवद ।
ससहायोऽसहायो वा सशस्त्रः किं सवाहनः ॥ २७१ ॥
का जातिः किं कुलं नाम स्थितिः कुत्रास्ति ते चिरम् ।
इति पृष्ट्वा लिखेत्सायं शस्त्रं तस्य प्रगृह्य च ॥ २७२ ॥
सावधानमना भूत्वा स्वापं कुर्विति शासयेत् ।
तत्रस्थान्गणयित्वा तु शालाद्वारं पिधाय च ॥ २७३ ॥
संरक्षयेद्यामिकैश्च प्रभाते तान् प्रबोधयेत् ।
शस्त्रं दद्याच्च गणयेद् द्वारमुद्घाट्य मोचयेत् ॥ २७४ ॥
कुर्यात्सहायं सीमान्तं तेषां । ग्राम्यजनस्सदा ।
धर्मशाला की व्यवस्था— और दो ग्रामों के बीच में १ धर्मशाला बनवानी चाहिये जिसकी नित्य सफाई और रक्षा का प्रबन्ध ग्राम के जमीनदार या मुखिया के द्वारा होनी चाहिये। धर्मशाला का प्रबन्धक वहां ठहरे हुये यात्री से यह पूछे कि—यह सच बताओ कि—तुम कहां से आये हो ? क्यों आये हो ? और कहां जा रहे हो ? क्या तुम्हारे कोई साथी है या अकेले हो ? क्या शस्त्र या सवारी कोई तुम्हारे पास है ? तुम्हारी कौन जाति है ? तुम किस वंश के हो ? तुम्हारा क्या नाम है ? तुम अधिकतर कहां रहते हो अर्थात् तुम्हारा गृह कहां है। ये सब बातें सायंकाल को पूछ कर लिखे और यात्रियों के शस्त्र को अपने पास रख सावधान-मन होकर 'शयन करो' ऐसा कहकर यात्रियों पर शासन रखे। एवं वहां पर आये हुये यात्रियों की सायंकाल में गणना कर धर्मशाला के प्रधान द्वार को बन्द कर चौकीदारों से रात्रिभर रक्षा करावे। और प्रातःकाल यात्रियों को जगावे एवं उनके शस्त्रों को लौटाकर पुनः यात्रियों की गणना करे और फाटक खोलकर उन्हें बाहर कर दे। और ग्राम के लोग सीमा तक जाकर यात्रियों की सदा रक्षा करें।
प्रकुर्याद्दिनकृत्यं तु राजधान्यां वसन्नृपः ॥ २७५ ॥
उत्थाय पश्चिमे यामे मुहूर्तद्वितयेन वै ।
नियतायश्च कत्यस्ति व्ययश्च नियतः कति ॥ २७६ ॥
कोशभूतस्य द्रव्यस्य व्ययः कति गतस्तथा ।
व्यवहारे मुद्रितायव्ययशेषं कतीति च ॥ २७७ ॥
प्रथमोऽध्यायः ४१
प्रथमोऽध्यायः ४१
प्रत्यक्षतो लेखतश्च ज्ञात्वा चाद्य व्ययः कति ।
भविष्यति च तत्तुल्यं द्रव्यं कोशात्तु निर्हरेत् ॥ २७८ ॥
राजाओं के आवश्यकीय दैनिक कृत्य— राजधानी में रहता हुआ राजा निम्नरीति से प्रतिदिन के कार्यों को करे। जैसे रात्रि के चतुर्थ प्रहर में दो मुहूर्त तक आज का कितना नियत आय ( आमद ) है और कितना नियत व्यय ( खर्च ) है ? खजाने में रखे हुए द्रव्य में से कितना द्रव्य व्यय हुआ, व्यवहार में मुद्रित आय-व्यय होने पर कितना शेष है । यह बात प्रत्यक्ष तथा लेख से जांचकर आज कितना व्यय होगा अतः उसके अनुसार खजाने से उतना द्रव्य निकलवा कर अलग रख दे ।
पश्चात्तु वेगनिर्मोक्षं स्नानं मौहूर्तिकं मतम् ।
सन्ध्यापुराणदानैश्च मुहूर्तद्वितयं नयेत् ॥ २७६ ॥
मुहूर्त्तों के विभाग द्वारा राजा के कार्यों का निर्देश— इसके बाद १ मुहूर्त तक मल-मूत्रादि का परित्याग और स्नान करे । सन्ध्या कृत्य, पुराणश्रवण और दान करने में दो मुहूर्त तक समय दे ।
पारितोषिकदानेन मुहूर्तं तु नयेत्सुधीः ।
धान्यवस्त्रस्वर्णरत्नसेनादेशविलेखनैः ॥ २८० ॥
सायव्ययैर्मुहूर्तानां चतुष्कं तु नयेत्सदा ।
स्वस्थचित्तो भोजनेन मुहूर्तं ससुहृन्नृपः ॥ २८१ ॥
समझदार राजा पारितोषिक ( इनाम ) देने का कार्य १ मुहूर्त तक करे । सदा धान्य, वस्त्र, सुवर्ण, रत्नों के देखने और सेना के लिये आदेश ( हुक्म ) लिखने एवं आय-व्यय के निरीक्षण में ४ मुहूर्त तक समय व्यतीत करे । और राजा अपने मित्रों के साथ भोजन करके १ मुहूर्त तक स्वस्थ चित्त हो विश्राम करे ।
प्रत्यक्षीकरणाज्जीर्णनवीनानां मुहूर्तकम् ।
ततस्तु प्राड्विवाकादिबोधितव्यवहारतः ॥ २८२ ॥
मुहूर्तद्वितयं चैव मृगयाक्रीडनैर्नयेत् ।
व्यूहाभ्यासैर्मुहूर्तं तु मुहूर्तं सन्ध्यया ततः ॥ २८३ ॥
मुहूर्तं भोजनेनैव द्विमुहूर्तं च वार्तया ।
गूढचारैः श्रावितया निद्रयाष्टमुहूर्तकम् ॥ २८४ ॥
और पुरानी तथा नवीन वस्तुओं के निरीक्षण करने में १ मुहूर्त, तथा प्राड्विवाक ( जज या वकील ) आदि से समझाये हुये व्यवहारों ( मुकदमों ) के देखने में २ मुहूर्त समय व्यतीत करे । मृगया ( शिकार खेलना ) तथा क्रीडन ( खेल ) में दो मुहूर्त, व्यूहाभ्यास में १ मुहूर्त तथा सन्ध्या में १ मुहूर्त,
४२ | शुक्रनीतिः
भोजन में १ मुहूर्त और गूढचारों (जासूसों) से सुनाई गई बातों के सुनने में दो मुहूर्त एवं निद्रा (सोने) में ८ मुहूर्त तक समय व्यतीत करें।
एवं विहरतो राज्ञः सुखं सम्यक्प्रजायते ।
अहोरात्रं विभज्यैवं त्रिंशद्भिस्तु मुहूर्तकैः ॥ २८५ ॥
नयेत्कालं वृथा नैव नयेत्स्त्रीमद्यसेवनैः ।
इस प्रकार से विहार (व्यवहार) करनेवाले राजा को भलीभांति सुख मिलता है। पूर्वोक्त रीति से ३० मुहूर्तों में अहोरात्र (दिन-रात) को बांटकर समय व्यतीत करे, न कि स्त्री तथा मद्य का सेवन करने से वृथा समय व्यतीत करे।
यत्काले ह्युचितं कर्तुं तत्कार्यं द्रागशङ्कितम् ॥ २८६ ॥
काले वृष्टिः सुपोषाय ह्यन्यथा सुविनाशिनी ।
जिस समय में जो कार्य करने के लिये उचित हो उसे उसी समय निःशङ्क होकर झटपट कर डाले। क्योंकि—समय पर हुई वृष्टि धान्यादि की सुन्दर पुष्टि के लिये होती है अन्यथा (बे-समय की) वृष्टि धान्यादि-विनाशक होती है।
कार्यस्थानानि सर्वाणि यामिकैरभितोऽनिशम् ॥ २८७ ॥
नयवान्नीतिगतिवित्सिद्धशस्त्रादिकैर्वरैः ।
चतुर्भिः पञ्चभिर्वापि षड्भिर्वा गोपयेत्सदा ॥ २८८ ॥
नीति और नीति की चालों को समझने वाला राजा सदा कार्य के सम्पूर्ण स्थानों की चारो तरफ से शस्त्रादि चलाने में निपुण, अच्छे, ४, ५ या ६ प्रहरियों (पहरेदारों) से रक्षा करावे।
तत्रत्यानि दैनिकानि शृणुयाल्लेखकाधिपैः ।
दिने दिने यामिकानां प्रकुर्यात्परिवर्तनम् ॥ २८९ ॥
और उन कार्य-स्थानों की दैनिक कार्यवाहियों को वहां के लेखाध्यक्षों से सुने। और प्रतिदिन पहरेदारों की बदली किया करे।
गृहपंक्तिमुखे द्वारं कर्तव्यं यामिकैः सदा ।
तैस्तद्वृत्तं तु शृणुयाद् गृहस्थभृतिपोषितैः ॥ २९० ॥
प्रहरियों के कर्त्तव्य का निर्देश— गृहों की पंक्तियों के प्रधान द्वार पर नियुक्त पहरेदारों से वहां के रहनेवालों के व्यवहार (चरित्र) को सुने। और पहरेदारों को गृहस्थों से वेतन दिला कर पालन-पोषण करे।
निर्गच्छन्ति च ये ग्रामाद्ये ग्रामं प्रविशन्ति च ।
तान्सुसंशोध्य यत्नेन मोचयेत्तल्लग्नकान् ॥ २९१ ॥
प्रख्यातवृत्तशीलांस्तु ह्यविमृश्य विमोचयेत् ।
प्रथमोऽध्यायः ४३.
ग्राम से जो निकल रहे हैं वा प्रवेश कर रहे हैं उनकी यत्नपूर्वक तलाशी लेकर चिह्न लगाने के बाद उन्हें छोड़ देवे । और जिनके व्यवहार तथा शील प्रख्यात हों ऐसे प्रतिष्ठित लोगों को बिना विचार किये ही छोड़ देवे ।
वीथीवीथिषु यामार्द्धैर्निशि पर्य्यटनं सदा ॥ २६२ ॥
कर्त्तव्यं यामिकैरेवं चौरजारनिवृत्तये ।
प्रत्येक गलियों में रात्रि के समय आधे २ प्रहर (डेढ़ २ घण्टे) पर घूम २ कर पहरेदारों को इस प्रकार से पहरा देना चाहिये जिससे चोर तथा जार ( परस्त्री गामी ) पुरुष दूर रहें ।
शासनं त्वीदृशं कार्यं राज्ञा नित्यं प्रजासु च ॥ २६३ ॥
दासे भृत्येऽथ भार्य्यायां पुत्रे शिष्येपि वा क्वचित् ।
वाग्दण्डपरुषन्नैव कार्य्य मद्देशसंस्थितैः ॥ २६४ ॥
प्रजाओं में राजा के आदेशों की घोषणा का निर्देश— और राजा को प्रजाओं के लिये नित्य इस प्रकार से शासन ( आदेश ) देना चाहिये कि—मेरे राज्य में रहनेवालों के लिये लिये यह उचित है कि—वे गुलाम, नौकर, स्त्री, पुत्र, शिष्य इनमें से किसी को भी कठोर-वचनों से दण्ड न देवें ।
तुलाशासनमानानां नाणकस्यापि वा क्वचित् ।
निर्य्यासानां च धातूनां सजातीनां घृतस्य च ॥ २६५ ॥
मधुदुग्धवसादीनां पिष्टादीनां च सर्व्वदा ।
कूटं नैव तु कार्य्यं स्याद्बलाच्च लिखितं जनैः ॥ २६६ ॥
उत्कोचग्रहणं नैव स्वामिकार्य्यविलोपनम् ।
तुला ( तौलने में ) एवं शासन (आज्ञा), मान (बटखरा), नाणक ( मुद्रा सिक्का मात्र ), निर्यास ( गोंद आदि ), धातु ( स्वर्णादि ); तथा उसके समान जाति के पदार्थ, घृत, मधु, दुग्ध, चर्बी आदि, पिसान ( चूर्ण आदि ) में कभी किसी प्रकार की बेईमानी या मिलावट लोगों को नहीं करना चाहिये । और कभी किसी से जबर्दस्ती कुछ नहीं लिखाना चाहिये और घूस नहीं लेनी चाहिये एवं स्वामी का कार्य नष्ट नहीं करना चाहिये ।
दुर्वृत्तकारिणं चोरं जारमद्वेषिणं द्विषम् ॥ २६७ ॥
न रक्षन्त्वप्रकाशं हि तथान्यानपकारकान् ।
मातॄणां पितॄणां चैव पूज्यानां विदुषामपि ॥ २६८ ॥
नावमानं नोपहासं कुर्युः सद्वृत्तशालिनाम् ।
न भेदं जनयेयुर्वै नूनार्य्यैः स्वामिभृत्ययोः ॥ २६९ ॥
भ्रातॄणां गुरुशिष्याणां न कुर्युः पितृपुत्रयोः ।
और दुष्ट आचरण करनेवाले ( गुण्डे ), चौर, जार ( लम्पट ), ये चाहे
४४ | शुक्रनीतिः
द्वेषी हों या न हों किन्तु इनकी छिप करके भी कभी रक्षा नहीं करनी चाहिये और इसी भाँति जनता के अपकारक लोगों की भी रक्षा नहीं करनी चाहिये । एवं माता-पिता, पूज्य, विद्वान, अच्छे आचरणवाले सत्पुरुषों का अपमान वा उपहास नहीं करना चाहिये । स्त्री-पुरुष तथा स्वामी-नौकर में भेद नहीं डालना चाहिये अर्थात् ऐसा व्यवहार भाई-भाई, गुरु-शिष्य, पिता-पुत्र, इनमें नहीं करना चाहिये कि ये परस्पर एक दूसरे से पृथक् हो जायँ ।
वापीकूपारामसीमाधर्मशालासुरालयान् ॥ ३०० ॥
मार्गान्नैव प्रबाधेयुर्हीनांगविकलांगकान् ।
बावड़ी, कूप, बगीचा, सीमा, धर्मशाला, देवमन्दिर, मार्ग, हीन तथा विकल अङ्गवाले लोगों को क्षति तथा पीडा न पहुँचावे ।
द्यूतं च मद्यपानं च मृगयां शस्त्रधारणम् ॥ ३०१ ॥
गोगजाश्वोष्ट्रमहिषीनृणां वै स्थावरस्य च ।
रजतस्वर्णरत्नानां मादकस्य विषस्य च ॥ ३०२ ॥
क्रयं वा विक्रयं वापि मद्यसंधानमेव च ।
क्रयपत्रं दानपत्रमृणनिर्णयपत्रकम् ॥ ३०३ ॥
राजाज्ञया विना नैव जनैः कार्यं चिकित्सितम् ।
महापापाभिशापं निधिग्रहणमेव च ॥ ३०४ ॥
और बिना राजा की आज्ञा पाये द्यूत ( जुआ खेलना ), मद्य पीना, शिकार खेलना, शस्त्र रखना और गो, गज, अश्व, ऊंट, भैंस, स्थावर पदार्थ ( गृहादि ), चांदी, सोना, रत्न, मादक द्रव्य ( भांग-अफीम आदि ), विष, इन सब द्रव्यों का क्रय ( खरीदना ) वा विक्रय ( बेचना ) करना, मद्य का सन्धान ( शराब बनाना ), क्रयपत्र ( खरीदने का पत्र ), दानपत्र, ऋण के निर्णय का पत्र और चिकित्सा, महापाप का दोष लगाना, गड़े हुये द्रव्य को लेना, इन सब कार्यों को नहीं करना चाहिये ।
नवसमाजनियमं निर्णयं जातिदूषणम् ।
अस्वामि-नाष्टिक-धनसंग्रहं मन्त्रभेदनम् ॥ ३०५ ॥
नृपदुर्गुणलोपं तु नैव कुर्युः कदाचन ।
नये समाज के नियमों का निर्णय, जाति को दोष लगाना, बिना स्वामी का एवं नष्ट हुये व्यक्ति के धन को लेना, रहस्य का प्रकाश करना, राजा के दुर्गुणों को छिपाना, इन सब कार्यों को कभी नहीं करना चाहिये ।
स्वधर्महानिमनृतं परदाराभिमर्शनम् ॥ ३०६ ॥
कूटसाक्ष्यं कूटलेख्यमप्रकाशप्रतिग्रहम् ।
निर्धारितकराधिक्यं स्तेयं साहसमेव च ॥ ३०७ ॥