शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 144, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ | शुक्रनीतिः
और यथार्थ ( उचित ) कहनेवाले पुरुषों की बातों से एवं आगम ( नीति-शास्त्रादि शब्द प्रमाण ), अनुमान, प्रत्यक्ष, सादृश्य ( उपमान ) इन प्रमाणों से, साहस, छल बल एवं गुरुता तथा लघुता से जो व्यवहारों में विचित्रता तथा महत्ता पाई जाती है उन सबों का ज्ञान प्राप्त करना अकेले एक मनुष्य से संभव नहीं हो सकता है अतः राजा राज्य की उन्नति के लिये ऐसे सहायकों को रखना स्वीकार करे।
कुलगुणशीलवृद्धाञ्शूरान् भक्तानप्रियंवदान् ।
हितोपदेशकान्क्लेशसहान् धर्मरतान्सदा ॥ ८ ॥
कुमार्गगं नृपमपि बुद्धयोद्धर्तुं क्षमाञ्छुचीन् ।
निर्मत्सरान्कामक्रोधलोभहीनान्निरालसान् ॥ ९ ॥
जो कुल, गुण और शील से बड़े हों और शूर, राजभक्त, प्रियभाषी, हितकारक उपदेश देनेवाले, क्लेश सहनेवाले, सदा धर्म पर चलनेवाले, कुमार्ग-गामी राजा को अपनी बुद्धि बल से कुमार्ग से हटाने में समर्थ, पवित्र आचरण तथा विचार वाले, मत्सरता, काम, क्रोध, लोभ और आलस्य से हीन हों।
हीयते कुसहायेन स्वधर्माद्राज्यतो नृपः ।
कुकर्मणा प्रनष्टास्तु दितिजाः कुसहायतः ॥ १० ॥
नष्टा दुर्योधनाद्यास्तु नृपाः शूरा बलाधिकाः ।
निरभिमानो नृपतिः सुसहायो भवेदतः ॥ ११ ॥
**बुरे सहायकों से राजा की हानि का निर्देश—**कुत्सित सहायकों से राजा अपने धर्म तथा राज्य से च्युत हो जाता है। जैसे दैत्य लोग और दुर्योधनादि राजा लोग शूर एवं अधिक बलशाली होते हुये भी कुत्सित कर्म करने तथा कुत्सित सहायकों का साथ करने से नष्ट हो गये अतः राजा को अभिमान-रहित तथा अच्छे सहायकों से युक्त होना चाहिये।
युवराजोऽमात्यगणो भुजावेतौ महीभुजः ।
तावेव नयने कर्णौ दक्षसव्यौ क्रमात्स्मृतौ ॥ १२ ॥
**युवराजादि राजा के अङ्ग हैं इसका निर्देश—**युवराज तथा मन्त्रिगण ये दोनों क्रम से राजा के दक्षिण तथा वाम अङ्ग के दोनों बाहु, नेत्र तथा कर्ण माने गये हैं।
बाहुकर्णाक्षिहीनः स्याद्विना ताभ्यामतो नृपः ।
योजयेच्चिन्तयित्वा तौ महानाशाय चान्यथा ॥ १३ ॥
इसलिये राजा उन दोनों ( युवराज तथा मन्त्रिगण ) के बिना बाहु, कर्ण तथा नेत्र से हीन समझा जाता है। अतः इन दोनों की नियुक्ति सोच-समझ-