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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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प्रस्तावना

श्री नारायण मिश्र
अध्यापक : संस्कृत पालि-विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय ।

नीति-सागर-निष्कान्ताः कु-प्रज्ञा-मारुतेरिताः ।
पृथक्त्वेनेव दृश्यन्ते नाना-शास्त्र-महोर्मयः ॥१

प्राचीन काल से ही विद्या की संख्या के विषय में अनेक मत-मतान्तर प्रचलित हैं। याज्ञवल्क्य² स्मृति में १४ विद्याओं का उल्लेख है । उनके नाम हैं—पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्म-शास्त्र, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, छन्दस्, निरुक्त, ज्योतिष, ऋक्, यजुः, साम तथा अथर्ववेद । मनु³ के मत में भी इतनी ही विद्याएँ मानी गई हैं । विष्णुपुराण ( ३।६।२८ ) में आयुर्वेद, धनुर्वेद, सङ्गीत-शास्त्र तथा अर्थ-शास्त्र के साथ १८ विद्याओं को माना गया है । छान्दोग्य-उपनिषद्⁴ में संक्षेपतः १९ विद्याओं का उल्लेख है । शुक्र-नीति-सार⁵ में ३२ विद्याओं का निर्देश तथा उनके लक्षण किए गए हैं । परन्तु इतना तो स्पष्ट है कि किसी मत से किसी मतान्तर का वास्तव विरोध नहीं है, केवल अन्तर्भाव के प्रकार में अन्तर है । अन्तर्भाव की प्रक्रिया का संक्षिप्त रूप हमें कौटिल्य-अर्थ-शास्त्र में उपलब्ध होता है । अर्थ-शास्त्र के उल्लेख के अनुसार


१. कामन्दकीय-नीति-सार-उपाध्याय-निरपेक्षा—पृ० ४७ ( आनन्दाश्रम )
२. पुराण-न्याय-मीमांसा-धर्म-शास्त्राङ्ग-मिश्रिताः ।
वेदाः स्थानानि विद्यानाम्...॥ या० स्मृ० १।३ ॥
३. अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्याय-विस्तरः ।
धर्म-शास्त्रं पुराणं च विद्यास्त्वेताश्चतुर्दश ॥
( नैषधीय-चरित १।४ की 'प्रकाश' व्याख्या में मनु के नाम से उद्धृत )
४. ऋग्वेदं भगवोऽध्येमि यजुर्वेदं सामवेदम् आथर्वणं चतुर्थम् इतिहास-पुराणं पञ्चमम् वेदानाम् वेदम् पित्र्यम् राशिम् दैवम् निधिम् वाकोवाक्यम् एकायनम् देव-विद्याम् ब्रह्म-विद्याम् भूत-विद्याम् क्षत्र-विद्याम् नक्षत्रविद्याम् सर्प-देवजन-विद्याम् एतद्भगवोऽध्येमि । छा० उ० ७।१।२ ॥
५. शुक्रनीतिसार ४। २६७–३०५ ॥