शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें६६ | शुक्रनीतिः
ऐसा यत्न करनेवाला, अन्याय-पथ पर चलनेवाले स्वामी को सत्पथ पर चलाने में यत्नशील, स्वामी के किसी बातों पर आक्षेप नहीं करनेवाला, और उनकी त्रुटियों को देखकर कभी किसी के सामने प्रकाशित न करनेवाला, अच्छे कार्यों में जल्दी और बुरे कार्यों में देर लगाकर कार्य करनेवाला, स्वामी के भार्या, पुत्र, मित्र के छिद्रों (दोषों) को कभी नहीं देखनेवाला (नहीं प्रकाश करनेवाला), और स्वामी के सम्बन्धियों के भार्या, पुत्र आदि बन्धुजनों के विषय में स्वामी जैसा आदर-सम्मान करते हों वैसा ही बुद्धि रखकर उन सबों के साथ व्यवहार करनेवाला, और स्वयं अपनी प्रशंसा नहीं करनेवाला एवं स्वामी या स्वामी के सम्बन्धी जनों के साथ स्पर्धा या उनके गुणों में दोषारोप या निन्दा नहीं करनेवाला, दूसरे के अधिकार पाने की लालसा नहीं रखनेवाला, निस्पृह होकर सदा प्रसन्न रहनेवाला, स्वामी के समक्ष उसके दिये हुये वस्त्र तथा भूषणादि को सदा धारण करनेवाला, वेतन के अनुसार अपना व्यय करनेवाला, इन्द्रियों का दमन करनेवाला, दयालु, शूर और स्वामी के अनुचित कार्य को एकान्त में उसके सामने सूचित करनेवाला भृत्य (मन्त्री आदि) श्रेष्ठ कहलाता है। और उपरलिखित गुणों से विपरीत गुणोंवाला भृत्य निन्द्य कहलाता है।
ये भृत्या हीनभृतिका ये दण्डेन प्रकर्षिताः ॥ ६६ ॥
शठाश्च कातरा लुब्धाः समक्षप्रियवादिनः ।
मत्ता व्यसनिनश्चार्ता उत्कोचेष्टाश्च देविनः ॥ ६७ ॥
नास्तिका दाम्भिकाश्चैवासत्यवाचोऽप्यसूयकाः ।
ये चापमानिता येऽसद्वाक्यैर्मर्मणि भेदिताः ॥ ६८ ॥
रिपोर्मित्राः सेवकाश्च पूर्ववैरानुबन्धिनः ।
चण्डाः साहसिका धर्महीना नैते सुसेवकाः ॥ ६९ ॥
संक्षेपतस्तु कथितं सदसद्भृत्यलक्षणम् ।
निन्द्यभृत्य के लक्षण— जो भृत्य स्वल्प वेतन पानेवाले, निरन्तर अपराध करने से दण्ड द्वारा अत्यन्त पीड़ित किये, शठ, कायर, लोभी, सामने प्रिय बोलनेवाले, मद्य पीकर मतवाले हुये, शिकार आदि के व्यसनी, रोगी, घूस लेनेवाले, जूआ खेलनेवाले, नास्तिक, दाम्भिक, झूठे, गुणों में दोषारोप करनेवाले, अपमानित, कठोर वाक्यों से मर्म में पीड़ा पहुँचाये गये, शत्रुओं के मित्र या सेवक, पूर्व वैर को मन में रखनेवाले, अत्यन्त क्रोधी, बिना विचारे सहसा कार्य करनेवाले या धर्म से हीन होते हैं वे सुन्दर सेवक नहीं होते हैं अर्थात् ये निन्द्य भृत्यों के लक्षण हैं। इस प्रकार से संक्षेप में अच्छे-बुरे सेवकों के लक्षण कहे गये।
समासतः पुरोधादिलक्षणं यत्तदुच्यते ॥ ७० ॥