भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 526 में से

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द्वितीयोऽध्यायः ६७

पुरोधाश्च प्रतिनिधिः प्रधानः सचिवस्तथा।
मन्त्री च प्राड्विवाकश्च पण्डितश्च सुमन्त्रकः॥ ७१ ॥
अमात्यो दूत इत्येता राज्ञः प्रकृतयो दश।
दशमाशाधिकाः पूर्वं दूतान्ताः क्रमशः स्मृताः॥ ७२ ॥

दस प्रकृतियों के नाम— अब पुरोहित आदि के जो लक्षण हैं उन्हें संक्षेप से कहते हैं। पुरोहित, प्रतिनिधि, प्रधान, सचिव, मन्त्री, प्राड्विवाक, पण्डित, सुमन्त्रक, अमात्य, दूत ये दस राजा के 'प्रकृति' (राज्य चलाने में प्रधान कारण) कहलाते हैं। और पुरोधा से लेकर दूतपर्य्यन्त इन दशों के वेतन पूर्व-पूर्व एक दूसरे की अपेक्षा दशमांश अधिक होते हैं। अर्थात् दूत से दश-मांश अधिक अमात्य का, उससे दशमांश अधिक सुमन्त्रक का, उससे दशमांश अधिक पण्डित का, उससे दशमांश अधिक प्राड्विवाक का, उससे दशमांश अधिक मन्त्री का, उससे दशमांश अधिक सचिव का, उससे दशमांश अधिक प्रधान का, उससे दशमांश अधिक प्रतिनिधि का, उससे दशमांश अधिक पुरोधा का वेतन होता है, जो सबसे अधिक होता है।

अष्टप्रकृतिभिर्युक्तो नृपः कैश्चित्स्मृतः सदा।
सुमन्त्रः पण्डितो मन्त्री प्रधानः सचिवस्तथा॥ ७३ ॥
अमात्यः प्राड्विवाकश्च तथा प्रतिनिधिः स्मृतः।
एता वृत्तिसमास्त्वष्टौ राज्ञः प्रकृतयः सदा॥ ७४ ॥

आठ प्रकृतियों के नाम— और किसी के मत से—राजा सदा ८ प्रकृतियों से युक्त होता है जो कि इस क्रम से हैं—सुमन्त्र, पण्डित, मन्त्री, प्रधान, सचिव, अमात्य, प्राड्विवाक, प्रतिनिधि। ये ८ राजा की प्रकृतियां सदा वेतन में परस्पर समान हैं अर्थात् इनके पूर्वमत की भांति भिन्न-भिन्न वेतन नहीं है।

इङ्गिताकारतत्त्वज्ञो दूरस्तदनुगः स्मृतः।

और इङ्गित (हृद्गतभाव) तथा आकार (शरीर की चेष्टायें) इन दोनों के तत्त्व को जाननेवाला एवं राजा या सुमन्त्र आदि ८ प्रकृतियों के आज्ञानुसार कार्य करनेवाला दूत साधारण नौकरमात्र है अतः इस मत में प्रकृति के अन्दर इसकी गणना नहीं की गई।

पुरोधाः प्रथमं श्रेष्ठः सर्वेभ्यो राजराष्ट्रभृत्॥ ७५ ॥
तदनु स्यात्प्रतिनिधिः प्रधानस्तदनन्तरम्।
सचिवस्तु ततः प्रोक्तो मन्त्री तदनु चोच्यते॥ ७६ ॥
प्राड्विवाकस्ततः प्रोक्तः पण्डितस्तदनन्तरम्।
सुमन्त्रस्तु ततः ख्यातो ह्यमात्यस्तु ततः परम्॥ ७७ ॥
दूतस्ततः क्रमादेते पूर्वश्रेष्ठा यथागुणाः।

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