शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 156, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ें७० | शुक्रनीतिः
अकर्तुं यद्धितमपि राज्ञ प्रतिनिधिः सदा ।
बोधयेत्कारयेत्कुर्यान्न कुर्यान्न प्रबोधयेत् ॥ ८९ ॥
प्रतिनिधि का कार्य— प्रतिनिधि का यह कर्तव्य है कि वह सदा जो कार्य अहितकर भी है किन्तु जिस समय उसी को शीघ्रता के साथ करना उचित हो उसे राजा से कहे और करावे तथा स्वयं करे एवं जो हितकर भी कार्य है किन्तु जिस समय उसका करना अनुचित है, उसे न राजा से करने के लिये कहे और न करावे एवं स्वयं भी न करे।
सत्यं वा यदि वाऽसत्यं कार्यजातं च यत्किल ।
सर्वेषां राजकृत्येषु प्रधानस्तद्विचिन्तयेत् ॥ ९० ॥
प्रधान का कृत्य— प्रधान का कृत्य यह है कि वह सभी राजकार्यों में कौन २ कार्य सत्य हैं और कौन २ असत्य हैं इसका विचार करे।
गजानां च तथाऽश्वानां रथानां पदगामिनाम् ।
सुहृदानां तथोष्ट्राणां वृषाणां सद्य एव हि ॥ ९१ ॥
वाद्यभाषासु संकेतव्यूहाभ्यसनशालिनाम् ।
प्राक्प्रत्यग्गामिनां राज्यचिह्नशस्त्रास्त्रधारिणाम् ॥ ९२ ॥
परिचारगणानां हीनमध्योत्तमकर्मणाम् ।
अस्त्राणामस्त्रजातीनां संघः स्वतुरगीगणः ॥ ९३ ॥
कार्यक्षमश्च प्राचीनः साद्यस्कः कति विद्यते ।
कार्यासमर्थः कत्यस्ति शस्त्रगोलाग्निचूर्णयुक् ॥ ९४ ॥
सांग्रामिकश्च कत्यस्ति संभारस्तान्विचिन्त्य च ।
सचिवश्चापि तत्कार्यं राज्ञे सम्यग् निवेदयेत् ॥ ९५ ॥
सचिव के कृत्य— 'सचिव' का कृत्य यह है कि—हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सैनिक, सुहृद् ऊँट, विदेशी भाषाओं में संकेत और व्यूहरचना का सतत अभ्यास करनेवाले (अभिज्ञ), पूर्व तथा पश्चिम दिशा के देशों में जानेवाले, मध्यम तथा उत्तम श्रेणी के कार्य करनेवाले, राजचिह्न (झण्डा-निशान), शस्त्र तथा अस्त्र के धारण करनेवाले ऐसे परिचारकगण एवं अस्त्र तथा अस्त्रों के चलाने के नियमों को विचारकर उपर्युक्त इन सबों में तत्काल कितने हैं और उनकी क्या दशा है और कार्य में आने योग्य प्राचीन तथा नवीन घुड़सवार कितने हैं तथा कार्य में नहीं आने योग्य कितने हैं। शस्त्र, गोला, बारूद इन सबों से युक्त लड़ाई की सामग्री कितनी है ? इन सबों को विचार कर राजा से उक्त सभी कार्यों को यथार्थ रूप से लिखित निवेदन करे।
साम दानञ्च भेदश्च दण्डः केषु कदा कथम् ।
कर्तव्यः किं फलं तेभ्यो बहुमध्यं तथाऽल्पकम् ॥ ९६ ॥