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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

७० | शुक्रनीतिः

अकर्तुं यद्धितमपि राज्ञ प्रतिनिधिः सदा ।
बोधयेत्कारयेत्कुर्यान्न कुर्यान्न प्रबोधयेत् ॥ ८९ ॥

प्रतिनिधि का कार्य— प्रतिनिधि का यह कर्तव्य है कि वह सदा जो कार्य अहितकर भी है किन्तु जिस समय उसी को शीघ्रता के साथ करना उचित हो उसे राजा से कहे और करावे तथा स्वयं करे एवं जो हितकर भी कार्य है किन्तु जिस समय उसका करना अनुचित है, उसे न राजा से करने के लिये कहे और न करावे एवं स्वयं भी न करे।

सत्यं वा यदि वाऽसत्यं कार्यजातं च यत्किल ।
सर्वेषां राजकृत्येषु प्रधानस्तद्विचिन्तयेत् ॥ ९० ॥

प्रधान का कृत्य— प्रधान का कृत्य यह है कि वह सभी राजकार्यों में कौन २ कार्य सत्य हैं और कौन २ असत्य हैं इसका विचार करे।

गजानां च तथाऽश्वानां रथानां पदगामिनाम् ।
सुहृदानां तथोष्ट्राणां वृषाणां सद्य एव हि ॥ ९१ ॥
वाद्यभाषासु संकेतव्यूहाभ्यसनशालिनाम् ।
प्राक्प्रत्यग्गामिनां राज्यचिह्नशस्त्रास्त्रधारिणाम् ॥ ९२ ॥
परिचारगणानां हीनमध्योत्तमकर्मणाम् ।
अस्त्राणामस्त्रजातीनां संघः स्वतुरगीगणः ॥ ९३ ॥
कार्यक्षमश्च प्राचीनः साद्यस्कः कति विद्यते ।
कार्यासमर्थः कत्यस्ति शस्त्रगोलाग्निचूर्णयुक् ॥ ९४ ॥
सांग्रामिकश्च कत्यस्ति संभारस्तान्विचिन्त्य च ।
सचिवश्चापि तत्कार्यं राज्ञे सम्यग् निवेदयेत् ॥ ९५ ॥

सचिव के कृत्य— 'सचिव' का कृत्य यह है कि—हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सैनिक, सुहृद् ऊँट, विदेशी भाषाओं में संकेत और व्यूहरचना का सतत अभ्यास करनेवाले (अभिज्ञ), पूर्व तथा पश्चिम दिशा के देशों में जानेवाले, मध्यम तथा उत्तम श्रेणी के कार्य करनेवाले, राजचिह्न (झण्डा-निशान), शस्त्र तथा अस्त्र के धारण करनेवाले ऐसे परिचारकगण एवं अस्त्र तथा अस्त्रों के चलाने के नियमों को विचारकर उपर्युक्त इन सबों में तत्काल कितने हैं और उनकी क्या दशा है और कार्य में आने योग्य प्राचीन तथा नवीन घुड़सवार कितने हैं तथा कार्य में नहीं आने योग्य कितने हैं। शस्त्र, गोला, बारूद इन सबों से युक्त लड़ाई की सामग्री कितनी है ? इन सबों को विचार कर राजा से उक्त सभी कार्यों को यथार्थ रूप से लिखित निवेदन करे।

साम दानञ्च भेदश्च दण्डः केषु कदा कथम् ।
कर्तव्यः किं फलं तेभ्यो बहुमध्यं तथाऽल्पकम् ॥ ९६ ॥

द्वितीयोऽध्यायः ७१

एतत्संचिन्त्य निश्चित्य मन्त्री सर्वं निवेदयेत् ।
मन्त्री के कार्य— मन्त्री का कर्तव्य यह है कि—वह किन विषयों में कब, किस प्रकार से सन्धि, दान, भेद और विग्रह करना चाहिये एवं उससे क्या फल होगा ? और वह अधिक, मध्यम या अल्प होगा, इन सबों का विचार कर राजा से निवेदन करे ।

साक्षिभिर्लिखितैर्भोगैश्छलैर्भूतैश्च मानुषान् ॥ ९७ ॥
स्वानुत्पादितसंप्राप्तव्यवहारान्विचिन्त्य च ।
दिव्य-संसाधनाद्वापि केषु किं साधनं परम् ॥ ९८ ॥
युक्तिप्रत्यक्षानुमानोपमानैर्लोकशास्त्रतः ।
बहुसम्मतसंसिद्धान्विनिश्चित्य सभास्थितः ॥ ९९ ॥
ससभ्यः प्राड्विवाकस्तु नृपं सम्बोधयेत्सदा ।

प्राड्विवाक के कार्य— ‘प्राड्विवाक’ का कर्तव्य यह है कि—वह (विचारपति) सभा में स्थित हो, सभ्यों (जूरियों) के साथ मिलकर साक्षी (गवाह) एवं लेखक के द्वारा सत्य या छल से युक्त मनुष्यों को एवं अपनी इच्छा से पैदा किये हुये या यथार्थ रूप से उपस्थित किये गये विवादों को विचार कर उनमें से किसी का साक्षी या लेखक के अभाव में दिव्यसाधनों (अग्निपरीक्षा आदि) से एवं किसी का बहुत लोगों की सम्मति से तथा किसी में कौन प्रमाण उचित होगा इसका प्रत्यक्ष, अनुमान, दृष्टान्त तथा लोकशास्त्र से विचार कर जो निर्णय हो उसे राजा से सदा निवेदन करे ।

वर्तमानाश्च प्राचीना धर्माः के लोकसंश्रिताः ॥ १०० ॥
शास्त्रेषु के समुद्दिष्टा विरुध्यन्ते च केऽधुना ।
लोकशास्त्रविरुद्धाः के पण्डितस्तान्विचिन्त्य च ॥ १०१ ॥
नृपं संबोधयेत्तैश्च परत्रेह सुखप्रदैः ।

पण्डित के कार्य— पण्डित का कर्तव्य यह है कि—वह प्रजागण इस समय प्राचीन या नवीन में से किस धर्म का पालन कर रहे हैं और किस धर्म का शास्त्र में निर्दिष्ट होने पर भी आदर नहीं कर रहे हैं और कौन से उनके प्रचलित धर्म शास्त्र-विरुद्ध पड़ रहे हैं, इन सबों को विचार कर जो इस लोक तथा पर लोक में सुखप्रद धर्म हैं उन्हें राजा से निवेदन करे ।

इयच्च संचितं द्रव्यं वत्सरेऽस्मिंस्तृणादिकम् ॥ १०२ ॥
व्ययीभूतमियच्चैव शेषं स्थावरजंगमम् ।
इयदस्तीति वै राज्ञे सुमन्त्रो विनिवेदयेत् ॥ १०३ ॥

सुमन्त्र के कार्य— सुमन्त्र का कर्तव्य यह है कि—वह इस वर्ष में तृणादिक स्थायी तथा अस्थायी द्रव्य का इतना संचय हुआ या और उसमें से

७२ | शुक्रनीतिः

इतना व्यय हुआ और अब इतना बचा हुआ है। इसे राजा से निवेदन करे।

पुराणि च कति ग्रामा अरण्यानि च सन्ति हि ।
कर्षिता कति भूः केन प्राप्तो भागस्ततः कति ॥ १०४ ॥
भागशेषं स्थितं कस्मिन्कत्यकृष्टा च भूमिका ।
भागद्रव्यं वत्सरेऽस्मिञ्छुल्कदण्डादिजं कति ॥ १०५ ॥
अकृष्टपच्यं कति च कति चारण्यसंभवम् ।
कति चाकरसंजातं निधिप्राप्तं कतीति च ॥ १०६ ॥
अस्वामिकं कति प्राप्तं नाष्टिकं तस्कराहृतम् ।
संचितं तु विनिश्चित्यामात्यो राज्ञे निवेदयेत् ॥ १०७ ॥
समासाल्लक्षणं कृत्यं प्रधानदशकस्य च ।

अमात्य के कार्य— अमात्य का कर्त्तव्य यह है कि—वह—राज्य में कितने नगर, ग्राम या जंगल हैं ? किसने कितनी भूमि जोती है ? और उससे कितना उसने धान्य पाया ? किस क्षेत्र ( खेत ) में कितना भाग बचा है ? कितनी भूमि बिना जुती है ? और इस देश में प्रतिवर्ष शुल्क ( मालगुजारी ), और अपराधियों के दण्ड से ( जुर्माना ) आदि से प्राप्त भाग द्रव्य ( राजा के अंश का द्रव्य ) कितना है ? बिना जुती भूमि में होने वाला सस्यादि कितना है ? जंगल से मिलने वाला द्रव्य कितना है ? खान से निकलने वाला द्रव्य कितना है ? गली आदि में पड़ी हुई अतएव अज्ञात-स्वामी वाली वस्तु कितनी है ? बिना स्वामी ( लावारिस ) का द्रव्य कितना है, हरण किया हुआ द्रव्य कितना है ? और चोरों से दण्ड रूप में प्राप्त धन कितना है ? इन सबों की संख्या जोड़कर राजा से निवेदन करे। इस प्रकार से संक्षेप में पुरोहितादि प्रकृतियों का कृत्य कहा गया।

उक्तं तल्लिखितैः सर्वं विद्यात्तदनुदर्शिभिः ॥ १०८ ॥
परिवर्त्य नृपो ह्येतान्युञ्ज्यादन्योऽन्यकर्मणि ।

राजा के अन्योन्य के स्थान पर अन्योन्य की योजना का निर्देश— राजा पूर्वोक्त पुरोहितादिकों के लिये विहित कार्यों को जुबानी एवं उनके लेखों द्वारा जाने। और उन सबों को समय २ पर योग्यतानुसार एक दूसरे के पदों पर नियुक्त करता रहे। अर्थात् कभी सुमन्त्र को अमात्य पद पर एवं अमात्य को सुमन्त्र पद पर बदली करता रहे।

न कुर्यात्स्वाधिकबलान् कदापि ह्यधिकारिणः ॥ १०९ ॥
परस्परं समबलाः कार्याः प्रकृतयो दश ।

राज्य के उक्त अधिकारी पुरुषों को कभी अपने अधिकार से अधिक शक्ति

द्वितीयोऽध्यायः ७३

द्वितीयोऽध्यायः ७३

-प्रवर्द्धान न करने दे । और पूर्वोक्त १० प्रकृतियों को परस्पर समबल वाला बनाये रखे, किसी को उभरने न दे ।

एकस्मिन्नधिकारे तु पुरुषाणां त्रयं सदा ॥ ११० ॥
नियुञ्जीत प्राज्ञतमं मुख्यमेकन्तु तेषु वै ।
द्वौ दर्शकौ तु तत्कार्ये हायनैस्तन्निवर्तनम् ॥ १११ ॥
त्रिभिर्वा पञ्चभिर्वापि सप्तभिर्दशभिश्च वा ।
दृष्ट्वा तत्कार्यकौशल्ये तथा तं परिवर्तयेत् ॥ ११२ ॥

**अधिकार की व्यवस्था का निर्देश—**राजा एक अधिकार (पद) पर तीन पुरुषों की नियुक्ति करे और उनमें से जो एक अत्यन्त बुद्धिमान हो उसे मुख्य और शेष दो को दर्शक (सहायक) बनाये । और ३, ५, ७, और १० वर्षों पर उन दोनों के कार्य तथा निपुणता को देखकर तदनुसार परिवर्तन करे ।

नाधिकारं चिरं दद्याद्यस्मै कस्मै सदा नृपः ।
अधिकारे क्षमं दृष्ट्वा ह्यधिकारे नियोजयेत् ॥ ११३ ॥

**अधिकार-योग्य को अधिकार देने का निर्देश—**राजा सदा चाहे जो हो उसे किसी अधिकार (पद) पर ज्यादा दिन तक न रहने दे अधिकार के लिये समर्थ देखकर उसे किसी अधिकार पर रखे ।

अधिकारमदं पीत्वा को न मुह्येत्पुनश्चिरम् ।

अधिकाररूपी मद पीकर कौन नहीं प्रमत्त हो जाता है। अतः चिरकाल तक एक ही अधिकार पर न रहने दे ।

अतः कार्यक्षमं दृष्ट्वा कार्येऽन्ये तं नियोजयेत् ॥ ११४ ॥

अतः उस कर्मचारी को कार्य करने में समर्थ देखकर एक कार्य से दूसरे कार्य पर नियुक्त कर दे ।

तत्कार्ये कुशलं चान्यं तत्पदानुगतं खलु ।
नियोजयेद्वर्तने तु तदभावे तथा परम् ॥ ११५ ॥
तद्गुणो यदि तत्पुत्रस्तत्कार्ये तं नियोजयेत् ।

**योग्य अधिकारी के अभाव में अन्य की योजना का निर्देश—**और कार्य चलने के लिये उस पद पर स्थित (असिष्टण्ट) अन्य जन को जो उस कार्य के करने में कुशल हो—नियुक्त करे । उसके अभाव में दूसरे को नियुक्त करे । यदि कर्मचारी का पुत्र पिता के तुल्य कार्य करने वाला हो तो उसके कार्य पर उसी की नियुक्ति करे ।

यथा यथा श्रेष्ठपदे ह्यधिकारी यदा भवेत् ॥ ११६ ॥
अनुक्रमेण संयोज्यो ह्यन्ते तं प्रकृतिं नयेत् ।

जब कोई नया कर्मचारी जैसे २ अपने से श्रेष्ठ पद के योग्य होता जाय

७४ : शुक्रनीतिः

वैसे २ अनुक्रम से ( उत्तरोत्तर ) श्रेष्ठ पद पर उसे नियुक्त करे। अन्त में प्रधान पद पर नियुक्त करे।

अधिकारबलं दृष्ट्वा योजयेद्दर्शकान् बहून् ॥ ११७ ॥
अधिकारिणमेकं वा योजयेद्दर्शकैर्विना ।

अधिकार ( कार्य ) की गुरुता ( अधिकता ) समझ कर उसके अनुरूप बहुत से उस कार्य के देखने वाले नियुक्त करे। अथवा बिना दर्शकों के भी केवल एक ही अधिकारी की नियुक्ति करे।

ये चान्ये कर्मसचिवास्तान् सर्वान् विनियोजयेत् ॥ ११८ ॥
गजाश्वरथपादातपशूष्ट्रमृगपक्षिणाम् ।
सुवर्णरत्नरजतवस्त्राणामधिपान् पृथक् ॥ ११९ ॥
वित्तानामधिपं धान्याधिपं पाकाधिपं तथा ।
आरामाधिपतिं चैव सौधगेहाधिपं पृथक् ॥ १२० ॥
सम्भारपं देवतुष्टिपतिं दानपतिं सदा ।

अन्य कर्मों के सचिव की योजना का निर्देश— और जो उक्त दश प्रकृतियों ( प्रधानों ) से अन्य अधिकारी कार्य करने में समर्थ हों उन्हें योग्यतानुसार हाथी घोड़ा, रथ, पैदल सेना, पशु, ऊंट, मृग, पक्षी, सुवर्ण, रत्न, चांदी, वस्त्र इन सबों के पृथक् २ स्वामी ( अधिकारी ), एवं धनाध्यक्ष ( पाठान्तर वितानाद्यधिपम् = शामियाना आदि का स्वामी ), धान्याधिप, पाकशाला का अध्यक्ष, बगीचों का अध्यक्ष, राजोचित तथा साधारण गृहों का अध्यक्ष, देवसेवा ( मन्दिरादि ) का अध्यक्ष, सेनाध्यक्ष पद पर सदा नियुक्त करे।

साहसाधिपतिं चैव ग्रामनेतारमेव च ॥ १२१ ॥
भागहारं तृतीयं तु लेखकं च चतुर्थकम् ।
शुल्क्रमाहं पञ्चमं च प्रतिहारं तथैव च ॥ १२२ ॥
षट्कमेतन्नियोक्तव्यं ग्रामे ग्रामे पुरे पुरे ।

दण्डाधिपति आदि ६ की योजना का निर्देश— और साहसाध्यक्ष ( संग्राम आदि साहस कर्मों के अध्यक्ष ), ग्राम का अध्यक्ष, भागहार ( प्रजाओं से कर वसूल करने वाला ), लेखक, शुल्क ( व्यवसायादि पर लगे टैक्स ) को वसूल करने वाला, द्वारपाल इन ६ कर्मचारियों की प्रत्येक नगर और ग्राम में नियुक्ति करे।

तपस्विनो दानशीलाः श्रुतिस्मृतिविशारदाः ॥ १२३ ॥
पौराणिकाः शास्त्रविदो दैवज्ञा मान्त्रिकाश्च ये ।
आयुर्वेदविदः कर्मकाण्डज्ञास्तान्त्रिकाश्च ये ॥ १२४ ॥
ये चान्ये गुणिनः श्रेष्ठा बुद्धिमन्तो जितेन्द्रियाः ।

द्वितीयोऽध्यायः ७५

तान सर्वान् पोषयेद् भृत्या दानैर्मानैः सुपूजितान् ॥ १२५ ॥
हीयते चान्यथा राजा ह्यकीर्त्तिं चापि बिन्दति ।

**राजा को तपस्वी आदियों की रक्षा करने का निर्देश—**जो राज्य में तपस्या करने वाले, दानशील, वेद तथा स्मृतियों के ज्ञाता (वैदिक और स्मार्त्त), पुराण के जानने वाले, शास्त्रज्ञ, ज्योतिषी, मन्त्र-तन्त्रवेत्ता, वैद्य, कर्मकाण्ड के ज्ञाता, शैवादि धर्म शास्त्र-ज्ञाता, तथा इन से अन्य विषयों के ज्ञाता, श्रेष्ठ गुणी, बुद्धिमान या जितेन्द्रिय हों, उन सबों का मासिक या वार्षिक वृत्ति, समय २ पर दान तथा सम्मान द्वारा पूजित करते हुये भरण-पोषण करे। यदि राजा ऐसा न करे तो राज्य से च्युत हो जाता है तथा उसकी अपकीर्त्ति भी होती है।

बहुसाध्यानि कार्याणि तेषामप्यधिपांस्तथा ॥ १२६ ॥
तत्तत्कार्येषु कुशलाञ्ज्ञात्वा तांस्तु नियोजयेत् ।

बहुत व्यक्तियों द्वारा संपन्न होने वाले कार्यों को जानकर या उन कार्यों के करने में कुशल जो हों उन्हीं व्यक्तियों को समझ कर यथायोग्य उक्त कार्यों का अधिकारी बनावे।

अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम् ॥ १२७ ॥
अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः ।

**योजनाकर्त्ता की दुर्लभता—**कोई भी अक्षर ऐसा नहीं है जो मन्त्र से शून्य हो, तरु-गुल्म आदि का कोई भी मूल (जड़ी-बूटी) ऐसा नहीं है जो औषध न हो एवं कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है जो किसी कार्य के योग्य न हो किन्तु इन सबों को यथोचित रीति से कार्यों में लगाने वाला पुरुष ही दुर्लभ है।

प्रभद्रादिजातिभेदं गजानां च चिकित्सितम् ॥ १२८ ॥
शिक्षां व्याधिं पोषणं च तालुजिह्वानखैर्गुणान् ।
आरोहणं गतिं वेत्ति स योग्यो गजरक्षणे ॥ १२९ ॥
तथाविधाधोरणस्तु हस्तिहृदयहारकः ।

**गजाधिपति के एवं महावत के लक्षण—**जो पुरुष हाथियों के प्रभद्र आदि जाति-भेद को तथा उनकी चिकित्सा-विधि शिक्षा, व्याधि, पोषण करना तथा उनके तालु, जिह्वा और नख के द्वारा गुणों को एवं उन पर चढ़ने की तथा उनके चलाने की कला को जानने वाला हो उसे हाथियों की रक्षा करने में (गजाध्यक्ष) नियुक्त करे। क्योंकि उक्त गुणों से ही युक्त महावत हाथियों को वश में करने वाला होता है।

अश्वानां हृदयं वेत्ति जातिवर्णभ्रमैर्गुणान् ॥ १३० ॥

७६ | शुक्रनीतिः

गतिं शिक्षां चिकित्सां च सत्त्वं सारं रुजं तथा ।
हिताहितं पोषणं च मानं यानं दन्तो वयः ॥ १३१ ॥
शूरश्च व्यूहवित्प्राज्ञः कार्योऽश्वाधिपतिश्च सः ।

अश्वाधिपति के लक्षण— जो पुरुष घोड़ों के हृद्गत भावों को एवं जाति, रंग, रोमों की भौंरी के द्वारा उनके गुणों को तथा उनकी चाल, शिक्षा, चिकित्सा, सत्त्व (बल), सार (क्षमता), रोग, हिताहित (शुभ या अशुभ) फल, पालन, मान (ऊंचाई आदि), उन पर गमन करना, दाँतों से अवस्था को जानने वाला, शूर, व्यूह-रचना का जानने वाला, अत्यन्त बुद्धिमान हो उसे घोड़ों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।

एभिर्गुणैश्च संयुक्तो धुर्यान्युग्यांश्च वेत्ति यः ॥ १३२ ॥
रथस्य सारं गमनं भ्रमणं परिवर्तनम् ।
समापतत्सु शस्त्रास्त्रलक्ष्यसंधाननाशकः ॥ १३३ ॥
रथगत्या स रथपो ह्यसंयोगगुप्तिवित् ।

सारथि के लक्षण— जो पुरुष उक्त गुणों से युक्त होते हुये भी भार-वहन करने में समर्थ रथ में जोते जाने वाले घोड़ों को एवं रथकी दृढता आदि, चलाना, घुमाना, बदलना जानता है, और रथ की विशेष गति से शत्रुओं के द्वारा चलाये हुये शस्त्रास्त्रों के लक्ष्य को विफल बनाने वाला, तथा शत्रुओं के घोड़ों के साथ मुठभेड़ होने पर अपने घोड़ों को बचाने की कला जानने वाला हो उसे रथाध्यक्ष या सारथि बनाना चाहिये ।

सादिनश्च तथा कार्याः शूरा व्यूहविशारदाः ॥ १३४ ॥
वाजिगतिविदः प्राज्ञाः शस्त्रास्त्रैर्युद्धकोविदाः ।

घुड़सवार के लक्षण— और जो शूर, व्यूह-रचना में पण्डित, घोड़ों की चालों को जानने वाले, बुद्धिमान तथा शस्त्र तथा अस्त्र द्वारा युद्ध करने में कुशल हों उन्हें घुड़सवार बनाना चाहिये ।

चकितं रेचितं वल्गितकं धौरितमाप्लुतम् ॥ १३५ ॥
तुरं मंदं च कुटिलं सर्पणं परिवर्तनम् ।
एकादशास्कन्दितं च गतीरश्वस्य वेत्ति यः ॥ १३६ ॥
यथाबलं यथार्थं च शिक्षयेत्स च शिक्षकः ।

अश्वशिक्षक के लक्षण— जो चकित (चक्राकार में घुमाना), रेचित (गति विशेष), वल्गितक (बहुत ऊँची वस्तु को लाँघना), धौरित (गतिभेद), आप्लुत (मेंढक की भांति कूदना), तुर (तेज दौड़ना), मन्द (धीरे १ चलना), कुटिल (वक्रगति), सर्पण (सर्प की भांति टेढ़े-मेढ़े दौड़ना), परिवर्तन (पलटना), आस्कन्दित (शत्रुओं पर आक्रमण करना), इन ११ प्रकार

द्वितीयोऽध्यायः ७७

द्वितीयोऽध्यायः ७७

की घोड़ों की चालों को तथा घोड़े के सामर्थ्य के अनुसार उन्हें यथार्थ रूप से शिक्षा देना जानता है वह अश्वशिक्षक (घोड़ों को सिखानेवाला) के पद पर नियुक्त करने योग्य होता है।

वाजिसेवासु कुशलः पल्याणादिनियोगवित् ॥ १३७॥
दृढांगश्च तथा शूरः स कार्यो वाजिसेवकः।

**अश्वसेवक (साईस) के लक्षण—**जो घोड़ों की सेवा करने में कुशल, पल्याण (घोड़े की जीन) आदि लगाने की कला का जानने वाला, दृढ़ अङ्गों वाला तथा शूर होता है वह साईस बनाने योग्य है।

नीतिशास्त्रास्त्रव्यूहादिनतिविद्याविशारदाः ॥ १३८॥
अबाला मध्यवयसः शूरा दान्ता दृढांगकाः।
स्वधर्मनिरता नित्यं स्वामिभक्ता रिपुद्विषः ॥ १३९॥
शूद्रा वा क्षत्रिया वैश्या म्लेच्छाः संकरसम्भवाः।
सेनाधिपाः सैनिकाश्च कार्या राज्ञा जयार्थिना ॥ १४०॥

**सेनापति तथा सैनिकों के लक्षण—**जो नीति (कर्त्तव्य तथा अकर्त्तव्य जानने का) शास्त्र, शस्त्र तथा अस्त्र चलाना, व्यूह-रचना, नतिविद्या (शत्रुओं को नीचा दिखाना) इन सब विषयों में पण्डित, लड़कपन से रहित, तरुण, शूर, सैनिक-शिक्षा प्राप्त, दृढ़ अङ्गों वाले, अपने धर्म में निरत, नित्य स्वामी में भक्ति रखने वाले, एवं उनके शत्रुओं से द्वेष रखने वाले, शूद्र, क्षत्रिय, वैश्य, म्लेच्छ या सङ्कीर्ण जाति वाले हों उन्हें विजय चाहनेवाला राजा अपना सेनाध्यक्ष या सैनिक बनावे।

पञ्चानामथवा षण्णामधिपः पदगामिनाम्।
योग्यः स पत्तिपालः स्यात्त्रिंशतां गौल्मिकः स्मृतः ॥ १४१॥
शतानां तु शतानीकस्तथाऽनुशतिको वरः।
सेनानीर्लेखकश्चैते शतं प्रत्यधिपा इमे ॥ १४२॥
साहस्रिकस्तु संयोज्यस्तथा चायुतिको महान्।

**पत्ति (पैदल सेना) पाल आदिकों के अधिकार—**५ या ६ पैदल सिपाहियों का जो स्वामी होता है वह 'पत्तिपाल' ३० सिपाहियों का स्वामी 'गौल्मिक' १०० सिपाहियों का स्वामी 'शतानीक' कहलाता है, और श्रेष्ठ अनुशतक, सेनानी तथा लेखक ये सब सौ-सौ के ऊपर विशेष २ कार्यों के लिये अध्यक्ष बनाने चाहिए। और १००० सिपाहियों का स्वामी 'साहस्रिक' एवं १०००० सिपाहियों का स्वामी महान 'आयुतिक' बनाना चाहिये।

व्यूहाभ्यासं शिक्षयेद्यः सायंप्रातस्तु सैनिकान् ॥ १४३॥
जानाति स शतानीकः सुयोद्धुं युद्धभूमिकाम्।

७८ | शुक्रनीतिः

शतानीकादिकों के लक्षण—सायं-प्रातः सैनिकों को व्यूह-रचना का अभ्यास (कवायत या परेड) कराना और भली भांति युद्ध करने के लिये रणसज्जा (युद्ध योग्य सामग्री-वेषभूषा से सुसज्जित करना) का ज्ञान रखना, यह शतानीक का कर्त्तव्य है।

तथाविधोऽनुशतिकः शतानीकस्य साधकः ॥ १४४ ॥
जानाति युद्धसम्भारं कार्ययोग्यं च सैनिकम् ।

और जो इन्हीं गुणों से युक्त, शतानीक की सहायता करने वाला युद्धोपयोगी सामग्रियों का तथा कार्य योग्य सैनिकों का जानने वाला होता है वह 'अनुशतिक' कहलाता है। अर्थात् उक्त कार्यों का भार उसके ऊपर रहता है।

निदेशयति कार्याणि सेनानीर्यामिकांश्च सः ॥ १४५ ॥
परिवृत्तिं यामिकानां करोति स च पत्तिपः ।

जो प्रहरी (पहरा देने वाले) लोगों के लिये कार्य बताता है अर्थात् जिसके निर्देशानुसार सिपाही कार्य करते हैं वह (सेनानी) कहलाता है। और प्रहरी गणों का जो पहरा बदलता है वह 'पत्तिप' या 'पत्तिपाल' कहलाता है।

सावधानं यामिकानां विजानीयाच्च गुल्मपः ॥ १४६ ॥

जो प्रहरियों को अपने २ कामों में सतर्कता का निरीक्षण करता है वह 'गुल्मप' या 'गौल्मिक' कहलाता है।

सैनिकाः कति सन्त्येतैः कति प्राप्तं तु वेतनम् ।
प्राचीनाः के कुत्र गताश्चैतान्वेत्ति स लेखकः ॥ १४७ ॥
गजाश्वानां विंशतेश्चाधिपो नायकसंज्ञकः ।

जो सेना में कितने सैनिक हैं? और उन्होंने कितना वेतन पाया है? पुराने असमर्थ सैनिक कितने हैं? और कौन कहां २ गये हैं, इन सबों को जान कर लिखता है, वह 'लेखक' कहलाता है। और २० हाथियों एवं २० घोडों का अध्यक्ष 'नायक' कहलाता है।

उक्तसंज्ञान्स्वस्वचिह्नैर्लाञ्छितांश्च नियोजयेत् ॥ १४८ ॥

उपर्युक्त अधिकारियों को अपने २ चिह्नों से युक्त रहने का निर्देश—ऊपर जिनके नामों का निर्देश किया गया है उन पत्तिपाल आदियों को उनके जो २ चिह्न हों उन से युक्त करके कार्य करने का आदेश देना चाहिये।

अजाविगोमहिष्येणमृगाणामधिपाश्च ये ।
तद्वृद्धिपुष्टिकुशलास्तद्घासल्यानिपीडिताः ॥ १४९ ॥
तथाविधा गजोष्ट्रादेर्योध्यास्तत्सेवका अपि ।

बकरा, मेढ़ा, गौ, भैंस, एण (मृग विशेष), मृग, इनके जो अध्यक्ष हों

द्वितीयोऽध्यायः ७९

उन्हें उन (बकरा आदि) सब पशुओं की वृद्धि तथा पोषण करने में कुशल एवं उनके दुख से दुखी होने वाले होना चाहिये। इसी प्रकार से हाथी तथा ऊंट आदि के भी जो अध्यक्ष हों उन्हें भी हाथी, ऊँट आदि की सेवा करने वाला होना चाहिये। और ऐसे ही लोगों की नियुक्ति भी करनी चाहिये ।

युद्धप्रवृत्तिकुशलास्तित्तिरादेश्च पोषकाः ॥ १५० ॥
शुकादेः पाठकाः सम्यक्छ्येनादेः पातबोधकाः ।
तत्तद्हृदयविज्ञानकुशलाश्च सदा हि ते ॥ १५१ ॥

**तित्तिरादिपोषकों की योजना का निर्देश—**और इसी भांति युद्ध करने की प्रवृत्ति रखने वाले तीतर आदि पक्षियों का पालन करने वाले और सुग्गे आदि पक्षियों के भली भांति पढ़ाने वाले तथा बाज आदि पक्षियों के झपट्टा मारने की कला जानने वाले एवं उपर्युक्त पक्षियों के हृद्गत भावों के पहचानने में निपुण लोगों को सदा उन सबों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।

मानाकृतिप्रभावर्णजातिसाम्याच्च मौल्यवित् ।
रत्नानां स्वर्णरजतमुद्राणामधिपश्च सः ॥ १५२ ॥

**रत्नाध्यक्ष के लक्षण—**और रत्न, सुवर्ण, चाँदी, मुद्रा (सिक्का) के जो अध्यक्ष बनाये जांय, उन्हें रत्नादिकों के मान (तौल), आकार, चमक, रंग जाति और समानता को देखकर उनके मूल्य का जानकार होना चाहिये ।

दान्तस्तु सधनो यस्तु व्यवहारविशारदः ।
धनप्राणोऽतिकृपणः कोषाध्यक्षः स एव हि ॥ १५३ ॥

**कोषाध्यक्ष के लक्षण—**और जो विनम्र स्वभाव वाले, धनी तथा व्यवहार में चतुर, धन की प्राण के समान रक्षा करने वाले तथा अत्यन्त कृपण हों उन्हें 'कोषाध्यक्ष' पद पर नियुक्त करना चाहिये ।

देशभेदैर्जातिभेदैः स्थूलसूक्ष्मबलाबलं ।
कौशेयादेर्मानमूल्यवेत्ता वस्त्रस्य वस्त्रपः ॥ १५४ ॥

**वस्त्राधिपति के लक्षण—**और जो देश तथा जाति-सम्बन्धी विभिन्नता एवं मोटा, महीन, मजबूत, कमजोर जानकर परिमाण (तौल) और उचित मूल्य का निश्चय करनेवाला हो उसी को रेशमी आदि वस्त्रों का 'अध्यक्ष' बनाना चाहिये ।

कुटीकञ्चुकनेपथ्यमण्डपादेः परिक्रियाम् ।
प्रमाणतः सौधिकेन रञ्जनानि च वेत्ति यः ॥ १५५ ॥
तथा शय्यादिसन्धानं वितानादेर्नियोजनम् ।
वस्त्रादीनां च स प्रोक्तो वितानाद्यधिपः खलुः ॥ १५६ ॥

**वितानाद्यधिपके लक्षण—**जो वस्त्रों की कुटी (तम्बू), कञ्चुक (कवच

८०शुक्रनीतिः

या कुर्ता-कोट आदि ), नेपथ्य ( पर्दा आदि या वेष ), मण्डप ( वस्त्र निर्मित गृह आदि ) को नाप के अनुसार सीने तथा शय्या( विस्तार ) आदि बिछाना या सजाना, शामियाना आदि का ठीक से खड़ा करना और वस्त्रादियों को पहनाना भली भांति जानता हो उसे वितानादि का अध्यक्ष बनाना चाहिये।

जातिं तुलां च मूल्यं च सारं भोगं परिग्रहम् ।
संमार्जनं च धान्यानां विजानाति स धान्यपः ॥ १५७ ॥

**धान्यपति के लक्षण—**जो धान्यों की जाति, वजन, मूल्य, श्रेष्ठता, खाने का तरीका, पाने का उपाय, साफ करना इन सब विषयों को अच्छी तरह से जानता है, उसे 'धान्यप' धान्यों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।

धौताधौतविपाकज्ञो रससंयोगभेदवित् ।
क्रियासु कुशलो द्रव्यगुणवित्पाकनायकः ॥ १५८ ॥

**पाकाध्यक्ष के लक्षण—**जो पकाने का अन्न-धुला हुआ है या नहीं धुला हुआ है एवं परिपक्व हुआ है या नहीं इसका जानने वाला, तथा रसों ( कड़वा, कसैला, तीता, खट्टा, नमकीन, मीठा ) के संयोग से होने वाले भेदों का जान-कार है एवं पाकक्रिया ( रसोई बनाने ) में निपुण तथा द्रव्यों एवं उनके गुणों को जानने वाला हो उसे 'पाकनायक' ( रसोई बनाने वालों का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।

फलपुष्पवृद्धिहेतुं रोपणं शोधनं तथा ।
पादपानां यथाकालं कर्तुं भूमिजलादिना ॥ १५९ ॥
तद्भेषजं च संवेत्ति ह्यारामाधिपतिश्च सः ।

**आरामाधिपति के लक्षण—**जो वृक्षों को समयानुसार मिट्टी (खाद) तथा जल देने आदि से उनके पुष्प तथा फल के बढ़ाने के साधन ( उपाय ), लगाना, संस्कार करना, और रोग लग जाने पर औषध ( दूर करने का उपाय ) करना भली भांति जानता हो उसे 'आरामाधिपति' ( बगीचों का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।

प्रासादं परिखां दुर्गं प्राकारं प्रतिमां तथा ॥ १६० ॥
यन्त्राणि सेतुबन्धांश्च बापी कूपतडागकम् ।
तथा पुष्करिणीं कुण्डं जलाद्यूर्ध्वगतिक्रियाम् ॥ १६१ ॥
सुशिल्पशास्त्रतः सम्यक्सुरम्यं तु यथा भवेत् ।
कर्तुं जानाति यः सैव गृहाद्यधिपतिः स्मृतः ॥ १६२ ॥

**गृहाद्यधिपति के लक्षण—**जो सुन्दर शिल्प शास्त्र का ज्ञाता होने से तद-नुसार अत्यन्त सुन्दर जिस प्रकार से बन सके उस प्रकार से राजभवन, खाई, किला, परकोटा, मूर्ति, यन्त्र, पुल, बावड़ी, कूप, तालाब, पोखरी, कुण्ड, जल

द्वितीयोऽध्यायः ८१

को यन्त्रादि से ऊपर चढ़ाना, इन सबों को सुन्दर बनाने की क्रिया को जानता है उसी को गृहादियों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।

राजकार्योपयोग्यान् हि पदार्थान्वेत्ति तत्त्वतः ।
सञ्चिनोति यथाकाले सम्भाराधिप उच्यते ॥ १६३ ॥

जो यथार्थ रूप से राजा के कार्य में आने योग्य वस्तुओं को जानता है और उनका समयानुसार संग्रह करके रखता है वह 'सम्भाराधिप' पद के योग्य होता है ।

स्वधर्माचरणे दक्षो देवताराधने रतः ।
निःस्पृहः स च कर्तव्यो देवतुष्टिपत्तिः सदा ॥ १६४ ॥

**देवाध्यक्ष के लक्षण—**जो अपने धर्म के आचरण करने में चतुर, देवता की आराधना में निरत, स्वयं किसी वस्तु की इच्छा न रखनेवाला हो उसे 'देवपूजा का अध्यक्ष' अर्थात् पुजारियों के विभाग का स्वामी बनाना चाहिये ।

याचकं विमुखं नैव करोति नं च संग्रहम् ।
दानशीलश्च निर्लोभो गुणज्ञश्च निरालसः ॥ १६५ ॥
दयालुर्मृदुवाग्दान-पात्रविन्नति-तत्परः ।
नित्यमेभिर्गुणैर्युक्तो दानाध्यक्षः प्रकीर्तितः ॥ १६६ ॥

**दानाध्यक्ष के लक्षण—**जो याचकों को विमुख नहीं करता है और स्वयं संग्रह भी नहीं करता है एवं दानशील, लोभरहित, गुणज्ञ ( दूसरे के गुण को जानने वाला ), आलस्यरहित, दयालु, मधुरभाषी, दान देने योग्य व्यक्तियों को पहचानने वाला और विनम्र होता है वही व्यक्ति इन गुणों से सदा युक्त रहनेवाला होने से 'दानाध्यक्ष' पद के योग्य होता है ।

व्यवहारविदः प्राज्ञा वृत्तशीलगुणान्विताः ।
रिपौ मित्रे समा ये च धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥ १६७ ॥
निरालसा जितक्रोधकामलोभाः प्रियंवदाः ।
सभ्याः सभासदः कार्या वृद्धाः सर्वासु जातिषु ॥ १६८ ॥

**सभासद् के लक्षण—**जो लोक-व्यवहार को जाननेवाले, विद्वान, सदाचार तथा सौजन्यादि एवं दया-उदारता आदि सद्गुणों से युक्त, शत्रु तथा मित्र में समभाव रखनेवाले, धर्मज्ञ, सत्यवादी, आलस्यरहित, क्रोध, काम तथा लोभ को जीतनेवाले ऐसे सभी जातियों के जो वृद्ध लोग हैं, उन्हें सभा का सभ्य ( मेम्बर ) बनाना चाहिये ।

सर्वभूतात्मतुल्यो यो निःस्पृहोऽतिथिपूजकः ।
दानशीलश्च यो नित्यं स वै सत्राधिपः स्मृतः ॥ १६६ ॥

**सत्राधिप के लक्षण—**जो सम्पूर्ण प्राणियों के साथ अपने समान व्यवहार

६ शु०

८२ | शुक्रनीतिः

करनेवाला, निस्पृह, अतिथियों का संमान करनेवाला, नित्य दानशील हो, उसे 'सत्राधिप' ( यज्ञ-विभाग का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।

परोपकारनिरतः परमर्माप्रकाशकः । निर्मत्सरो गुणग्राही सद्भिद्यः स्यात् परीक्षकः ॥ १७० ॥

**परीक्षक के लक्षण—**जो परोपकार में निरत रहनेवाला, दूसरे के मर्म अर्थात् मर्म को विदीर्ण करनेवाले दोष को नहीं प्रकाशित करनेवाला, मत्सरता से शून्य ( दूसरे के शुभ में द्वेष न रखनेवाला ), गुणग्राही और जिस विषय की परीक्षा लेता हो उसको जाननेवाला हो उसे 'परीक्षक' ( परीक्षा लेनेवाला ) बनाना चाहिये ।

प्रजा नष्टा न हि भवेत्तथा दण्डविधायकः । नातिक्रूरो नातिमृदुः साहसाधिपतिश्च सः ॥ १७१ ॥

**साहसाधिप के लक्षण—**प्रजा जिससे नष्ट न हो जाय ऐसे दण्ड का विधान करनेवाला, अत्यन्त क्रूरता तथा मृदुता को नहीं करनेवाला जो होता है वही 'साहसाधिपति' ( चोर आदि का शासन करने के लिये अध्यक्ष फौजदारी ) पद के योग्य होता है ।

आधर्षकेभ्यश्चोरेभ्यो ह्यधिकारिगणात्तथा । प्रजासंरक्षणे दक्षो ग्रामपो मातृपितृवत् ॥ १७२ ॥

**ग्रामाधिप के लक्षण—**डाकू, चोर तथा राज्य के उच्छृङ्खल अधिकारी पुरुषों से माता-पिता की भांति जो अपनी प्रजा की रक्षा करने में निपुण होता है । वही 'ग्रामप' ( ग्रामपति ) पद के योग्य होता है ।

वृक्षान् संपुष्य यत्नेन फलं पुष्पं विचिन्वति । मालाकार इवात्यन्तं भागहारस्तथाविधः ॥ १७३ ॥

**कर वसूल करनेवाले के लक्षण—**जिस प्रकार से माली अत्यन्त यत्न से वृक्षों को बढ़ाकर उससे फल तथा पुष्प का संग्रह करता है उसी प्रकार से प्रजाओं से जो राजा का भाग ( कर = मालगुजारी ) ग्रहण करनेवाला हो वैसा 'भागहार' बनाना चाहिये ।

गणनाकुशलो यस्तु देशभाषाप्रभेदवित् । असन्दिग्धमगूढार्थं बिलिखेत्स च लेखकः ॥ १७४ ॥

**लेखक के लक्षण—**जो गणना ( गिनती ) करने में कुशल, देश की भाषाओं के भेदों को जाननेवाला, एवं सन्देहरहित तथा अर्थ समझने लायक स्पष्ट लिखनेवाला होता है, उसे 'लेखक' पद पर नियुक्त करना चाहिये ।

शस्त्रास्त्रकुशलो यस्तु दृढाङ्गश्च निरालसः । यथायोग्यं समाहूयात् प्रनम्रः प्रतिहारकः ॥ १७५ ॥

द्वितीयोऽध्यायः ८३

द्वारपाल के लक्षण—जो शस्त्र तथा अस्त्र चढ़ाने में निपुण, दृढ़ अङ्गों वाला, आलस्यरहित, एवं नम्रता के साथ योग्यतानुसार लोगों को पुकार कर राजा के पास ले जानेवाला हो उसे 'प्रतिहारक' (द्वारपाल) पद पर नियुक्त करना चाहिये।

यथा विक्रयिणां मूलधननाशो भवेन्नहि ।
तथा शुल्कं तु हरति शौल्किकः स उदाहृतः ॥ १७६ ॥

चुङ्गी लेनेवाले के लक्षण—बेचनेवालों का मूल धन में जिससे कमी न आये ऐसे शुल्क (चुङ्गी) को जो व्यापारियों से वसूल करनेवाला हो उसे 'शौल्किक' पद पर नियुक्त करे।

जपोपवास-नियम-कर्मध्यानरतः सदा ।
दान्तः क्षमो निःस्पृहश्च तपोनिष्ठः स उच्यते ॥ १७७ ॥

तपोनिष्ठ के लक्षण—जो सदा जप, उपवास, नियम (व्रतपालन), शास्त्रोक्त कर्म तथा ध्यान में रत रहनेवाला, इन्द्रियों का दमन करनेवाला, क्षमाशील, निःस्पृह रहनेवाला हो उसे 'तपोनिष्ठ' कहते हैं।

याचकेभ्यो ददात्यर्थं भार्यापुत्रादिकं त्वपि ।
न संगृह्णाति यत्किञ्चिद् दानशीलः स उच्यते ॥ १७८ ॥

दानशील के लक्षण—जो याचकों को मांगने पर अपना धन, स्त्री तथा पुत्रादि को भी दे डालता है और उस समय अपने पास कुछ नहीं बचाकर रख लेता है, वह 'दानशील' कहलाता है।

पठनं पाठनं तुक क्षमास्त्वभ्यासशालिनः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणानां श्रुतज्ञास्ते प्रकीर्तिताः ॥ १७९ ॥

श्रुतज्ञ के लक्षण—जो श्रुति (वेद), स्मृति तथा पुराणों का अध्ययन (पढ़ना) तथा अध्यापन (पढ़ाना) करने में समर्थ तथा उन सबों का नित्य अभ्यास करनेवाले हैं उन्हें (श्रुतज्ञ) कहते हैं।

साहित्यशास्त्रनिपुणः संगीतज्ञश्च सुस्वरः ।
सर्गादिपञ्चकज्ञाता स वै पौराणिकः स्मृतः ॥ १८० ॥

पौराणिक के लक्षण—जो साहित्य शास्त्र में निपुण, सङ्गीत का जाननेवाला, सुन्दर स्वरवाला एवं सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित इन पाँच विषयों का जाननेवाला हो वह 'पौराणिक' कहलाता है।

मीमांसातर्कवेदान्तशब्दशासनतत्परः ।
ऊङ्खान्बोधिधतुं शक्तस्तत्त्वतः शास्त्रविच्च सः ॥ १८१ ॥

शास्त्रविद् के लक्षण—जो मीमांसा, तर्क (न्याय), वेदान्त, शब्दशासन (व्याकरणादि शब्द शास्त्र) का जाननेवाला, उक्त विषयों में तर्क करने तथा

८४शुक्रनीतिः

यथार्थ रूप से उन्हें समझाने में समर्थ हो उसे 'शास्त्रविद्' कहते हैं ।

संहितां च तथा होरां गणितं वेत्ति तत्त्वतः ।
ज्योतिर्विच्च स विज्ञेयस्त्रिकालज्ञश्च यो भवेत् ॥ १८२ ॥

**ज्योतिर्विद् के लक्षण—**जो संहिता ( वाराही संहिता आदि ), होराशास्त्र ( पाराशर ), गणित ( ग्रहलाघवादि ) को यथार्थ रूप से जानता है एवं त्रिकालज्ञ ( भूत, भविष्य, वर्तमान का जानने वाला ) है वह 'ज्योतिर्विद्' कहलाता है ।

बीजानुपूर्व्या मन्त्राणां गुणान्दोषांश्च वेत्ति यः ।
मन्त्रानुष्ठानसम्पन्नो मान्त्रिकः सिद्धदैवतः ॥ १८३ ॥

**मान्त्रिक के लक्षण—**जो बीजों की आनुपूर्वी के साथ मन्त्रों के गुण तथा दोष को जानता है एवं मन्त्र का नित्य अनुष्ठान करने में लगा हुआ, देवता की सिद्धि प्राप्त करनेवाला होता है उसे 'मान्त्रिक' कहते हैं ।

हेतुलिङ्गौषधीभिर्यो व्याधीनां तत्त्वनिश्चयम् ।
साध्यासाध्यं विदित्वोपक्रमते स भिषक्स्मृतः ॥ १८४ ॥

**वैद्य के लक्षण—**जो हेतु ( कारण ), लिङ्ग ( लक्षण ) तथा औषध-ज्ञान द्वारा व्याधियों का यथार्थ निश्चय एवं साध्यता तथा असाध्यता जानकर चिकित्सा करता है उसे 'भिषक्' ( वैद्य ) कहते हैं ।

श्रुतिस्मृतीतरैर्मन्त्रानुष्ठानैर्देवतार्त्तनम् ।
कर्तुं हिततमं मत्वा यतते स च तान्त्रिकः ॥ १८५ ॥

**तान्त्रिक के लक्षण—**जो श्रुति तथा स्मृति से भिन्न पुराणादि में कहे हुए मन्त्रानुष्ठान द्वारा देवता का पूजन अत्यन्त हितकर समझकर उस पद्धति से यत्न करता है वह 'तान्त्रिक' कहलाता है ।

नपुंसकाः सत्यवाचो सुभूषाश्च प्रियंवदाः ।
सुकुलाश्च सुरूपाश्च योज्यास्त्वन्तःपुरे सदा ॥ १८६ ॥

**अन्तःपुर के योग्य पुरुष के लक्षण—**जो नपुंसक ( हिजड़े ), सत्य बोलने वाले, सुन्दर भूषण धारण करनेवाले, प्रियभाषी, अच्छे कुल में उत्पन्न तथा सुन्दर स्वरूपवाले हों, उन्हें सदा अन्तःपुर ( रनिवास ) के अन्दर में नियुक्त करे ।

अनन्याः स्वामिभक्ताश्च धर्मनिष्ठा दृढाङ्गकाः ।
अबाला मध्यवयसः सेवासु कुशलाः सदा ॥ १८७ ॥
सर्वं यद्यत्कार्यजातं नीचं वा कर्तुमुद्यताः ।
निदेशकारिणो राज्ञा कर्त्तव्याः परिचारकाः ॥ १८८ ॥

**परिचारक के लक्षण—**जो अनन्य भाव से स्वामी की भक्ति करनेवाले,

द्वितीयोऽध्यायः

द्वितीयोऽध्यायः ८५

धर्मनिष्ठ, दृढ अङ्गोंवाले, बाल्य अवस्था को पार किये हुये, तरुण, सदा सेवा करने में कुशल, जो कुछ कार्य स्वामी का उत्तम या चाहे मल-मूत्रादि उठाना आदि नीच भी कार्य हो उन सबों को करने के लिये उद्यत रहनेवाले एवं आज्ञानुसार कार्य करनेवाले हों ऐसे लोगों को राजा 'परिचारक' बनावे ।

शत्रुप्रजाभृत्यवृत्तं विज्ञातुं कुशलाश्च ये । ते गूढचाराः कर्त्तव्या यथार्थश्रुतबोधकाः ॥ १८६ ॥

जासूस के लक्षण—जो शत्रु तथा प्रजागण के व्यवहार को जानने के लिये कुशल एवं यथार्थ बातों को सुनकर उन्हें ठीक २ बताने वाले हों ऐसे लोगों को गूढचार ( जासूस ) पद पर नियुक्त करना चाहिये ।

राज्ञः समीपप्राप्तानां नतिस्थानविबोधकाः । दण्डधरा वेत्रधराः कर्त्तव्यास्ते सुशिक्षकाः ॥ १६० ॥

दण्डधारी-आसा-बल्लभधारी के लक्षण—जो राजा के समीप उपस्थित हुये लोगों को प्रणाम करने की रीति एवं बैठने के लिये स्थान को अच्छी तरह से बतानेवाले, विनय तथा शिक्षा जाननेवाले हों ऐसे लोगों को दण्ड तथा बेंत धारण करके राजा के समीप में रहने वाला बनाना चाहिये ।

तन्त्रीकण्ठोत्थितान् सप्तस्वरान् स्थानविभागशः । उत्पादयति संवेत्ति ससंयोगविभागिनः ॥ १६१ ॥ अनुरागं सुस्वरं च सतालं च प्रगायति । सन्नृत्यं वा गायकानामधिपः स च कीर्त्तितः ॥ १६२ ॥

गायकाधिप के लक्षण—जो वीणा या कण्ठ से निकले हुये स. रि. ग. म, प. ध. नि. इन ७ स्वरों को स्थान-विभाग के अनुसार यथार्थ रूप से पैदा करते हैं एवं संयोग तथा विभाग को साथ अर्थात् मिले हुये या अलग २ उन सबों को भलीभांति समझते हैं और जो राग, स्वर-ताल के साथ गाते या नाचते हैं ऐसे लोगों को गायकों ( गानेवालों ) का अधिपति बनाना चाहिये ।

तथाविधा च पण्यस्त्री निर्लज्जा भावसंयुता । शृङ्गाररसतन्त्रज्ञा सुन्दराङ्गी मनोरमा ॥ १६३ ॥ नवीनोत्तुङ्गकठिनकुचा सुस्मितदर्शिनी ।

वेश्या के लक्षण—और पूर्वोक्त रीति से गाने तथा नाचनेवाली, लज्जा न करनेवाली, भाव ( अनुराग ) से युक्त, शृङ्गार रस के तत्त्व को जाननेवाली, सुन्दर अङ्गों वाली, मनको आनन्दित करनेवाली, नवीन अवस्थावाली, ऊँचे, कठिन कुचोंवाली, सुन्दर स्मित ( मुसुकान ) के साथ देखने वाली ( कटाक्ष करनेवाली ) ऐसी जो वेश्या हो उसे राजा अपने यहां रखें ।

ये चान्ये साधकास्ते च तथा चित्तविरञ्जकाः ॥ १६४ ॥

८६ | शुक्रनीतिः

सुभृत्यास्तेपि सन्धार्या नृपेणात्महिताय च । वेश्या-भृत्य के लक्षण— और इसके अतिरिक्त अन्य वेश्याओं के भृत्य जो मनोऽभिलषित कार्य के करने में चतुर, चित्त को विशेष रूप से प्रसन्न करने वाले ऐसे अच्छे भृत्य हों उन्हें अपने हित के लिये राजा को रखना चाहिये ।

वैतालिकाः सुकवयो वेत्रदण्डधराश्च ये ॥ १६५ ॥ शिल्पज्ञाश्च कलावन्तो ये सदाप्युपकारकाः । दुर्गुणासूचका भाणा नर्तका बहुरूपिणः ॥ १६६ ॥ आरामकृत्रिमवनकारिणो दुर्गकारिणः । महानालिकयन्त्रस्थगोलैर्लक्ष्यविभेदिनः ॥ १९७ ॥ लघुयन्त्राग्नेयचूर्णबाणगोलासिकारिणः । अनेकयन्त्रशास्त्रास्त्रधनुस्तूणादिकारकाः ॥ १९८ ॥ स्वर्णरत्नाद्यलङ्कारघटका रथकारिणः । पाषाणघटका लोहकारा धातुविलेपकाः ॥ १९९ ॥ कुम्भकाराः शौल्विकाश्च तक्षाणो मार्गकारकाः । नापिता रजकाश्चैव वासिका मलहारकाः ॥ २०० ॥ वार्ताहराः सौचिकाश्च राजचिह्नाग्रधारिणः । भेरीपटहगोपुच्छ-शंखवेणवादिभिःस्वनैः ॥ २०१ ॥ ये व्यूहरचका यानव्यपथानादिबोधकाः । नाविकाः खनका व्याधाः किराता मारिका अपि ॥ २०२ ॥ शस्त्रसंमार्जनकरा जलधान्यप्रवाहकाः । आपणिकाश्च गणिका वाद्यजायाप्रजीविनः ॥ २०३ ॥ तन्तुवायाः शाकुनिकाश्चित्रकाराश्च चर्मकाः । गृहसंमार्जकाः पात्रधान्यवस्त्रप्रमार्जकाः ॥ २०४ ॥ शय्यावितानास्तरण-कारकाः शासका अपि । आमोदास्वेदसद्धूपकारास्ताम्बूलिकास्तथा ॥ २०५ ॥ हीनाल्पकर्माणश्चैते योज्याः कार्यानुरूपतः ।

वैतालिक तथा शिल्पशों को पास में रखने का निर्देश— और जो वैतालिक (राजा की स्तुति करके जगानेवाले), सुकवि, वेत या दण्ड धारण करनेवाले (रक्षक विशेष), शिल्प कला के पण्डित, कलाओं (६४ प्रकार की कामविद्या) में कुशल, सदा हित करनेवाले, दूसरों के दोषों की सूचना देनेवाले, भाण (परिहास के पण्डित), बहुरूपिया, बगीचा तथा बनावटी जंगल बनाने में कुशल, दुर्ग (किला) बनानेवाले, महानालिक यन्त्रों (बड़ी तोपों) के अन्दर रखे हुवे गोलों से शत्रुओं पर लक्ष्य-भेद (निशाना) करनेवाले (गोलन्दाज), लघु

द्वितीयोऽध्यायः ८७

यन्त्र ( बन्दूक आदि ), आग्नेय चूर्ण ( बारूद ), बाण, गोला और तलवार आदि के एवं अनेक प्रकार के युद्धोपयोगी यन्त्र, शस्त्र, अस्त्र, धनुष, तूणीर ( तर्कश ) आदि के बनानेवाले कारीगर, सोना, रत्न आदि के अलङ्कारों को बनानेवाले, रथ बनानेवाले पत्थरों को गढ़ने वाले ( सङ्गतराश ), लुहार, गेरू आदि धातुओं से गृहादि को रंगनेवाले ( रंगसाज ), कुम्हार, शौल्बिक ( ताम्बे के वर्त्तन बनानेवाले ), बढ़ई, सड़क बनानेवाले, नाई, धोबी, वासिक ( लकड़हारा ), मेहतर, संवाद पहुँचानेवाले, दर्जी, राज-चिह्न ( छत्र-चामर—निशान ) लेकर राजा के आगे रहनेवाले, व्यूह-रचना करनेवाले एवं भेरी ( नगारा ), पटह ( ढोल ), गोपुच्छ ( रणसिंघा ), शङ्ख, वंशी आदि को बजाकर यान ( शत्रुओं के ऊपर चढ़ाई करना ) और व्यपयान ( शत्रुओं से पीछे हटना ) आदि ( आक्रमण करना ) समयों में सैनिकों को सूचना देनेवाले, नाविक ( मल्लाह ), खनक ( खननेवाले ), व्याध ( शिकार खेलनेवाले या बहेलिया ), किरात ( कोल-भिल्लादि ), बोझा ढोनेवाले, शस्त्रों को साफ करनेवाले ( सान चढ़ाकर तीक्ष्ण करनेवाले ), जल तथा धान्य को ढोनेवाले, आपणिक ( व्यापार करनेवाले ), परदेशी स्त्री-विहीन कर्मचारियों के काम-शान्त्यर्थं वेश्यायें, बाजा बजाते हुये स्त्रियों के साथ नाच कर जीविका चलानेवाले, जुलाहे, पक्षी बढ़ाकर जीविका रखनेवाले, चित्रकार, चर्मकार ( मोची ), झाडू देनेवाले, वर्त्तन, धान्य, वस्त्र इनको सफा करनेवाले, शय्या, वितान ( चंदोवा ), बिछौना आदि के बनाने और उसको लगाने की कला को करनेवाले, चित्त को प्रसन्न करनेवाले ( सुगन्धित ) एवं पसीना न लाने वाले अच्छे धूपों को बनानेवाले, ताम्बूल ( पान का बीड़ा ) लगानेवाले, तथा अन्यान्य हीन तथा क्षुद्र राजसंबन्धी कार्य करने वाले इन सबों को कार्य के अनुरूप यथायोग्य राजा अपने यहाँ रक्खे ।

प्रोक्तं पुण्यतमं सत्यं परोपकरणं तथा ॥ २०६ ॥ आज्ञायुक्तांश्च भृतकान्सततं धारयेन्नृपः ।

सत्य तथा परोपकार की श्रेष्ठता तथा इनसे युक्त राजकर्मचारी रखने का निर्देश— सत्य तथा परोपकार को सब पुण्यों में श्रेष्ठ बताया है अतः इनसे युक्त आज्ञानुसार सच्चाई के साथ राज-कार्य करनेवाले भृत्यों को राजा अपने यहाँ सदा रक्खे ।

हिंसा गरीयसी सर्वपापेभ्योऽनृतभाषणम् ॥ २०७ ॥ गरीयस्तरमेताभ्यां युक्तान्भृत्यान्न धारयेत् ।

संपूर्ण पापों से हिंसा तथा असत्य की प्रबलता तथा इनसे युक्त भृत्यों को

८८ शुक्रनीतिः

न रखने का निर्देश—और सब पापों से बढ़कर हिंसा (हत्या या कष्ट पहुंचाना) और झूठ बोलना है अतः इन दोनों से युक्त भृत्यों को न रखे । यदा यदुचितं कर्तुं वक्तुं वा तत्प्रबोधयन् ॥ २०८ ॥ तद्भक्ति कुरुते द्राक्तु स सद्भृत्यः सुपूज्यते । सद्भृत्य के लक्षण—जिस समय जो कार्य करने के लिये एवं जो बात बोलने के लिये उचित प्रतीत हो उसी को राजा से समझाता हुआ और स्वयं भी शीघ्रता से उसी बात को कहता एवं उसी कार्य को करता भी है वही भृत्य अच्छा कहलाता है और भली भांति पूजित भी होता है । उत्थाय पश्चिमे यामे गृहकृत्यं विचिन्त्य च ॥ २०९ ॥ कृत्वोत्सर्गं तु विष्णुं हि स्मृत्वा स्नायादनन्तरम् । प्रातः कृत्यं तु निर्वर्त्य यावत्सार्धमुहूर्त्तकम् ॥ २१० ॥ गत्वा स्वकार्यशालां वा कार्याकार्यं विचिन्त्य च । अच्छे भृत्यों का यह कृत्य है कि—वह रात्रि को पिछले प्रहर में उठकर गृह के ( उस दिन करने लायक ) कृत्यों का विचार करने के बाद मल-मूत्रादि का परित्याग कर विष्णु ( परमात्मा ) का स्मरण करते हुये स्नान करे । अथवा १।। मुहूर्त ( करीब १॥ घण्टे ) के अन्दर प्रातःकालीन नित्य के सम्पूर्ण कार्यों को समाप्त कर अपने कार्यालय में जाकर वहां के कर्त्तव्य या अकर्त्तव्य कार्यों का निश्चय कर तदुपरान्त स्नान करे । विनाऽऽज्ञया विशन्तं तु द्वास्थः सम्यङ् निरोधयेत् ॥ २११ ॥ निर्देशकार्यं विज्ञाप्य तेनाज्ञप्तः प्रमोचयेत् । द्वारपाल के कर्त्तव्यों का निर्देश—और द्वारपाल का यह कर्त्तव्य है कि वह द्वार पर रहकर बिना राजाज्ञा के अन्दर प्रवेश करनेवाले को अच्छी तरह से रोके । और उसके बताये हुये कार्य की सूचना राजा को देकर यदि राजा की आज्ञा अन्दर आने देने के लिये हो तो उसे अन्दर जाने के लिये छोड़ दे । दृष्ट्वागतान्सभामध्ये राज्ञे दण्डधरः क्रमात् ॥ २१२ ॥ निवेद्य तन्नतीः पश्चात्तेषां स्थानानि सूचयेत् । राजपार्श्ववर्त्ती दण्डधारियों का कर्त्तव्य—और राजा के पास दण्ड धारण करनेवाले भृत्यों का यह कर्त्तव्य है कि—वह राजसभा में आये हुये लोगों को देखकर क्रम से राजा से उसके प्रणाम करने की सूचना देकर पश्चात् उससे बैठने के लिये स्थान का निर्देश करे । ततो राजगृहं गत्वाऽऽज्ञप्तो गच्छेच्च सन्निधिम् ॥ २१३ ॥ मत्वा नृपं यथान्यायं विष्णुरूपमिवापरम् । प्रविश्य सानुरागस्य चित्तज्ञस्य समन्ततः ॥ २१४ ॥

द्वितीयोऽध्यायः [८१]

भर्तुरर्द्धासने दृष्टिं कृत्वा नान्यत्र निक्षिपेत् ।

**भृत्य का राजसमीपावस्थान करने पर कर्त्तव्य—**उसके (स्थान बताने के) बाद पुनः राजगृह (राजसभा) में जाकर राजा की आज्ञा पाने पर उसके समीप जावे । और जगत् के रक्षार्थ दूसरे विष्णु भगवान के समान स्थित राजा को नियमानुकूल प्रणाम करे और राजसभा में पहुँचकर भृत्यों के प्रति अनुराग रखनेवाले एवं उनके हृदय को पहचाननेवाले राजा के अर्द्धासन की ओर स्थिर-दृष्टि होकर देखता रहे और किसी अन्य तरफ दृष्टि न दौड़ावे ।

अग्निं दीप्तमिवासीदेद्राजानमुपशिक्षितः ॥ २१५ ॥
आशीविषमिव क्रुद्धं प्रभुं प्राणधनेश्वरम् ।
जलती हुई अग्नि के समान एवं क्रुद्ध विषधर सर्प की भांति प्राण तथा धन लेने में समर्थ राजा को समझ कर अत्यन्त विनय के साथ उसके समीप जावे ।

यत्नेनोपचरेन्नित्यं नाहमस्मीति चिन्तयेत् ॥ २१६ ॥
समर्थयंश्च तत्पक्षं साधु भाषेत भाषितम् ।
तन्नियोगेन वा ब्रूयादर्थं सुपरिनिश्चितम् ॥ २१७ ॥
**राजा के पक्ष की पुष्टि करने का निर्देश—**और नित्य यत्न के साथ राजा की सेवा करे और 'राजा के आगे मेरी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है' ऐसा सोचे एवं राजा के पक्ष का ही समर्थन करता हुआ सन्तोषजनक बात कहे । अथवा राजा की आज्ञा पाने पर लोक-शास्त्र से सुनिश्चित बात कहे ।

सुखप्रबन्धगोष्ठीषु विवादे वादिनां मतम् ।
विजानन्नपि नो ब्रूयाद्भर्तुः क्षिप्तोत्तरं वचः ॥ २१८ ॥
**राजाज्ञा से विवादियों के मत को युक्ति से बोलने का निर्देश—**मनोविनोदार्थ प्रस्तुत राजगोष्ठी में परस्पर तर्क करनेवालों के विवाद उपस्थित होने पर सिद्धान्त बात को जानते हुये भी वादी रूप में बोलनेवाले राजा के उत्तर को काटकर कोई वचन न बोले ।

सदाऽनुद्धतवेषः स्यान्नृपाहूतस्तु प्राञ्जलिः ।
तद्वां कृतनतिः श्रुत्वा वस्त्रान्तरितसम्मुखः ॥ २१९ ॥
तदाज्ञां धारयित्वादौ स्वकर्माणि निवेदयेत् ।
नत्वाऽऽसीतासने प्रह्वो न तत्पार्श्वे न संमुखे ॥ २२० ॥
उच्चैः प्रहसनं कासं ष्ठीवनं कुत्सनं तथा ।
जृम्भणं गात्रभङ्गं च पर्वास्फोटं च वर्जयेत् ॥ २२१ ॥
**राजा से स्वकार्य निवेदन-प्रकार तथा जोर से हँसने आदि का निषेध—**राजा के बुलाने पर सदा विनीत के समान वेष बनाये हुये हाथ जोड़े और