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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 526 में से

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पृष्ठ 166
८०शुक्रनीतिः

या कुर्ता-कोट आदि ), नेपथ्य ( पर्दा आदि या वेष ), मण्डप ( वस्त्र निर्मित गृह आदि ) को नाप के अनुसार सीने तथा शय्या( विस्तार ) आदि बिछाना या सजाना, शामियाना आदि का ठीक से खड़ा करना और वस्त्रादियों को पहनाना भली भांति जानता हो उसे वितानादि का अध्यक्ष बनाना चाहिये।

जातिं तुलां च मूल्यं च सारं भोगं परिग्रहम् ।
संमार्जनं च धान्यानां विजानाति स धान्यपः ॥ १५७ ॥

**धान्यपति के लक्षण—**जो धान्यों की जाति, वजन, मूल्य, श्रेष्ठता, खाने का तरीका, पाने का उपाय, साफ करना इन सब विषयों को अच्छी तरह से जानता है, उसे 'धान्यप' धान्यों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।

धौताधौतविपाकज्ञो रससंयोगभेदवित् ।
क्रियासु कुशलो द्रव्यगुणवित्पाकनायकः ॥ १५८ ॥

**पाकाध्यक्ष के लक्षण—**जो पकाने का अन्न-धुला हुआ है या नहीं धुला हुआ है एवं परिपक्व हुआ है या नहीं इसका जानने वाला, तथा रसों ( कड़वा, कसैला, तीता, खट्टा, नमकीन, मीठा ) के संयोग से होने वाले भेदों का जान-कार है एवं पाकक्रिया ( रसोई बनाने ) में निपुण तथा द्रव्यों एवं उनके गुणों को जानने वाला हो उसे 'पाकनायक' ( रसोई बनाने वालों का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।

फलपुष्पवृद्धिहेतुं रोपणं शोधनं तथा ।
पादपानां यथाकालं कर्तुं भूमिजलादिना ॥ १५९ ॥
तद्भेषजं च संवेत्ति ह्यारामाधिपतिश्च सः ।

**आरामाधिपति के लक्षण—**जो वृक्षों को समयानुसार मिट्टी (खाद) तथा जल देने आदि से उनके पुष्प तथा फल के बढ़ाने के साधन ( उपाय ), लगाना, संस्कार करना, और रोग लग जाने पर औषध ( दूर करने का उपाय ) करना भली भांति जानता हो उसे 'आरामाधिपति' ( बगीचों का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।

प्रासादं परिखां दुर्गं प्राकारं प्रतिमां तथा ॥ १६० ॥
यन्त्राणि सेतुबन्धांश्च बापी कूपतडागकम् ।
तथा पुष्करिणीं कुण्डं जलाद्यूर्ध्वगतिक्रियाम् ॥ १६१ ॥
सुशिल्पशास्त्रतः सम्यक्सुरम्यं तु यथा भवेत् ।
कर्तुं जानाति यः सैव गृहाद्यधिपतिः स्मृतः ॥ १६२ ॥

**गृहाद्यधिपति के लक्षण—**जो सुन्दर शिल्प शास्त्र का ज्ञाता होने से तद-नुसार अत्यन्त सुन्दर जिस प्रकार से बन सके उस प्रकार से राजभवन, खाई, किला, परकोटा, मूर्ति, यन्त्र, पुल, बावड़ी, कूप, तालाब, पोखरी, कुण्ड, जल

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