शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
| ८० | शुक्रनीतिः |
|---|
या कुर्ता-कोट आदि ), नेपथ्य ( पर्दा आदि या वेष ), मण्डप ( वस्त्र निर्मित गृह आदि ) को नाप के अनुसार सीने तथा शय्या( विस्तार ) आदि बिछाना या सजाना, शामियाना आदि का ठीक से खड़ा करना और वस्त्रादियों को पहनाना भली भांति जानता हो उसे वितानादि का अध्यक्ष बनाना चाहिये।
जातिं तुलां च मूल्यं च सारं भोगं परिग्रहम् ।
संमार्जनं च धान्यानां विजानाति स धान्यपः ॥ १५७ ॥
**धान्यपति के लक्षण—**जो धान्यों की जाति, वजन, मूल्य, श्रेष्ठता, खाने का तरीका, पाने का उपाय, साफ करना इन सब विषयों को अच्छी तरह से जानता है, उसे 'धान्यप' धान्यों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।
धौताधौतविपाकज्ञो रससंयोगभेदवित् ।
क्रियासु कुशलो द्रव्यगुणवित्पाकनायकः ॥ १५८ ॥
**पाकाध्यक्ष के लक्षण—**जो पकाने का अन्न-धुला हुआ है या नहीं धुला हुआ है एवं परिपक्व हुआ है या नहीं इसका जानने वाला, तथा रसों ( कड़वा, कसैला, तीता, खट्टा, नमकीन, मीठा ) के संयोग से होने वाले भेदों का जान-कार है एवं पाकक्रिया ( रसोई बनाने ) में निपुण तथा द्रव्यों एवं उनके गुणों को जानने वाला हो उसे 'पाकनायक' ( रसोई बनाने वालों का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।
फलपुष्पवृद्धिहेतुं रोपणं शोधनं तथा ।
पादपानां यथाकालं कर्तुं भूमिजलादिना ॥ १५९ ॥
तद्भेषजं च संवेत्ति ह्यारामाधिपतिश्च सः ।
**आरामाधिपति के लक्षण—**जो वृक्षों को समयानुसार मिट्टी (खाद) तथा जल देने आदि से उनके पुष्प तथा फल के बढ़ाने के साधन ( उपाय ), लगाना, संस्कार करना, और रोग लग जाने पर औषध ( दूर करने का उपाय ) करना भली भांति जानता हो उसे 'आरामाधिपति' ( बगीचों का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।
प्रासादं परिखां दुर्गं प्राकारं प्रतिमां तथा ॥ १६० ॥
यन्त्राणि सेतुबन्धांश्च बापी कूपतडागकम् ।
तथा पुष्करिणीं कुण्डं जलाद्यूर्ध्वगतिक्रियाम् ॥ १६१ ॥
सुशिल्पशास्त्रतः सम्यक्सुरम्यं तु यथा भवेत् ।
कर्तुं जानाति यः सैव गृहाद्यधिपतिः स्मृतः ॥ १६२ ॥
**गृहाद्यधिपति के लक्षण—**जो सुन्दर शिल्प शास्त्र का ज्ञाता होने से तद-नुसार अत्यन्त सुन्दर जिस प्रकार से बन सके उस प्रकार से राजभवन, खाई, किला, परकोटा, मूर्ति, यन्त्र, पुल, बावड़ी, कूप, तालाब, पोखरी, कुण्ड, जल
द्वितीयोऽध्यायः ८१
को यन्त्रादि से ऊपर चढ़ाना, इन सबों को सुन्दर बनाने की क्रिया को जानता है उसी को गृहादियों का अध्यक्ष बनाना चाहिये ।
राजकार्योपयोग्यान् हि पदार्थान्वेत्ति तत्त्वतः ।
सञ्चिनोति यथाकाले सम्भाराधिप उच्यते ॥ १६३ ॥
जो यथार्थ रूप से राजा के कार्य में आने योग्य वस्तुओं को जानता है और उनका समयानुसार संग्रह करके रखता है वह 'सम्भाराधिप' पद के योग्य होता है ।
स्वधर्माचरणे दक्षो देवताराधने रतः ।
निःस्पृहः स च कर्तव्यो देवतुष्टिपत्तिः सदा ॥ १६४ ॥
**देवाध्यक्ष के लक्षण—**जो अपने धर्म के आचरण करने में चतुर, देवता की आराधना में निरत, स्वयं किसी वस्तु की इच्छा न रखनेवाला हो उसे 'देवपूजा का अध्यक्ष' अर्थात् पुजारियों के विभाग का स्वामी बनाना चाहिये ।
याचकं विमुखं नैव करोति नं च संग्रहम् ।
दानशीलश्च निर्लोभो गुणज्ञश्च निरालसः ॥ १६५ ॥
दयालुर्मृदुवाग्दान-पात्रविन्नति-तत्परः ।
नित्यमेभिर्गुणैर्युक्तो दानाध्यक्षः प्रकीर्तितः ॥ १६६ ॥
**दानाध्यक्ष के लक्षण—**जो याचकों को विमुख नहीं करता है और स्वयं संग्रह भी नहीं करता है एवं दानशील, लोभरहित, गुणज्ञ ( दूसरे के गुण को जानने वाला ), आलस्यरहित, दयालु, मधुरभाषी, दान देने योग्य व्यक्तियों को पहचानने वाला और विनम्र होता है वही व्यक्ति इन गुणों से सदा युक्त रहनेवाला होने से 'दानाध्यक्ष' पद के योग्य होता है ।
व्यवहारविदः प्राज्ञा वृत्तशीलगुणान्विताः ।
रिपौ मित्रे समा ये च धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥ १६७ ॥
निरालसा जितक्रोधकामलोभाः प्रियंवदाः ।
सभ्याः सभासदः कार्या वृद्धाः सर्वासु जातिषु ॥ १६८ ॥
**सभासद् के लक्षण—**जो लोक-व्यवहार को जाननेवाले, विद्वान, सदाचार तथा सौजन्यादि एवं दया-उदारता आदि सद्गुणों से युक्त, शत्रु तथा मित्र में समभाव रखनेवाले, धर्मज्ञ, सत्यवादी, आलस्यरहित, क्रोध, काम तथा लोभ को जीतनेवाले ऐसे सभी जातियों के जो वृद्ध लोग हैं, उन्हें सभा का सभ्य ( मेम्बर ) बनाना चाहिये ।
सर्वभूतात्मतुल्यो यो निःस्पृहोऽतिथिपूजकः ।
दानशीलश्च यो नित्यं स वै सत्राधिपः स्मृतः ॥ १६६ ॥
**सत्राधिप के लक्षण—**जो सम्पूर्ण प्राणियों के साथ अपने समान व्यवहार
६ शु०
८२ | शुक्रनीतिः
करनेवाला, निस्पृह, अतिथियों का संमान करनेवाला, नित्य दानशील हो, उसे 'सत्राधिप' ( यज्ञ-विभाग का अध्यक्ष ) बनाना चाहिये ।
परोपकारनिरतः परमर्माप्रकाशकः । निर्मत्सरो गुणग्राही सद्भिद्यः स्यात् परीक्षकः ॥ १७० ॥
**परीक्षक के लक्षण—**जो परोपकार में निरत रहनेवाला, दूसरे के मर्म अर्थात् मर्म को विदीर्ण करनेवाले दोष को नहीं प्रकाशित करनेवाला, मत्सरता से शून्य ( दूसरे के शुभ में द्वेष न रखनेवाला ), गुणग्राही और जिस विषय की परीक्षा लेता हो उसको जाननेवाला हो उसे 'परीक्षक' ( परीक्षा लेनेवाला ) बनाना चाहिये ।
प्रजा नष्टा न हि भवेत्तथा दण्डविधायकः । नातिक्रूरो नातिमृदुः साहसाधिपतिश्च सः ॥ १७१ ॥
**साहसाधिप के लक्षण—**प्रजा जिससे नष्ट न हो जाय ऐसे दण्ड का विधान करनेवाला, अत्यन्त क्रूरता तथा मृदुता को नहीं करनेवाला जो होता है वही 'साहसाधिपति' ( चोर आदि का शासन करने के लिये अध्यक्ष फौजदारी ) पद के योग्य होता है ।
आधर्षकेभ्यश्चोरेभ्यो ह्यधिकारिगणात्तथा । प्रजासंरक्षणे दक्षो ग्रामपो मातृपितृवत् ॥ १७२ ॥
**ग्रामाधिप के लक्षण—**डाकू, चोर तथा राज्य के उच्छृङ्खल अधिकारी पुरुषों से माता-पिता की भांति जो अपनी प्रजा की रक्षा करने में निपुण होता है । वही 'ग्रामप' ( ग्रामपति ) पद के योग्य होता है ।
वृक्षान् संपुष्य यत्नेन फलं पुष्पं विचिन्वति । मालाकार इवात्यन्तं भागहारस्तथाविधः ॥ १७३ ॥
**कर वसूल करनेवाले के लक्षण—**जिस प्रकार से माली अत्यन्त यत्न से वृक्षों को बढ़ाकर उससे फल तथा पुष्प का संग्रह करता है उसी प्रकार से प्रजाओं से जो राजा का भाग ( कर = मालगुजारी ) ग्रहण करनेवाला हो वैसा 'भागहार' बनाना चाहिये ।
गणनाकुशलो यस्तु देशभाषाप्रभेदवित् । असन्दिग्धमगूढार्थं बिलिखेत्स च लेखकः ॥ १७४ ॥
**लेखक के लक्षण—**जो गणना ( गिनती ) करने में कुशल, देश की भाषाओं के भेदों को जाननेवाला, एवं सन्देहरहित तथा अर्थ समझने लायक स्पष्ट लिखनेवाला होता है, उसे 'लेखक' पद पर नियुक्त करना चाहिये ।
शस्त्रास्त्रकुशलो यस्तु दृढाङ्गश्च निरालसः । यथायोग्यं समाहूयात् प्रनम्रः प्रतिहारकः ॥ १७५ ॥
द्वितीयोऽध्यायः ८३
द्वारपाल के लक्षण—जो शस्त्र तथा अस्त्र चढ़ाने में निपुण, दृढ़ अङ्गों वाला, आलस्यरहित, एवं नम्रता के साथ योग्यतानुसार लोगों को पुकार कर राजा के पास ले जानेवाला हो उसे 'प्रतिहारक' (द्वारपाल) पद पर नियुक्त करना चाहिये।
यथा विक्रयिणां मूलधननाशो भवेन्नहि ।
तथा शुल्कं तु हरति शौल्किकः स उदाहृतः ॥ १७६ ॥
चुङ्गी लेनेवाले के लक्षण—बेचनेवालों का मूल धन में जिससे कमी न आये ऐसे शुल्क (चुङ्गी) को जो व्यापारियों से वसूल करनेवाला हो उसे 'शौल्किक' पद पर नियुक्त करे।
जपोपवास-नियम-कर्मध्यानरतः सदा ।
दान्तः क्षमो निःस्पृहश्च तपोनिष्ठः स उच्यते ॥ १७७ ॥
तपोनिष्ठ के लक्षण—जो सदा जप, उपवास, नियम (व्रतपालन), शास्त्रोक्त कर्म तथा ध्यान में रत रहनेवाला, इन्द्रियों का दमन करनेवाला, क्षमाशील, निःस्पृह रहनेवाला हो उसे 'तपोनिष्ठ' कहते हैं।
याचकेभ्यो ददात्यर्थं भार्यापुत्रादिकं त्वपि ।
न संगृह्णाति यत्किञ्चिद् दानशीलः स उच्यते ॥ १७८ ॥
दानशील के लक्षण—जो याचकों को मांगने पर अपना धन, स्त्री तथा पुत्रादि को भी दे डालता है और उस समय अपने पास कुछ नहीं बचाकर रख लेता है, वह 'दानशील' कहलाता है।
पठनं पाठनं तुक क्षमास्त्वभ्यासशालिनः ।
श्रुतिस्मृतिपुराणानां श्रुतज्ञास्ते प्रकीर्तिताः ॥ १७९ ॥
श्रुतज्ञ के लक्षण—जो श्रुति (वेद), स्मृति तथा पुराणों का अध्ययन (पढ़ना) तथा अध्यापन (पढ़ाना) करने में समर्थ तथा उन सबों का नित्य अभ्यास करनेवाले हैं उन्हें (श्रुतज्ञ) कहते हैं।
साहित्यशास्त्रनिपुणः संगीतज्ञश्च सुस्वरः ।
सर्गादिपञ्चकज्ञाता स वै पौराणिकः स्मृतः ॥ १८० ॥
पौराणिक के लक्षण—जो साहित्य शास्त्र में निपुण, सङ्गीत का जाननेवाला, सुन्दर स्वरवाला एवं सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर, वंशानुचरित इन पाँच विषयों का जाननेवाला हो वह 'पौराणिक' कहलाता है।
मीमांसातर्कवेदान्तशब्दशासनतत्परः ।
ऊङ्खान्बोधिधतुं शक्तस्तत्त्वतः शास्त्रविच्च सः ॥ १८१ ॥
शास्त्रविद् के लक्षण—जो मीमांसा, तर्क (न्याय), वेदान्त, शब्दशासन (व्याकरणादि शब्द शास्त्र) का जाननेवाला, उक्त विषयों में तर्क करने तथा
| ८४ | शुक्रनीतिः |
|---|
यथार्थ रूप से उन्हें समझाने में समर्थ हो उसे 'शास्त्रविद्' कहते हैं ।
संहितां च तथा होरां गणितं वेत्ति तत्त्वतः ।
ज्योतिर्विच्च स विज्ञेयस्त्रिकालज्ञश्च यो भवेत् ॥ १८२ ॥
**ज्योतिर्विद् के लक्षण—**जो संहिता ( वाराही संहिता आदि ), होराशास्त्र ( पाराशर ), गणित ( ग्रहलाघवादि ) को यथार्थ रूप से जानता है एवं त्रिकालज्ञ ( भूत, भविष्य, वर्तमान का जानने वाला ) है वह 'ज्योतिर्विद्' कहलाता है ।
बीजानुपूर्व्या मन्त्राणां गुणान्दोषांश्च वेत्ति यः ।
मन्त्रानुष्ठानसम्पन्नो मान्त्रिकः सिद्धदैवतः ॥ १८३ ॥
**मान्त्रिक के लक्षण—**जो बीजों की आनुपूर्वी के साथ मन्त्रों के गुण तथा दोष को जानता है एवं मन्त्र का नित्य अनुष्ठान करने में लगा हुआ, देवता की सिद्धि प्राप्त करनेवाला होता है उसे 'मान्त्रिक' कहते हैं ।
हेतुलिङ्गौषधीभिर्यो व्याधीनां तत्त्वनिश्चयम् ।
साध्यासाध्यं विदित्वोपक्रमते स भिषक्स्मृतः ॥ १८४ ॥
**वैद्य के लक्षण—**जो हेतु ( कारण ), लिङ्ग ( लक्षण ) तथा औषध-ज्ञान द्वारा व्याधियों का यथार्थ निश्चय एवं साध्यता तथा असाध्यता जानकर चिकित्सा करता है उसे 'भिषक्' ( वैद्य ) कहते हैं ।
श्रुतिस्मृतीतरैर्मन्त्रानुष्ठानैर्देवतार्त्तनम् ।
कर्तुं हिततमं मत्वा यतते स च तान्त्रिकः ॥ १८५ ॥
**तान्त्रिक के लक्षण—**जो श्रुति तथा स्मृति से भिन्न पुराणादि में कहे हुए मन्त्रानुष्ठान द्वारा देवता का पूजन अत्यन्त हितकर समझकर उस पद्धति से यत्न करता है वह 'तान्त्रिक' कहलाता है ।
नपुंसकाः सत्यवाचो सुभूषाश्च प्रियंवदाः ।
सुकुलाश्च सुरूपाश्च योज्यास्त्वन्तःपुरे सदा ॥ १८६ ॥
**अन्तःपुर के योग्य पुरुष के लक्षण—**जो नपुंसक ( हिजड़े ), सत्य बोलने वाले, सुन्दर भूषण धारण करनेवाले, प्रियभाषी, अच्छे कुल में उत्पन्न तथा सुन्दर स्वरूपवाले हों, उन्हें सदा अन्तःपुर ( रनिवास ) के अन्दर में नियुक्त करे ।
अनन्याः स्वामिभक्ताश्च धर्मनिष्ठा दृढाङ्गकाः ।
अबाला मध्यवयसः सेवासु कुशलाः सदा ॥ १८७ ॥
सर्वं यद्यत्कार्यजातं नीचं वा कर्तुमुद्यताः ।
निदेशकारिणो राज्ञा कर्त्तव्याः परिचारकाः ॥ १८८ ॥
**परिचारक के लक्षण—**जो अनन्य भाव से स्वामी की भक्ति करनेवाले,
द्वितीयोऽध्यायः
द्वितीयोऽध्यायः ८५
धर्मनिष्ठ, दृढ अङ्गोंवाले, बाल्य अवस्था को पार किये हुये, तरुण, सदा सेवा करने में कुशल, जो कुछ कार्य स्वामी का उत्तम या चाहे मल-मूत्रादि उठाना आदि नीच भी कार्य हो उन सबों को करने के लिये उद्यत रहनेवाले एवं आज्ञानुसार कार्य करनेवाले हों ऐसे लोगों को राजा 'परिचारक' बनावे ।
शत्रुप्रजाभृत्यवृत्तं विज्ञातुं कुशलाश्च ये । ते गूढचाराः कर्त्तव्या यथार्थश्रुतबोधकाः ॥ १८६ ॥
जासूस के लक्षण—जो शत्रु तथा प्रजागण के व्यवहार को जानने के लिये कुशल एवं यथार्थ बातों को सुनकर उन्हें ठीक २ बताने वाले हों ऐसे लोगों को गूढचार ( जासूस ) पद पर नियुक्त करना चाहिये ।
राज्ञः समीपप्राप्तानां नतिस्थानविबोधकाः । दण्डधरा वेत्रधराः कर्त्तव्यास्ते सुशिक्षकाः ॥ १६० ॥
दण्डधारी-आसा-बल्लभधारी के लक्षण—जो राजा के समीप उपस्थित हुये लोगों को प्रणाम करने की रीति एवं बैठने के लिये स्थान को अच्छी तरह से बतानेवाले, विनय तथा शिक्षा जाननेवाले हों ऐसे लोगों को दण्ड तथा बेंत धारण करके राजा के समीप में रहने वाला बनाना चाहिये ।
तन्त्रीकण्ठोत्थितान् सप्तस्वरान् स्थानविभागशः । उत्पादयति संवेत्ति ससंयोगविभागिनः ॥ १६१ ॥ अनुरागं सुस्वरं च सतालं च प्रगायति । सन्नृत्यं वा गायकानामधिपः स च कीर्त्तितः ॥ १६२ ॥
गायकाधिप के लक्षण—जो वीणा या कण्ठ से निकले हुये स. रि. ग. म, प. ध. नि. इन ७ स्वरों को स्थान-विभाग के अनुसार यथार्थ रूप से पैदा करते हैं एवं संयोग तथा विभाग को साथ अर्थात् मिले हुये या अलग २ उन सबों को भलीभांति समझते हैं और जो राग, स्वर-ताल के साथ गाते या नाचते हैं ऐसे लोगों को गायकों ( गानेवालों ) का अधिपति बनाना चाहिये ।
तथाविधा च पण्यस्त्री निर्लज्जा भावसंयुता । शृङ्गाररसतन्त्रज्ञा सुन्दराङ्गी मनोरमा ॥ १६३ ॥ नवीनोत्तुङ्गकठिनकुचा सुस्मितदर्शिनी ।
वेश्या के लक्षण—और पूर्वोक्त रीति से गाने तथा नाचनेवाली, लज्जा न करनेवाली, भाव ( अनुराग ) से युक्त, शृङ्गार रस के तत्त्व को जाननेवाली, सुन्दर अङ्गों वाली, मनको आनन्दित करनेवाली, नवीन अवस्थावाली, ऊँचे, कठिन कुचोंवाली, सुन्दर स्मित ( मुसुकान ) के साथ देखने वाली ( कटाक्ष करनेवाली ) ऐसी जो वेश्या हो उसे राजा अपने यहां रखें ।
ये चान्ये साधकास्ते च तथा चित्तविरञ्जकाः ॥ १६४ ॥
८६ | शुक्रनीतिः
सुभृत्यास्तेपि सन्धार्या नृपेणात्महिताय च । वेश्या-भृत्य के लक्षण— और इसके अतिरिक्त अन्य वेश्याओं के भृत्य जो मनोऽभिलषित कार्य के करने में चतुर, चित्त को विशेष रूप से प्रसन्न करने वाले ऐसे अच्छे भृत्य हों उन्हें अपने हित के लिये राजा को रखना चाहिये ।
वैतालिकाः सुकवयो वेत्रदण्डधराश्च ये ॥ १६५ ॥ शिल्पज्ञाश्च कलावन्तो ये सदाप्युपकारकाः । दुर्गुणासूचका भाणा नर्तका बहुरूपिणः ॥ १६६ ॥ आरामकृत्रिमवनकारिणो दुर्गकारिणः । महानालिकयन्त्रस्थगोलैर्लक्ष्यविभेदिनः ॥ १९७ ॥ लघुयन्त्राग्नेयचूर्णबाणगोलासिकारिणः । अनेकयन्त्रशास्त्रास्त्रधनुस्तूणादिकारकाः ॥ १९८ ॥ स्वर्णरत्नाद्यलङ्कारघटका रथकारिणः । पाषाणघटका लोहकारा धातुविलेपकाः ॥ १९९ ॥ कुम्भकाराः शौल्विकाश्च तक्षाणो मार्गकारकाः । नापिता रजकाश्चैव वासिका मलहारकाः ॥ २०० ॥ वार्ताहराः सौचिकाश्च राजचिह्नाग्रधारिणः । भेरीपटहगोपुच्छ-शंखवेणवादिभिःस्वनैः ॥ २०१ ॥ ये व्यूहरचका यानव्यपथानादिबोधकाः । नाविकाः खनका व्याधाः किराता मारिका अपि ॥ २०२ ॥ शस्त्रसंमार्जनकरा जलधान्यप्रवाहकाः । आपणिकाश्च गणिका वाद्यजायाप्रजीविनः ॥ २०३ ॥ तन्तुवायाः शाकुनिकाश्चित्रकाराश्च चर्मकाः । गृहसंमार्जकाः पात्रधान्यवस्त्रप्रमार्जकाः ॥ २०४ ॥ शय्यावितानास्तरण-कारकाः शासका अपि । आमोदास्वेदसद्धूपकारास्ताम्बूलिकास्तथा ॥ २०५ ॥ हीनाल्पकर्माणश्चैते योज्याः कार्यानुरूपतः ।
वैतालिक तथा शिल्पशों को पास में रखने का निर्देश— और जो वैतालिक (राजा की स्तुति करके जगानेवाले), सुकवि, वेत या दण्ड धारण करनेवाले (रक्षक विशेष), शिल्प कला के पण्डित, कलाओं (६४ प्रकार की कामविद्या) में कुशल, सदा हित करनेवाले, दूसरों के दोषों की सूचना देनेवाले, भाण (परिहास के पण्डित), बहुरूपिया, बगीचा तथा बनावटी जंगल बनाने में कुशल, दुर्ग (किला) बनानेवाले, महानालिक यन्त्रों (बड़ी तोपों) के अन्दर रखे हुवे गोलों से शत्रुओं पर लक्ष्य-भेद (निशाना) करनेवाले (गोलन्दाज), लघु
द्वितीयोऽध्यायः ८७
यन्त्र ( बन्दूक आदि ), आग्नेय चूर्ण ( बारूद ), बाण, गोला और तलवार आदि के एवं अनेक प्रकार के युद्धोपयोगी यन्त्र, शस्त्र, अस्त्र, धनुष, तूणीर ( तर्कश ) आदि के बनानेवाले कारीगर, सोना, रत्न आदि के अलङ्कारों को बनानेवाले, रथ बनानेवाले पत्थरों को गढ़ने वाले ( सङ्गतराश ), लुहार, गेरू आदि धातुओं से गृहादि को रंगनेवाले ( रंगसाज ), कुम्हार, शौल्बिक ( ताम्बे के वर्त्तन बनानेवाले ), बढ़ई, सड़क बनानेवाले, नाई, धोबी, वासिक ( लकड़हारा ), मेहतर, संवाद पहुँचानेवाले, दर्जी, राज-चिह्न ( छत्र-चामर—निशान ) लेकर राजा के आगे रहनेवाले, व्यूह-रचना करनेवाले एवं भेरी ( नगारा ), पटह ( ढोल ), गोपुच्छ ( रणसिंघा ), शङ्ख, वंशी आदि को बजाकर यान ( शत्रुओं के ऊपर चढ़ाई करना ) और व्यपयान ( शत्रुओं से पीछे हटना ) आदि ( आक्रमण करना ) समयों में सैनिकों को सूचना देनेवाले, नाविक ( मल्लाह ), खनक ( खननेवाले ), व्याध ( शिकार खेलनेवाले या बहेलिया ), किरात ( कोल-भिल्लादि ), बोझा ढोनेवाले, शस्त्रों को साफ करनेवाले ( सान चढ़ाकर तीक्ष्ण करनेवाले ), जल तथा धान्य को ढोनेवाले, आपणिक ( व्यापार करनेवाले ), परदेशी स्त्री-विहीन कर्मचारियों के काम-शान्त्यर्थं वेश्यायें, बाजा बजाते हुये स्त्रियों के साथ नाच कर जीविका चलानेवाले, जुलाहे, पक्षी बढ़ाकर जीविका रखनेवाले, चित्रकार, चर्मकार ( मोची ), झाडू देनेवाले, वर्त्तन, धान्य, वस्त्र इनको सफा करनेवाले, शय्या, वितान ( चंदोवा ), बिछौना आदि के बनाने और उसको लगाने की कला को करनेवाले, चित्त को प्रसन्न करनेवाले ( सुगन्धित ) एवं पसीना न लाने वाले अच्छे धूपों को बनानेवाले, ताम्बूल ( पान का बीड़ा ) लगानेवाले, तथा अन्यान्य हीन तथा क्षुद्र राजसंबन्धी कार्य करने वाले इन सबों को कार्य के अनुरूप यथायोग्य राजा अपने यहाँ रक्खे ।
प्रोक्तं पुण्यतमं सत्यं परोपकरणं तथा ॥ २०६ ॥ आज्ञायुक्तांश्च भृतकान्सततं धारयेन्नृपः ।
सत्य तथा परोपकार की श्रेष्ठता तथा इनसे युक्त राजकर्मचारी रखने का निर्देश— सत्य तथा परोपकार को सब पुण्यों में श्रेष्ठ बताया है अतः इनसे युक्त आज्ञानुसार सच्चाई के साथ राज-कार्य करनेवाले भृत्यों को राजा अपने यहाँ सदा रक्खे ।
हिंसा गरीयसी सर्वपापेभ्योऽनृतभाषणम् ॥ २०७ ॥ गरीयस्तरमेताभ्यां युक्तान्भृत्यान्न धारयेत् ।
संपूर्ण पापों से हिंसा तथा असत्य की प्रबलता तथा इनसे युक्त भृत्यों को
८८ शुक्रनीतिः
न रखने का निर्देश—और सब पापों से बढ़कर हिंसा (हत्या या कष्ट पहुंचाना) और झूठ बोलना है अतः इन दोनों से युक्त भृत्यों को न रखे । यदा यदुचितं कर्तुं वक्तुं वा तत्प्रबोधयन् ॥ २०८ ॥ तद्भक्ति कुरुते द्राक्तु स सद्भृत्यः सुपूज्यते । सद्भृत्य के लक्षण—जिस समय जो कार्य करने के लिये एवं जो बात बोलने के लिये उचित प्रतीत हो उसी को राजा से समझाता हुआ और स्वयं भी शीघ्रता से उसी बात को कहता एवं उसी कार्य को करता भी है वही भृत्य अच्छा कहलाता है और भली भांति पूजित भी होता है । उत्थाय पश्चिमे यामे गृहकृत्यं विचिन्त्य च ॥ २०९ ॥ कृत्वोत्सर्गं तु विष्णुं हि स्मृत्वा स्नायादनन्तरम् । प्रातः कृत्यं तु निर्वर्त्य यावत्सार्धमुहूर्त्तकम् ॥ २१० ॥ गत्वा स्वकार्यशालां वा कार्याकार्यं विचिन्त्य च । अच्छे भृत्यों का यह कृत्य है कि—वह रात्रि को पिछले प्रहर में उठकर गृह के ( उस दिन करने लायक ) कृत्यों का विचार करने के बाद मल-मूत्रादि का परित्याग कर विष्णु ( परमात्मा ) का स्मरण करते हुये स्नान करे । अथवा १।। मुहूर्त ( करीब १॥ घण्टे ) के अन्दर प्रातःकालीन नित्य के सम्पूर्ण कार्यों को समाप्त कर अपने कार्यालय में जाकर वहां के कर्त्तव्य या अकर्त्तव्य कार्यों का निश्चय कर तदुपरान्त स्नान करे । विनाऽऽज्ञया विशन्तं तु द्वास्थः सम्यङ् निरोधयेत् ॥ २११ ॥ निर्देशकार्यं विज्ञाप्य तेनाज्ञप्तः प्रमोचयेत् । द्वारपाल के कर्त्तव्यों का निर्देश—और द्वारपाल का यह कर्त्तव्य है कि वह द्वार पर रहकर बिना राजाज्ञा के अन्दर प्रवेश करनेवाले को अच्छी तरह से रोके । और उसके बताये हुये कार्य की सूचना राजा को देकर यदि राजा की आज्ञा अन्दर आने देने के लिये हो तो उसे अन्दर जाने के लिये छोड़ दे । दृष्ट्वागतान्सभामध्ये राज्ञे दण्डधरः क्रमात् ॥ २१२ ॥ निवेद्य तन्नतीः पश्चात्तेषां स्थानानि सूचयेत् । राजपार्श्ववर्त्ती दण्डधारियों का कर्त्तव्य—और राजा के पास दण्ड धारण करनेवाले भृत्यों का यह कर्त्तव्य है कि—वह राजसभा में आये हुये लोगों को देखकर क्रम से राजा से उसके प्रणाम करने की सूचना देकर पश्चात् उससे बैठने के लिये स्थान का निर्देश करे । ततो राजगृहं गत्वाऽऽज्ञप्तो गच्छेच्च सन्निधिम् ॥ २१३ ॥ मत्वा नृपं यथान्यायं विष्णुरूपमिवापरम् । प्रविश्य सानुरागस्य चित्तज्ञस्य समन्ततः ॥ २१४ ॥
द्वितीयोऽध्यायः [८१]
भर्तुरर्द्धासने दृष्टिं कृत्वा नान्यत्र निक्षिपेत् ।
**भृत्य का राजसमीपावस्थान करने पर कर्त्तव्य—**उसके (स्थान बताने के) बाद पुनः राजगृह (राजसभा) में जाकर राजा की आज्ञा पाने पर उसके समीप जावे । और जगत् के रक्षार्थ दूसरे विष्णु भगवान के समान स्थित राजा को नियमानुकूल प्रणाम करे और राजसभा में पहुँचकर भृत्यों के प्रति अनुराग रखनेवाले एवं उनके हृदय को पहचाननेवाले राजा के अर्द्धासन की ओर स्थिर-दृष्टि होकर देखता रहे और किसी अन्य तरफ दृष्टि न दौड़ावे ।
अग्निं दीप्तमिवासीदेद्राजानमुपशिक्षितः ॥ २१५ ॥
आशीविषमिव क्रुद्धं प्रभुं प्राणधनेश्वरम् ।
जलती हुई अग्नि के समान एवं क्रुद्ध विषधर सर्प की भांति प्राण तथा धन लेने में समर्थ राजा को समझ कर अत्यन्त विनय के साथ उसके समीप जावे ।
यत्नेनोपचरेन्नित्यं नाहमस्मीति चिन्तयेत् ॥ २१६ ॥
समर्थयंश्च तत्पक्षं साधु भाषेत भाषितम् ।
तन्नियोगेन वा ब्रूयादर्थं सुपरिनिश्चितम् ॥ २१७ ॥
**राजा के पक्ष की पुष्टि करने का निर्देश—**और नित्य यत्न के साथ राजा की सेवा करे और 'राजा के आगे मेरी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है' ऐसा सोचे एवं राजा के पक्ष का ही समर्थन करता हुआ सन्तोषजनक बात कहे । अथवा राजा की आज्ञा पाने पर लोक-शास्त्र से सुनिश्चित बात कहे ।
सुखप्रबन्धगोष्ठीषु विवादे वादिनां मतम् ।
विजानन्नपि नो ब्रूयाद्भर्तुः क्षिप्तोत्तरं वचः ॥ २१८ ॥
**राजाज्ञा से विवादियों के मत को युक्ति से बोलने का निर्देश—**मनोविनोदार्थ प्रस्तुत राजगोष्ठी में परस्पर तर्क करनेवालों के विवाद उपस्थित होने पर सिद्धान्त बात को जानते हुये भी वादी रूप में बोलनेवाले राजा के उत्तर को काटकर कोई वचन न बोले ।
सदाऽनुद्धतवेषः स्यान्नृपाहूतस्तु प्राञ्जलिः ।
तद्वां कृतनतिः श्रुत्वा वस्त्रान्तरितसम्मुखः ॥ २१९ ॥
तदाज्ञां धारयित्वादौ स्वकर्माणि निवेदयेत् ।
नत्वाऽऽसीतासने प्रह्वो न तत्पार्श्वे न संमुखे ॥ २२० ॥
उच्चैः प्रहसनं कासं ष्ठीवनं कुत्सनं तथा ।
जृम्भणं गात्रभङ्गं च पर्वास्फोटं च वर्जयेत् ॥ २२१ ॥
**राजा से स्वकार्य निवेदन-प्रकार तथा जोर से हँसने आदि का निषेध—**राजा के बुलाने पर सदा विनीत के समान वेष बनाये हुये हाथ जोड़े और
९० : शुक्रनीतिः
नमस्कार करने के बाद शरीर के अगले हिस्से को वस्त्र से ढके हुये स्थित हो और राजा की बात सुनकर तथा सर्वप्रथम उनकी आज्ञा पाकर पश्चात् अपने कार्य का निवेदन करे। और नमस्कार करने के बाद नम्रता के साथ अपने आसन पर बैठे, और राजा के बगल में या सामने जोर से हँसना, खाँसना, थूकना, कुत्सित कार्य या किसी की निन्दा करना, जभाई लेना, शरीर तोड़ना, अंगुलियों के पोरों को चटकाना इन सब कार्यों को न करे।
राज्ञादिष्टन्तु यत्स्थानं तत्र तिष्ठेन्मुदान्वितः ।
प्रवीणोचितमेधावी वर्जयेदभिमानिताम् ॥ २२२ ॥
राजा के बताये हुये स्थान पर प्रसन्न चित्त से बैठे, प्रवीणों की भांति योग्य बुद्धिवाला होकर अभिमान करना छोड़ दे ।
आपद्युन्मार्गगमने कार्यकालात्ययेषु च ।
अपृष्टोऽपि हितान्वेषी ब्रूयात्कल्याणभाषितम् ॥ २२३ ॥
राजा के ऊपर जब कोई आपत्ति आ पड़े अथवा वह कुपथ पर चले, या कार्य करने का समय व्यतीत हो रहा तो बिना पूछने पर भी हित चाहने वाला होकर राजा से कल्याणकारक वचन कहे ।
प्रियं तथ्यं च पथ्यं च वदेद्धर्मार्थकं वचः ।
समानवार्तया चापि तद्धितं बोधयेत्सदा ॥ २२४ ॥
हितकारी सेवक का कृत्य—और सुनने में प्रिय, सत्य तथा हितकारक, धर्म तथा अर्थ से युक्त वचन सदा राजा से कहे, और संमानयुक्त बात-चीत से या समान बातों (उदाहरणों) के द्वारा सदा राजा को हित की बात समझावे ।
कीर्तिमन्यनृपाणां वा वदेन्नीतिफलं तथा ।
दाता त्वं धार्मिकः शूरो नीतिमानसि भूपते ॥ २२५ ॥
अनीतिस्ते तु मनसि वर्तते न कदाचन ।
ये ये भ्रष्टा अनीत्या तांस्तदग्रे कीर्तयेत्सदा ॥ २२६ ॥
नृपेभ्यो ह्यधिकोऽसीति सर्वेभ्यो न विशेषयेत् ।
और समझाने के लिये अन्य राजाओं की कीर्ति और नीति का फल राजा से कहे । और यह सदा उसके आगे कहे कि—'हे महाराज ! आप दाता, धार्मिक, शूर तथा नीति के जानने वाले या तदनुसार चलनेवाले हैं । और कभी आपके मन में अनीति नहीं रहती है। एवं जो जो अनीति पर चलने से राज्य से भ्रष्ट हो गये हैं उन सबों का वर्णन सदा राजा के आगे करे। और 'आप सब राजाओं से श्रेष्ठ हैं' ऐसा विशेष रूप से न कहे ।
परार्थदेशकालज्ञो देशे काले च साधयेत् ॥ २२७ ॥
द्वितीयोऽध्यायः । ६१
परार्थनाशनं न स्यात्तथा ब्रूयात्सदेव हि ।
और देश तथा काल का जाननेवाला होकर उचित देश तथा काल होने पर दूसरे का कार्य राजा से सिद्ध करावे। और राजा से सदा ऐसा वचन कहे जिससे दूसरे का कार्य न नष्ट हो ।
न कर्षयेत्प्रजां कार्यमिषतश्च नृपः सदा ॥ २२८ ॥
अपि स्थाणुवदासीत शुष्यन्परिगतः क्षुधा ।
न त्वेवानर्थसम्पन्नां वृत्तिमीहेत पण्डितः ॥ २२६ ॥
राजा को किसी भी मिष से प्रजा को पीड़ित न करने का निर्देश—
समझदार राजा किसी निजी कार्य के व्याज से सदा प्रजा को दुःखित न करे । चाहे भूख से पीड़ित होने से सूखकर स्थाणु (खून्थे) की भांति निश्चल हो जाय फिर भी अनर्थ से भरी हुई (बुरी) जीविका को न चाहे ।
यत्कार्ये यो नियुक्तः स भूयात्तत्कार्यतत्परः ।
नान्वाधिकारमन्विच्छेन्नाभ्यसूयेच्च केनचित् ॥ २३० ॥
समझदारों को अपने २ कार्यों में नियुक्त रहने का निर्देश—
जो जिस कार्य पर नियुक्त किया गया हो वह उस कार्य के करने में तत्पर रहे। और किसी दूसरे के अधिकार छीनने की इच्छा न करे और किसी के साथ असूया (मात्सर्य) न करे ।
न न्यूनं लक्षयेत्कस्य पूरयेत स्वशक्तितः ।
परोपकरणादन्यन्न स्यान्मित्रकरं सदा ॥ २३१ ॥
किसी की त्रुटि पर ध्यान न दे बल्कि अपनी शक्ति से उसकी त्रुटि को पूर्ण करे क्योंकि दूसरे के साथ उपकार करने से बढ़कर दूसरा कोई मित्रता पैदा करनेवाला कार्य नहीं है ।
करिष्यामीति ते कार्यं न कुर्यात्कार्यलम्बनम् ।
द्राक्कुर्यात् समर्थश्चेत्साशं दीर्घं न रक्षयेत् ॥ २३२ ॥
किसी से 'मैं तुम्हारा कार्य करूंगा' ऐसा कहकर उसके कार्य करने में विलम्ब न करे । यदि स्वयं समर्थ हो तो शीघ्र कार्य को पूरा कर दे। दीर्घ काल तक उसे आशा में लटका कर न रखे ।
गुह्यं कर्म च मन्त्रं च न भर्तुः सम्प्रकाशयेत् ।
विद्वेषं च विनाशं च मनसापि न चिन्तयेत् ॥ २३३ ॥
स्वामी के गुप्त कार्य के प्रकाश करने का निषेध—
स्वामी (राजा) के गुप्त कार्य या विचार को किसी के समक्ष प्रकाशित न करे। और उसके साथ विद्वेष या उसके नाश की कल्पना मन से भी न करे ।
राजा परममित्रोऽस्ति न कामं विचरेदिति ।
६२ : शुक्रनीतिः
स्त्रीभिस्तद्वर्धिभिः पापैर्वैरिभूतैर्निराकृतैः ॥ २३४ ॥
एकार्थचर्यां साहित्यं संसर्गं च विवर्जयेत् ।
राजा को मित्र मानने का एवं उनकी स्त्री आदि के साथ सहवास का निषेध—'राजा मेरा परम मित्र है'—ऐसा समझ कर मनमाना व्यवहार न करे। और स्वामी को चाहनेवाली स्त्रियों एवं स्वामी के साथ पाप (बुरा) व्यवहार या वैरभाव रखनेवाले किंवा स्वामी से तिरस्कृत लोगों के साथ मिलकर किसी कार्य को करना या उनके साथ रहना या किसी प्रकार का संबन्ध रखना त्याग दे।
वेषभाषानुकरणं न कुर्यात्पृथिवीपतेः ॥ २३५ ॥
सम्पन्नोपि च मेधावी न स्पर्धेत च तद्गुणैः ।
**राजवेषभूषा-धारण की नकल करने का निषेध—**राजा के वेष तथा भूषा का नकल न करे। गुणों से संपन्न तथा प्रतिभाशाली होने पर भी राजा के गुणों के साथ स्पर्धा न करे अर्थात् 'मैं राजा से अधिक गुणवान् हूँ' यह न दिखावे।
रागापरागौ जानीयाद्भर्तुः कुशलकर्मवित् ॥ २३६ ॥
इङ्गिताकारचेष्टाभ्यस्तदभिप्रायतां तथा ।
त्यजेद्विरक्तं नृपतिं रक्ते वृत्तिन्तु कारयेत् ॥ २३७ ॥
**राजा की विरक्ति तथा अनुरक्ति का ज्ञान रखने एवं तदनुसार त्याग तथा ग्रहण का निर्देश—**और निपुण लोगों के कर्म को अथवा राजा के या अपने शुभ कर्म को जाननेवाला होकर स्वामी के अनुराग अथवा विरक्ति को अर्थात् किस कार्य से स्वामी प्रसन्न या अप्रसन्न होते हैं—इस बात को एवं स्वामी के इशारा, आकार (मुखमुद्रा), और चेष्टा से उनके अभिप्राय को जाने। और यदि राजा को विरक्त जाने तो उसे छोड़ दे एवं अनुराग युक्त जाने तो उसके पास रहे।
विरक्तः कारयेन्नाशं विपक्षाभ्युदयं तथा ।
आशावर्धनकं कृत्वा फलनाशं करोति च ॥ २३८ ॥
अकोपोऽपि सकोपाभः प्रसन्नोऽपि च निष्फलः ।
वाक्यञ्च समदं वक्ति वृत्तिच्छेदं करोति च ॥ २३९ ॥
खद्यते विमुखश्चैव गुणसङ्कीर्त्तने कृते ।
दृष्टिं क्षिपत्यथान्यत्र क्रियमाणे च कर्मणि ॥ २४० ॥
विरक्तलक्षणं ह्येतद्रक्तस्य लक्षणं ब्रुवे ।
**विरक्त राजा के लक्षण—**राजा जिसके ऊपर विरक्त होता है उसका नाश करता है एवं उसके शत्रुओं का अभ्युदय (तरक्की) करता है। यदि स्वामी प्रथम आशा बढ़ाकर अन्त में कार्यफल को नष्ट कर देता है।
द्वितीयोऽध्यायः ६३
और बिना कोप के भी कोपयुक्त सा दिखाई पड़ता है। प्रसन्न होते हुये भी कार्य को सफल नहीं करनेवाला होता है। और अहङ्कारयुक्त बात बोलता है, जीविका का नाश करता है। गुणों की प्रशंसा करने पर भी विमुख दिखाई पड़ता है और अन्यत्र किये जा रहे कार्य की ओर दृष्टि लगाता है किन्तु गुण-कीर्त्तन करनेवाले की ओर नहीं लगाता है तो ये सब लक्षण विरक्त के समझने चाहिये। और आगे अनुरक्त स्वामी के लक्षण कहते हैं।
दृष्ट्वा प्रसन्नो भवति वाच्यं गृह्णाति चादरात् ॥ २४१ ॥ कुशलादिपरिप्री श्नी प्रदापयति चासनम्। विविक्तदर्शनं चास्य रहस्येनं न शङ्कते ॥ २४२ ॥ जायेत हृष्टवदनः श्रुत्वा तस्य च तत्कथाम्। अप्रियाण्यपि चान्यानि तद्युक्तान्यभिमन्वते ॥ २४३ ॥ उपायनञ्च गृह्णाति स्तोकं सम्पादनैस्तथा। कथान्तरेषु स्मरति प्रहृष्टवदनस्तथा ॥ २४४ ॥
**अनुरक्त राजा के लक्षण—**जो देखकर प्रसन्न होता है और आदर के साथ वचनों को ग्रहण करता है अर्थात् सुनता है। कुशलादि पूछता है, बैठने को आसन दिलाता है। और सेवक के लिये एकान्त में दर्शन देता है एवं एकान्त में भेट होने पर उससे शङ्का नहीं रखता है। और उसकी जो बातें हैं उसे सुनकर प्रसन्न-वदन दिखाई पड़ता है और सेवक से संबद्ध अप्रिय बातों एवं कार्यों को उससे अन्य मानता है अर्थात् अभिनन्दन करता है। दिये हुये उपहार को स्वीकार करता है एवं सेवक के थोड़े से कार्यों को कर देने से भी उन्हें दूसरी बातों का प्रसङ्ग होने पर भी प्रहृष्ट-वदन होकर स्मरण करता है। ये सब अनुराग रखनेवाले स्वामी के लक्षण हैं। यदि ऐसा हो तो उस स्वामी का सेवा करनी चाहिये।
तद्दत्तवस्त्रभूषादिचिह्नं सम्धारयेत्सदा। न्यूनाधिक्यं स्वाधिकारकार्ये नित्यं निवेदयेत् ॥ २४५ ॥ तदर्थां तत्कृतां वार्त्तां शृणुयाद्वापि कीर्त्तयेत्।
**राजा से प्रदत्त भूषणादि धारण का निर्देश—**अनुरक्त स्वामी के दिये हुये वस्त्र-भूषण आदि चिह्न को सदा धारण करना चाहिये। अपने अधिकार के कार्यों में जो न्यूनाधिक्य (कमी-बेश) हो गया हो उसे नित्य स्वामी से निवेदन करना चाहिये। और स्वामी से संबद्ध तथा स्वामी की कही हुई बातों को सुने और उसका कीर्त्तन करे।
चारसूचकदोषेण त्वन्यथा यद्वदेनृपः ॥ २४६ ॥ शृणुयान्मौनमाश्रित्य तद्व्यवञ्चानुमोदयेत्।
| ६४ | शुक्रनीतिः |
|---|
स्वामी के प्रति भृत्य के कर्त्तव्य—यदि जासूस अथवा चुगलखोरों के दोष (कहने) से राजा विरुद्ध वचन कहें तो उसे चुपचाप भृत्य को सुन लेना चाहिये किन्तु सत्य की भांति उसे स्वीकार नहीं करना चाहिये ।
आपद्गतं सुभर्त्तारं कदापि न परित्यजेत् ॥ २४७ ॥ और विपत्ति में पड़े हुये अच्छे स्वामी का कभी परित्याग न करना चाहिये।
एकवारमप्यशितं यस्यानं ह्मादरेण च । तद्विष्टं चिन्तयेन्नित्यं पालकस्याञ्जसा न किम् ॥ २४८ ॥ चाहे जिस किसी का अन्न यदि आदर के साथ एक बार भी खा लिया जाय तो उसका हित नित्य चिन्तन करना उचित होता है फिर पालन करने वाले का वस्तुतः क्या हितचिन्तन नहीं करना चाहिये अर्थात् अवश्य करना चाहिये ।
अप्रधानः प्रधानः स्यात्काले चात्यन्तसेवनात् । प्रधानोऽप्यप्रधानः स्यात्सेवाल्स्यादिना यतः ॥ २४६ ॥ स्वामी की समय पर अत्यन्त सेवा करने से अप्रधान (गौण) सेवक प्रधान (मुख्य) हो जाता है किन्तु सेवा में आलस्यादि करने से प्रधान भी अप्रधान सेवक हो जाता है ।
नित्यं संसेवनरतो भृत्यो राज्ञः प्रियो भवेत् । स्वस्वाधिकारकार्यं यद्द्वाक्कुर्यात्सुमना यतः ॥ २५० ॥ नित्य भली-भांति सेवा में तत्पर रहनेवाला भृत्य राजा का प्रिय होता है। क्योंकि भृत्य अपने २ अधिकार ( जिम्मेदारी ) का कार्य शीघ्र करता है अतः स्वामी उससे प्रसन्न रहता है ।
न कुर्यात्सहसा कार्यं नीचं राजापि नो दिशेत् । तत्कार्यकारकाभावे राज्ञा कार्यं सदैव हि ॥ २५१ ॥ भृत्य स्वामी का कार्य अविवेक-पूर्वक न करे अर्थात् सावधानी से करे। और राजा भी भृत्य से नीच कार्य करने के लिये न कहे किन्तु यदि उस नीच (मल-मूत्रादि उठाना रूप) कार्य का करने वाला उस समय कोई राजा के पास न हो तो उस कार्य को सदा स्वयं राजा को कर देना उचित ही है ।
काले यदुचितं कर्तुं नीचमप्युत्तमोऽर्हति । यस्मिन्प्रीतो भवेद्राजा तदनिष्टं न चिन्तयेत् ॥ २५२ ॥ समय पड़ने पर यदि आवश्यकता हो तो मल-मूत्रादि उठाना निकृष्ट कार्य भी उसके अयोग्य उच्च कोटि के भृत्य के लिये करना उचित ही है क्योंकि
द्वितीयोऽध्यायः ६५
द्वितीयोऽध्यायः ६५
जिस के ऊपर राजा प्रसन्न हो उसके अनिष्ट की चिन्ता कदापि नहीं करनी चाहिये।
न दर्शयेत्स्वाधिकारगौरवं तु कदाचन ।
और राजा के सामने कभी अपने अधिकार का गौरव नहीं प्रकाशित करना चाहिये।
परस्परं नाभ्यसूयुर्न भेदं प्राप्नुयुः कदा ॥ २५३ ॥ राज्ञा चाधिकृताः संतः स्वस्वाधिकारगुप्तये ।
आपस में भृत्यों के कर्त्तव्य—राजा के द्वारा किसी अधिकार पर नियुक्त किये गये उत्तम भृत्य को चाहिये कि—वह कभी भी अपने २ अधिकार की रक्षा के लिये आपस में एक दूसरे के दोष को नहीं दिखाये और न परस्पर भेद रक्खे।
अधिकारिगणो राजा सद्वृत्तौ यत्र तिष्ठतः ॥ २५४ ॥ उभौ तत्र स्थिरा लक्ष्मीर्विपुला सम्मुखी भवेत् ।
राजा तथा भृत्य के परस्पर अच्छा व्यवहार करने का निर्देश—जहां पर राजा तथा अधिकारी गण (भृत्यगण) ये दोनों परस्पर अच्छा व्यवहार रखते हैं वहां पर विपुल तथा स्थिर लक्ष्मी संमुख उपस्थित रहती है।
अन्याधिकारवृतं तु न ब्रूयाच्छ्रुतमप्यृत ॥ २५५ ॥ राजा न शृणुयादन्यमुखतस्तु कदाचन ।
दूसरे भृत्य के अधिकार-विषयक दोष को सुनकर भी भृत्य राजा से न कहे। और राजा भी दूसरे भृत्य के मुख से किसी दूसरे की बात को कभी न सुने।
न बोधयन्ति च हितमऽहितं वाधिकारिणः ॥ २५६ ॥ प्रच्छन्नवैरिणस्ते तु दास्यरूपमुपाश्रिताः ।
जो अधिकारी लोग हित या अहित बात राजा को नहीं समझाते हैं वे नौकर के रूप में छिपे हुये राजा के शत्रु के समान होते हैं।
हिताहितं न शृणोति राजा मन्त्रिमुखाच्च यः ॥ २५७ ॥ स दस्यू राजरूपेण प्रजानां धनहारकः।
डाकू के समान राजा के लक्षण—जो राजा मन्त्री के मुख से कही हुई हित या अहित की बातों पर ध्यान नहीं देता है वह राजा के रूप में डाकू के समान केवल प्रजा का धन हरण करनेवाला है।
सुपुष्टव्यवहारा ये राजपुत्रैश्च मन्त्रिणः ॥ २५८ ॥ विरुध्यन्ति च तैः साकं ते तु प्रच्छन्नतस्कराः ।
प्रच्छन्न चोर के लक्षण—जो मन्त्री लोग राजपुत्रों के द्वारा व्यवहार-
६६ | शुक्रनीतिः
विषयक ( राजकार्य-विषयक ) प्रश्न को अच्छी तरह से पूछे जाने पर; उनके साथ विरुद्ध व्यवहार करने लगते हैं वे छिपे हुये चोर के समान हैं ।
बाला अपि राजपुत्रा नावमान्यास्तु मन्त्रिभिः ॥ २५९ ॥
सदा सुबहुवचनैः सम्बोध्यास्ते प्रयत्नतः ।
बालक भी राजपुत्र का तिरस्कार का निषेध— छोटी उम्रवाले भी राजपुत्र लोग मन्त्रियों के द्वारा तिरस्कार के योग्य नहीं हैं बल्कि प्रयत्नपूर्वक वे सदा सुन्दर बहुवचनान्त आदरसूचक शब्दों के साथ संबोधन करने के योग्य ही हैं ।
असदाचरितं तेषां क्वचिद्राज्ञे न दर्शयेत् ॥ २६० ॥
स्त्रीपुत्रमोहो बलवान्न निन्दा श्रेयसे यतः ।
और मन्त्री लोगों को कभी भी उन राजपुत्रों के बुरे आचरणों को राजा से नहीं सूचित करना चाहिये, क्योंकि स्त्री तथा पुत्र का मोह बलवान् होता है अतः उन दोनों की निन्दा करना कल्याणकारक नहीं होता है ।
राज्ञोऽवश्यतरं कार्यं प्राणसंशयितं च यत् ॥ २६१ ॥
आज्ञापयप्रतञ्चाहं करिष्ये तत्तु निश्चितम् ।
इति विज्ञाप्य द्राक्कर्तुं प्रयतेत स्वशक्तितः ॥ २६२ ॥
भृत्य को उचित है कि—उस राजा का अत्यन्त आवश्यक अथवा उनके प्राणों को संशय ( संकट ) डाल देनेवाला जो कार्य हो रहा हो उसे करने के लिये सबसे आगे बढ़कर “प्रभो ! मुझे आज्ञा दीजिये, मैं उस कार्य को निश्चित रूप से करूंगा' ऐसा राजा से निवेदन कर अपनी शक्ति के अनुसार उसे शीघ्रता के साथ करने के लिये प्रयत्न करे ।
प्राणानपि च सन्दध्यान्महत्कार्ये नृपाय च ।
भृत्यः कुटुम्बतुष्ट्यर्थं नान्यथा तु कदाचन ॥ २६३ ॥
भृत्य अपने कुटुम्ब के पालनार्थ ही विवश होकर राजा के प्राण-संकट आदि महान् कार्य की उपस्थिति होने पर राजा के लिये अपना प्राण भी दे डाले, अन्यथा ( यदि कुटुम्ब के पालन की चिन्ता न हो तो ) कभी भी प्राणों का त्याग न करे ।
भृत्या धनहराः सर्वे युक्त्या प्राणहरो नृपः ।
सभी भृत्य कारणवश राजा के धन लेनेवाले होते हैं एवं राजा भी कारण-वश ही भृत्य का प्राण लेनेवाला होता है ।
युद्धादौ सुमहत्कार्ये भृत्या प्राणान्हरेन्नृपः ॥ २६४ ॥
नान्यथा भृतिरूपेण भृत्यो राजधनं हरेत् ।
युद्धादि महान् कार्य उपस्थित होने पर वेतन का मूल्य चुकता कराने
द्वितीयोऽध्यायः ६७
के लिये राजा भृत्य के प्राणों को नष्ट करे अन्यथा (युद्धादि के अतिरिक्त साधारण कार्यों में) प्राण न ले अर्थात् वेतन के लालच से स्वामी के युद्धादि में जय आदि की कामना रखनेवाले भृत्य प्राणों का त्याग करते हैं अन्यथा नहीं। और भृत्य वेतन रूप से ही राजा का धन ग्रहण करे अन्यथा (वेतन के अलावा किसी प्रकार से) न ग्रहण करे।
अन्यथा हरतस्तौ तु भवतश्च स्वनाशकौ ॥ २६५ ॥
यदि उक्त प्रकार से अन्यथा (भिन्न) रीति से राजा और भृत्य क्रम से प्राण और धन एक दूसरे का हरण करते हैं तो वे दोनों अपना २ नाश करते हैं।
राजाऽनु युवराजस्तु मान्योऽमात्यादिकैः सदा । तन्न्यूनामात्यनवकं तन्न्यूनाधिकृतो गणः ॥ २६६ ॥ मन्त्रितुल्यश्चायुक्तिको न्यूनः साहस्त्रिको मतः ।
सबसे अधिक राजा अमात्यादि के द्वारा सदा पूजनीय होता है, उसके बाद राजा से कम युवराज माननीय होता है, युवराज से कम अमात्यादि ९ प्रकृति (प्रधान राजपुरुष) वर्ग माननीय होता है। अमात्यादि से कम अधिकारी वर्ग (अफसर लोग) माननीय होता है। और मन्त्री के तुल्य आयुक्तिक (१००० सैनिकों का स्वामी) माननीय होता है। उससे न्यून साहस्त्रिक (१००० सैनिकों का स्वामी) माननीय होता है।
न क्रीडयेद्राजसमं क्रीडिते तं विशेषयेत् ॥ २६७ ॥ नाभमान्या राजपत्नी कन्या वापि च मन्त्रिभिः । राजसम्बन्धिनः पूज्याः सुहृदश्च यथार्हतः ॥ २६८ ॥
राजा के साथ प्रथम किसी प्रकार का खेल ही न खेले, यदि खेले तो खेल में राजा को जितावे अर्थात् उसे कभी न हराये। और मन्त्रियों को कभी राजा की पत्नी या कन्या का तिरस्कार नहीं करना चाहिये। और राजा के सम्बन्धी तथा मित्रों का यथायोग्य आदर-सत्कार करना चाहिये।
नृपाहूतस्तुरं गच्छेद्व्यक्त्वा कार्यशतं महत् ।
भृत्यों को सैकड़ों महान से महान् कार्यों को छोड़कर भी राजा के बुलाने पर तुरन्त उनके पास जाना चाहिये।
मित्रायापि न वक्तव्यं राजकार्यं सुमन्त्रितम् ॥ २६९ ॥ वृत्तिं बिना राजद्रव्यमदत्तं नाभिलाषयेत् ।
गुप्त रूप से विचार किये हुये किसी राजकार्य को अपने मित्र से भी नहीं कहना चाहिये। वेतन को छोड़कर राजा के किसी धन को बिना उनके दिये लेने की इच्छा भी नहीं करनी चाहिये।
* शु०
६८ | शुक्रनीतिः
राजाज्ञया विना नेच्छेत्कार्यमध्यस्थिकीं भृतिम् ॥ २७० ॥
न निहन्याद् द्रव्यलोभात्सत्कार्यं यस्य कस्यचित् ।
राजाज्ञा के बिना कार्य के मध्य में अर्थात् बिना कार्य समाप्त किये वेतन लेने की इच्छा न करे। और द्रव्य के लोभ से किसी के अच्छे कार्य को नष्ट न करे।
स्वस्त्रीपुत्रधनप्राणैः काले संरक्षयेन्नृपम् ॥ २७१ ॥
उत्कोचं नैव गृह्णीयान्नान्यथा बोधयेन्नृपम् ।
संकट-काल पड़ने पर अपनी स्त्री, पुत्र, धन तथा प्राण देकर भी राजा की रक्षा करे। घूस न ले और राजा को वस्तुस्थिति से विपरीत न समझावे।
अन्यथा दण्डकं भूपं नित्यं प्रबलदण्डकम् ॥ २७२ ॥
निगृह्य बोधयेत्सम्यगेकांते राज्यगुप्तये ।
यथार्थ दण्ड न देनेवाले या नित्य प्रबल दण्ड देनेवाले राजा को राज्य की रक्षा के लिये रोककर एकान्त में भली-भाँति समझाना भृत्य के लिये उचित है।
हितं राज्ञश्चाहितं यल्लोकानां तन्न कारयेत् ॥ २७३ ॥
नवीनकरशुल्काद्यैर्लोक उद्विजते ततः ।
जिससे केवल राजा का हित है किन्तु प्रजा का अहित है ऐसे कार्य को राजा से न करावे। क्योंकि नवीन कर तथा चुंगी आदि लगाने से प्रजा उद्विग्न हो उठती है।
गुणनीतिबलद्वेषी कुलभूतोऽप्यधार्मिकः ॥ २७४ ॥
नृपो यदि भवेत्तं तु त्यजेद्राष्ट्रविनाशकम् ।
अच्छे वंश में उत्पन्न हुआ भी राजा यदि गुण, नीति तथा बल (सेना) के साथ द्वेष करनेवाला एवं अधार्मिक हो तो उसे राज्य को नष्ट करनेवाला समझकर त्याग कर देना चाहिये अर्थात् उसे गद्दी से उतार देना चाहिये।
तत्पदे तस्य कुलजं गुणयुक्त पुरोहितः ॥ २७५ ॥
प्रकृत्यनुमतिं कृत्वा स्थापयेद्राज्यगुप्तये ।
और पुरोहित उस राजा के स्थान पर उस राजा के वंश में उत्पन्न राजगुणों से युक्त किसी को प्रकृतियों (अमात्यादिकों) की संमति लेकर राज्य की रक्षा के लिये स्थापित करे।
सास्त्रो दूरं नृपात्तिष्ठेदस्त्रपाताद्बहिः सदा ॥ २७६ ॥
सशस्त्रो दशहस्तं तु यथादिष्टं नृपप्रियाः ।
पञ्चहस्तं वरेयुर्वै मन्त्रिणो लेखकाः सदा ॥ २७७ ॥
सेनपैस्तु बिना नैव सशस्त्रास्त्रो विशेत्सभाम् ।
अस्त्र (बन्दूक या धनुष-बाण आदि) लिये हुये व्यक्ति को अस्त्र की मार
द्वितीयोऽध्यायः [६६]
से बाहर दूरी पर राजा से दूर रहना चाहिये । शस्त्र (तलवार आदि) लिये हुये को १० हाथ दूर रहना चाहिये । एवं राजा के प्रिय को राजा के आदेशानुसार दूरी पर रहना चाहिये । तथा मन्त्री और लेखक को सदा राजा से ५ हाथ की दूरी पर बैठना चाहिये या जैसा जब राजा की आज्ञा हो तदनुसार दूरी पर बैठना चाहिये । और शस्त्र तथा अस्त्र को लिये हुये भी राजा को बिना सेनापतियों के अकेले राजसभा में नहीं बैठना चाहिये ।
पुरोहितः श्रेष्ठतरः श्रेष्ठः सेनापतिः स्मृतः ॥ २७८ ॥
समः सुहृच्च सम्बन्धी ह्युत्तमा मन्त्रिणः स्मृताः ।
अधिकारिगणो मध्योऽधमौ दर्शकलेखकौ ॥ २७६ ॥
ज्ञेयोऽधमतमो भृत्यः परिचारगणः सदा ।
परिचारगणान्न्यूनो विज्ञेयो नीचसाधकः ॥ २८० ॥
पुरोहित का पद सबसे श्रेष्ठ, सेनापति का श्रेष्ठ, राजा के मित्र तथा संबन्धी का पद सम कोटि का कहा हुआ है । एवं मन्त्रियों का उत्तम, अधिकारी गण का मध्यम, दर्शक तथा लेखक का अधम, भृत्य तथा परिचारक (गुलाम) गण का अधमतम और नीच (मल-मूत्रादि फेंकना आदि) कर्म करनेवालों का पद परिचारकगण से न्यून सदा जानना चाहिये ।
पुरोगमनमुत्थानं स्वासने सन्निवेशनम् ।
कुर्यात्सकुशलप्रश्नं क्रमात्सुस्मितदर्शनम् ॥ २८१ ॥
राजा पुरोहितादीनां त्वन्येषां स्नेहदर्शनम् ।
अधिकारिगणादीनां सभास्यश्च निरालसः ॥ २८२ ॥
और वह राजा पुरोहितादि पूज्यों के लिये क्रम से आगे जाकर ले आना, अपने आसन से शरीर उठाना और अपने आसन पर बैठाना, कुशल-प्रश्न पूछना तथा मुस्कुराते हुये देखना ये सब सम्मानार्थ करे । और उनसे अन्य अधिकारी गणों के लिये सभा में ही यथास्थान स्थित रह कर आलस्य छोड़कर केवल स्नेहपूर्वक देखना भर करे ।
विद्यावत्सु शरच्चन्द्रो निदाघार्को द्विषत्सु च ।
प्रजासु च वसन्तार्क इव स्यात्त्रिबिधो नृपः ॥ २८३ ॥
१. विद्वानों के लिये शरत्कालीन चन्द्रमा की भांति आह्लादजनक, २. शत्रुओं के लिये ग्रीष्मकालीन सूर्य की भांति असह्य और ३. प्रजाओं के लिये वसन्तकालीन सूर्य की भांति न मृदु, न तीक्ष्ण होने से राजा तीन प्रकार का कहा जाता है ।
यदि ब्राह्मणभिन्नेषु मृदुत्वं धारयेन्नृपः ।
परिभवन्ति तं नीचा यथा हस्तिपका गजम् ॥ २८४ ॥