भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 180
६४शुक्रनीतिः

स्वामी के प्रति भृत्य के कर्त्तव्य—यदि जासूस अथवा चुगलखोरों के दोष (कहने) से राजा विरुद्ध वचन कहें तो उसे चुपचाप भृत्य को सुन लेना चाहिये किन्तु सत्य की भांति उसे स्वीकार नहीं करना चाहिये ।

आपद्गतं सुभर्त्तारं कदापि न परित्यजेत् ॥ २४७ ॥ और विपत्ति में पड़े हुये अच्छे स्वामी का कभी परित्याग न करना चाहिये।

एकवारमप्यशितं यस्यानं ह्मादरेण च । तद्विष्टं चिन्तयेन्नित्यं पालकस्याञ्जसा न किम् ॥ २४८ ॥ चाहे जिस किसी का अन्न यदि आदर के साथ एक बार भी खा लिया जाय तो उसका हित नित्य चिन्तन करना उचित होता है फिर पालन करने वाले का वस्तुतः क्या हितचिन्तन नहीं करना चाहिये अर्थात् अवश्य करना चाहिये ।

अप्रधानः प्रधानः स्यात्काले चात्यन्तसेवनात् । प्रधानोऽप्यप्रधानः स्यात्सेवाल्स्यादिना यतः ॥ २४६ ॥ स्वामी की समय पर अत्यन्त सेवा करने से अप्रधान (गौण) सेवक प्रधान (मुख्य) हो जाता है किन्तु सेवा में आलस्यादि करने से प्रधान भी अप्रधान सेवक हो जाता है ।

नित्यं संसेवनरतो भृत्यो राज्ञः प्रियो भवेत् । स्वस्वाधिकारकार्यं यद्द्वाक्कुर्यात्सुमना यतः ॥ २५० ॥ नित्य भली-भांति सेवा में तत्पर रहनेवाला भृत्य राजा का प्रिय होता है। क्योंकि भृत्य अपने २ अधिकार ( जिम्मेदारी ) का कार्य शीघ्र करता है अतः स्वामी उससे प्रसन्न रहता है ।

न कुर्यात्सहसा कार्यं नीचं राजापि नो दिशेत् । तत्कार्यकारकाभावे राज्ञा कार्यं सदैव हि ॥ २५१ ॥ भृत्य स्वामी का कार्य अविवेक-पूर्वक न करे अर्थात् सावधानी से करे। और राजा भी भृत्य से नीच कार्य करने के लिये न कहे किन्तु यदि उस नीच (मल-मूत्रादि उठाना रूप) कार्य का करने वाला उस समय कोई राजा के पास न हो तो उस कार्य को सदा स्वयं राजा को कर देना उचित ही है ।

काले यदुचितं कर्तुं नीचमप्युत्तमोऽर्हति । यस्मिन्प्रीतो भवेद्राजा तदनिष्टं न चिन्तयेत् ॥ २५२ ॥ समय पड़ने पर यदि आवश्यकता हो तो मल-मूत्रादि उठाना निकृष्ट कार्य भी उसके अयोग्य उच्च कोटि के भृत्य के लिये करना उचित ही है क्योंकि

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