भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

पृष्ठ 179, कुल 526 में से

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द्वितीयोऽध्यायः ६३

और बिना कोप के भी कोपयुक्त सा दिखाई पड़ता है। प्रसन्न होते हुये भी कार्य को सफल नहीं करनेवाला होता है। और अहङ्कारयुक्त बात बोलता है, जीविका का नाश करता है। गुणों की प्रशंसा करने पर भी विमुख दिखाई पड़ता है और अन्यत्र किये जा रहे कार्य की ओर दृष्टि लगाता है किन्तु गुण-कीर्त्तन करनेवाले की ओर नहीं लगाता है तो ये सब लक्षण विरक्त के समझने चाहिये। और आगे अनुरक्त स्वामी के लक्षण कहते हैं।

दृष्ट्वा प्रसन्नो भवति वाच्यं गृह्णाति चादरात् ॥ २४१ ॥ कुशलादिपरिप्री श्नी प्रदापयति चासनम्। विविक्तदर्शनं चास्य रहस्येनं न शङ्कते ॥ २४२ ॥ जायेत हृष्टवदनः श्रुत्वा तस्य च तत्कथाम्। अप्रियाण्यपि चान्यानि तद्युक्तान्यभिमन्वते ॥ २४३ ॥ उपायनञ्च गृह्णाति स्तोकं सम्पादनैस्तथा। कथान्तरेषु स्मरति प्रहृष्टवदनस्तथा ॥ २४४ ॥

**अनुरक्त राजा के लक्षण—**जो देखकर प्रसन्न होता है और आदर के साथ वचनों को ग्रहण करता है अर्थात् सुनता है। कुशलादि पूछता है, बैठने को आसन दिलाता है। और सेवक के लिये एकान्त में दर्शन देता है एवं एकान्त में भेट होने पर उससे शङ्का नहीं रखता है। और उसकी जो बातें हैं उसे सुनकर प्रसन्न-वदन दिखाई पड़ता है और सेवक से संबद्ध अप्रिय बातों एवं कार्यों को उससे अन्य मानता है अर्थात् अभिनन्दन करता है। दिये हुये उपहार को स्वीकार करता है एवं सेवक के थोड़े से कार्यों को कर देने से भी उन्हें दूसरी बातों का प्रसङ्ग होने पर भी प्रहृष्ट-वदन होकर स्मरण करता है। ये सब अनुराग रखनेवाले स्वामी के लक्षण हैं। यदि ऐसा हो तो उस स्वामी का सेवा करनी चाहिये।

तद्दत्तवस्त्रभूषादिचिह्नं सम्धारयेत्सदा। न्यूनाधिक्यं स्वाधिकारकार्ये नित्यं निवेदयेत् ॥ २४५ ॥ तदर्थां तत्कृतां वार्त्तां शृणुयाद्वापि कीर्त्तयेत्।

**राजा से प्रदत्त भूषणादि धारण का निर्देश—**अनुरक्त स्वामी के दिये हुये वस्त्र-भूषण आदि चिह्न को सदा धारण करना चाहिये। अपने अधिकार के कार्यों में जो न्यूनाधिक्य (कमी-बेश) हो गया हो उसे नित्य स्वामी से निवेदन करना चाहिये। और स्वामी से संबद्ध तथा स्वामी की कही हुई बातों को सुने और उसका कीर्त्तन करे।

चारसूचकदोषेण त्वन्यथा यद्वदेनृपः ॥ २४६ ॥ शृणुयान्मौनमाश्रित्य तद्व्यवञ्चानुमोदयेत्।

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