शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 177, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः । ६१
परार्थनाशनं न स्यात्तथा ब्रूयात्सदेव हि ।
और देश तथा काल का जाननेवाला होकर उचित देश तथा काल होने पर दूसरे का कार्य राजा से सिद्ध करावे। और राजा से सदा ऐसा वचन कहे जिससे दूसरे का कार्य न नष्ट हो ।
न कर्षयेत्प्रजां कार्यमिषतश्च नृपः सदा ॥ २२८ ॥
अपि स्थाणुवदासीत शुष्यन्परिगतः क्षुधा ।
न त्वेवानर्थसम्पन्नां वृत्तिमीहेत पण्डितः ॥ २२६ ॥
राजा को किसी भी मिष से प्रजा को पीड़ित न करने का निर्देश—
समझदार राजा किसी निजी कार्य के व्याज से सदा प्रजा को दुःखित न करे । चाहे भूख से पीड़ित होने से सूखकर स्थाणु (खून्थे) की भांति निश्चल हो जाय फिर भी अनर्थ से भरी हुई (बुरी) जीविका को न चाहे ।
यत्कार्ये यो नियुक्तः स भूयात्तत्कार्यतत्परः ।
नान्वाधिकारमन्विच्छेन्नाभ्यसूयेच्च केनचित् ॥ २३० ॥
समझदारों को अपने २ कार्यों में नियुक्त रहने का निर्देश—
जो जिस कार्य पर नियुक्त किया गया हो वह उस कार्य के करने में तत्पर रहे। और किसी दूसरे के अधिकार छीनने की इच्छा न करे और किसी के साथ असूया (मात्सर्य) न करे ।
न न्यूनं लक्षयेत्कस्य पूरयेत स्वशक्तितः ।
परोपकरणादन्यन्न स्यान्मित्रकरं सदा ॥ २३१ ॥
किसी की त्रुटि पर ध्यान न दे बल्कि अपनी शक्ति से उसकी त्रुटि को पूर्ण करे क्योंकि दूसरे के साथ उपकार करने से बढ़कर दूसरा कोई मित्रता पैदा करनेवाला कार्य नहीं है ।
करिष्यामीति ते कार्यं न कुर्यात्कार्यलम्बनम् ।
द्राक्कुर्यात् समर्थश्चेत्साशं दीर्घं न रक्षयेत् ॥ २३२ ॥
किसी से 'मैं तुम्हारा कार्य करूंगा' ऐसा कहकर उसके कार्य करने में विलम्ब न करे । यदि स्वयं समर्थ हो तो शीघ्र कार्य को पूरा कर दे। दीर्घ काल तक उसे आशा में लटका कर न रखे ।
गुह्यं कर्म च मन्त्रं च न भर्तुः सम्प्रकाशयेत् ।
विद्वेषं च विनाशं च मनसापि न चिन्तयेत् ॥ २३३ ॥
स्वामी के गुप्त कार्य के प्रकाश करने का निषेध—
स्वामी (राजा) के गुप्त कार्य या विचार को किसी के समक्ष प्रकाशित न करे। और उसके साथ विद्वेष या उसके नाश की कल्पना मन से भी न करे ।
राजा परममित्रोऽस्ति न कामं विचरेदिति ।