भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 176

९० : शुक्रनीतिः

नमस्कार करने के बाद शरीर के अगले हिस्से को वस्त्र से ढके हुये स्थित हो और राजा की बात सुनकर तथा सर्वप्रथम उनकी आज्ञा पाकर पश्चात् अपने कार्य का निवेदन करे। और नमस्कार करने के बाद नम्रता के साथ अपने आसन पर बैठे, और राजा के बगल में या सामने जोर से हँसना, खाँसना, थूकना, कुत्सित कार्य या किसी की निन्दा करना, जभाई लेना, शरीर तोड़ना, अंगुलियों के पोरों को चटकाना इन सब कार्यों को न करे।

राज्ञादिष्टन्तु यत्स्थानं तत्र तिष्ठेन्मुदान्वितः ।
प्रवीणोचितमेधावी वर्जयेदभिमानिताम् ॥ २२२ ॥
राजा के बताये हुये स्थान पर प्रसन्न चित्त से बैठे, प्रवीणों की भांति योग्य बुद्धिवाला होकर अभिमान करना छोड़ दे ।

आपद्युन्मार्गगमने कार्यकालात्ययेषु च ।
अपृष्टोऽपि हितान्वेषी ब्रूयात्कल्याणभाषितम् ॥ २२३ ॥
राजा के ऊपर जब कोई आपत्ति आ पड़े अथवा वह कुपथ पर चले, या कार्य करने का समय व्यतीत हो रहा तो बिना पूछने पर भी हित चाहने वाला होकर राजा से कल्याणकारक वचन कहे ।

प्रियं तथ्यं च पथ्यं च वदेद्धर्मार्थकं वचः ।
समानवार्तया चापि तद्धितं बोधयेत्सदा ॥ २२४ ॥
हितकारी सेवक का कृत्य—और सुनने में प्रिय, सत्य तथा हितकारक, धर्म तथा अर्थ से युक्त वचन सदा राजा से कहे, और संमानयुक्त बात-चीत से या समान बातों (उदाहरणों) के द्वारा सदा राजा को हित की बात समझावे ।

कीर्तिमन्यनृपाणां वा वदेन्नीतिफलं तथा ।
दाता त्वं धार्मिकः शूरो नीतिमानसि भूपते ॥ २२५ ॥
अनीतिस्ते तु मनसि वर्तते न कदाचन ।
ये ये भ्रष्टा अनीत्या तांस्तदग्रे कीर्तयेत्सदा ॥ २२६ ॥
नृपेभ्यो ह्यधिकोऽसीति सर्वेभ्यो न विशेषयेत् ।
और समझाने के लिये अन्य राजाओं की कीर्ति और नीति का फल राजा से कहे । और यह सदा उसके आगे कहे कि—'हे महाराज ! आप दाता, धार्मिक, शूर तथा नीति के जानने वाले या तदनुसार चलनेवाले हैं । और कभी आपके मन में अनीति नहीं रहती है। एवं जो जो अनीति पर चलने से राज्य से भ्रष्ट हो गये हैं उन सबों का वर्णन सदा राजा के आगे करे। और 'आप सब राजाओं से श्रेष्ठ हैं' ऐसा विशेष रूप से न कहे ।

परार्थदेशकालज्ञो देशे काले च साधयेत् ॥ २२७ ॥