शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 185, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः [६६]
से बाहर दूरी पर राजा से दूर रहना चाहिये । शस्त्र (तलवार आदि) लिये हुये को १० हाथ दूर रहना चाहिये । एवं राजा के प्रिय को राजा के आदेशानुसार दूरी पर रहना चाहिये । तथा मन्त्री और लेखक को सदा राजा से ५ हाथ की दूरी पर बैठना चाहिये या जैसा जब राजा की आज्ञा हो तदनुसार दूरी पर बैठना चाहिये । और शस्त्र तथा अस्त्र को लिये हुये भी राजा को बिना सेनापतियों के अकेले राजसभा में नहीं बैठना चाहिये ।
पुरोहितः श्रेष्ठतरः श्रेष्ठः सेनापतिः स्मृतः ॥ २७८ ॥
समः सुहृच्च सम्बन्धी ह्युत्तमा मन्त्रिणः स्मृताः ।
अधिकारिगणो मध्योऽधमौ दर्शकलेखकौ ॥ २७६ ॥
ज्ञेयोऽधमतमो भृत्यः परिचारगणः सदा ।
परिचारगणान्न्यूनो विज्ञेयो नीचसाधकः ॥ २८० ॥
पुरोहित का पद सबसे श्रेष्ठ, सेनापति का श्रेष्ठ, राजा के मित्र तथा संबन्धी का पद सम कोटि का कहा हुआ है । एवं मन्त्रियों का उत्तम, अधिकारी गण का मध्यम, दर्शक तथा लेखक का अधम, भृत्य तथा परिचारक (गुलाम) गण का अधमतम और नीच (मल-मूत्रादि फेंकना आदि) कर्म करनेवालों का पद परिचारकगण से न्यून सदा जानना चाहिये ।
पुरोगमनमुत्थानं स्वासने सन्निवेशनम् ।
कुर्यात्सकुशलप्रश्नं क्रमात्सुस्मितदर्शनम् ॥ २८१ ॥
राजा पुरोहितादीनां त्वन्येषां स्नेहदर्शनम् ।
अधिकारिगणादीनां सभास्यश्च निरालसः ॥ २८२ ॥
और वह राजा पुरोहितादि पूज्यों के लिये क्रम से आगे जाकर ले आना, अपने आसन से शरीर उठाना और अपने आसन पर बैठाना, कुशल-प्रश्न पूछना तथा मुस्कुराते हुये देखना ये सब सम्मानार्थ करे । और उनसे अन्य अधिकारी गणों के लिये सभा में ही यथास्थान स्थित रह कर आलस्य छोड़कर केवल स्नेहपूर्वक देखना भर करे ।
विद्यावत्सु शरच्चन्द्रो निदाघार्को द्विषत्सु च ।
प्रजासु च वसन्तार्क इव स्यात्त्रिबिधो नृपः ॥ २८३ ॥
१. विद्वानों के लिये शरत्कालीन चन्द्रमा की भांति आह्लादजनक, २. शत्रुओं के लिये ग्रीष्मकालीन सूर्य की भांति असह्य और ३. प्रजाओं के लिये वसन्तकालीन सूर्य की भांति न मृदु, न तीक्ष्ण होने से राजा तीन प्रकार का कहा जाता है ।
यदि ब्राह्मणभिन्नेषु मृदुत्वं धारयेन्नृपः ।
परिभवन्ति तं नीचा यथा हस्तिपका गजम् ॥ २८४ ॥