भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 186

१०० | शुक्रनीतिः

यदि ब्राह्मणों से भिन्न लोगों के लिये राजा मृदुता धारण करता है तो नीच लोग महावत की भांति होकर हाथी के समान उस राजा का तिरस्कार करने लगते हैं ।

भृत्याद्यैर्न कर्तव्याः परिहासाश्च क्रीडनम् ।
अपमानास्पदे ते तु राज्ञो नित्यं भयावहे ॥ २८५ ॥

भृत्यादियों के साथ राजा को परिहास (हंसी-मजाक) करना तथा खेल नहीं खेलना चाहिये, क्योंकि राजा के लिये ये दोनों सदा अपमानजनक तथा भय देनेवाले हैं ।

पृथक् पृथक् ख्यापयन्ति स्वार्थसिद्धयै नृपाय ते ।
स्वकार्यं गुणवत् कृत्वा सर्वे स्वार्थपरा यतः ॥ २८६ ॥

क्योंकि साथ में खेल खेलनेवाले या परिहास करनेवाले सभी भृत्य लोग (वेतनभोगी जन) पृथक् २ अपनी स्वार्थ-सिद्धि करने में लीन होने से अपने ही कार्य को अन्य की अपेक्षा अधिक गुणयुक्त (सुन्दर) सिद्ध करते हुये राजा को विदित करने का प्रयत्न किया करते हैं ।

विकल्पन्तेऽवमन्यन्ते लंघयन्ति च तद्वचः ।
राजभोज्यानि भुञ्जन्ति न तिष्ठन्ति स्वके पदे ॥ २८७ ॥
विशंसयन्ति तन्मन्त्रं विध्रुवन्ति च दुष्कृतम् ।
भवन्ति नृपवेषा हि वञ्चयन्ति नृपं सदा ॥ २८८ ॥
तत्स्त्रियं सञ्जयन्ति स्म राज्ञि क्रुद्धे हसन्ति च ।
व्याहरन्ति च निर्लज्जा हेलयन्ति नृपं क्षणात् ॥ २८९ ॥
आज्ञामुल्लङ्घयन्ति स्म न भयं यान्त्यकर्मणि ।
एते दोषाः परीहासक्षमाक्रीडोद्भवा नृपे ॥ २९० ॥

राजा के लिये भृत्यों के साथ खेल खेलने या परिहास या क्षमा (अपराध सहन) करने से निम्नलिखित ये दोष उत्पन्न होते हैं—जिससे वे सब (भृत्य लोग) उस राजा के वचनों को कभी तर्क उपस्थित करके अपने मनसे छोड़ देते हैं (नहीं करते हैं), कभी उसका तिरस्कार और कभी उल्लंघन कर देते हैं। और बिना राजाज्ञा के राजा के लिये रखे हुये भोज्य पदार्थों को खा लेते हैं। एवं अपने अधिकारोचित पद के अनुरूप व्यवहार नहीं करते हैं अर्थात् लापरवाही दिखाते हैं। और कभी राजा के गुप्त विचार एवं दुष्कर्मों को अन्यत्र प्रकट कर देते हैं और राजा के समान वेष-भूषादि धारण करते हैं तथा राजा को सदा ही ठगा करते हैं। और राजा की पटरानी को भी अपनी स्वार्थ-सिद्धि के विषय में राजा से कहने के लिये अथवा स्वयं करने के लिये बाध्य करते हैं। राजा के क्रुद्ध होने पर हँसते हैं। निर्लज्ज होकर बात-चीत