शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः ७३
-प्रवर्द्धान न करने दे । और पूर्वोक्त १० प्रकृतियों को परस्पर समबल वाला बनाये रखे, किसी को उभरने न दे ।
एकस्मिन्नधिकारे तु पुरुषाणां त्रयं सदा ॥ ११० ॥
नियुञ्जीत प्राज्ञतमं मुख्यमेकन्तु तेषु वै ।
द्वौ दर्शकौ तु तत्कार्ये हायनैस्तन्निवर्तनम् ॥ १११ ॥
त्रिभिर्वा पञ्चभिर्वापि सप्तभिर्दशभिश्च वा ।
दृष्ट्वा तत्कार्यकौशल्ये तथा तं परिवर्तयेत् ॥ ११२ ॥
**अधिकार की व्यवस्था का निर्देश—**राजा एक अधिकार (पद) पर तीन पुरुषों की नियुक्ति करे और उनमें से जो एक अत्यन्त बुद्धिमान हो उसे मुख्य और शेष दो को दर्शक (सहायक) बनाये । और ३, ५, ७, और १० वर्षों पर उन दोनों के कार्य तथा निपुणता को देखकर तदनुसार परिवर्तन करे ।
नाधिकारं चिरं दद्याद्यस्मै कस्मै सदा नृपः ।
अधिकारे क्षमं दृष्ट्वा ह्यधिकारे नियोजयेत् ॥ ११३ ॥
**अधिकार-योग्य को अधिकार देने का निर्देश—**राजा सदा चाहे जो हो उसे किसी अधिकार (पद) पर ज्यादा दिन तक न रहने दे अधिकार के लिये समर्थ देखकर उसे किसी अधिकार पर रखे ।
अधिकारमदं पीत्वा को न मुह्येत्पुनश्चिरम् ।
अधिकाररूपी मद पीकर कौन नहीं प्रमत्त हो जाता है। अतः चिरकाल तक एक ही अधिकार पर न रहने दे ।
अतः कार्यक्षमं दृष्ट्वा कार्येऽन्ये तं नियोजयेत् ॥ ११४ ॥
अतः उस कर्मचारी को कार्य करने में समर्थ देखकर एक कार्य से दूसरे कार्य पर नियुक्त कर दे ।
तत्कार्ये कुशलं चान्यं तत्पदानुगतं खलु ।
नियोजयेद्वर्तने तु तदभावे तथा परम् ॥ ११५ ॥
तद्गुणो यदि तत्पुत्रस्तत्कार्ये तं नियोजयेत् ।
**योग्य अधिकारी के अभाव में अन्य की योजना का निर्देश—**और कार्य चलने के लिये उस पद पर स्थित (असिष्टण्ट) अन्य जन को जो उस कार्य के करने में कुशल हो—नियुक्त करे । उसके अभाव में दूसरे को नियुक्त करे । यदि कर्मचारी का पुत्र पिता के तुल्य कार्य करने वाला हो तो उसके कार्य पर उसी की नियुक्ति करे ।
यथा यथा श्रेष्ठपदे ह्यधिकारी यदा भवेत् ॥ ११६ ॥
अनुक्रमेण संयोज्यो ह्यन्ते तं प्रकृतिं नयेत् ।
जब कोई नया कर्मचारी जैसे २ अपने से श्रेष्ठ पद के योग्य होता जाय