भारतकोश
शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 158

७२ | शुक्रनीतिः

इतना व्यय हुआ और अब इतना बचा हुआ है। इसे राजा से निवेदन करे।

पुराणि च कति ग्रामा अरण्यानि च सन्ति हि ।
कर्षिता कति भूः केन प्राप्तो भागस्ततः कति ॥ १०४ ॥
भागशेषं स्थितं कस्मिन्कत्यकृष्टा च भूमिका ।
भागद्रव्यं वत्सरेऽस्मिञ्छुल्कदण्डादिजं कति ॥ १०५ ॥
अकृष्टपच्यं कति च कति चारण्यसंभवम् ।
कति चाकरसंजातं निधिप्राप्तं कतीति च ॥ १०६ ॥
अस्वामिकं कति प्राप्तं नाष्टिकं तस्कराहृतम् ।
संचितं तु विनिश्चित्यामात्यो राज्ञे निवेदयेत् ॥ १०७ ॥
समासाल्लक्षणं कृत्यं प्रधानदशकस्य च ।

अमात्य के कार्य— अमात्य का कर्त्तव्य यह है कि—वह—राज्य में कितने नगर, ग्राम या जंगल हैं ? किसने कितनी भूमि जोती है ? और उससे कितना उसने धान्य पाया ? किस क्षेत्र ( खेत ) में कितना भाग बचा है ? कितनी भूमि बिना जुती है ? और इस देश में प्रतिवर्ष शुल्क ( मालगुजारी ), और अपराधियों के दण्ड से ( जुर्माना ) आदि से प्राप्त भाग द्रव्य ( राजा के अंश का द्रव्य ) कितना है ? बिना जुती भूमि में होने वाला सस्यादि कितना है ? जंगल से मिलने वाला द्रव्य कितना है ? खान से निकलने वाला द्रव्य कितना है ? गली आदि में पड़ी हुई अतएव अज्ञात-स्वामी वाली वस्तु कितनी है ? बिना स्वामी ( लावारिस ) का द्रव्य कितना है, हरण किया हुआ द्रव्य कितना है ? और चोरों से दण्ड रूप में प्राप्त धन कितना है ? इन सबों की संख्या जोड़कर राजा से निवेदन करे। इस प्रकार से संक्षेप में पुरोहितादि प्रकृतियों का कृत्य कहा गया।

उक्तं तल्लिखितैः सर्वं विद्यात्तदनुदर्शिभिः ॥ १०८ ॥
परिवर्त्य नृपो ह्येतान्युञ्ज्यादन्योऽन्यकर्मणि ।

राजा के अन्योन्य के स्थान पर अन्योन्य की योजना का निर्देश— राजा पूर्वोक्त पुरोहितादिकों के लिये विहित कार्यों को जुबानी एवं उनके लेखों द्वारा जाने। और उन सबों को समय २ पर योग्यतानुसार एक दूसरे के पदों पर नियुक्त करता रहे। अर्थात् कभी सुमन्त्र को अमात्य पद पर एवं अमात्य को सुमन्त्र पद पर बदली करता रहे।

न कुर्यात्स्वाधिकबलान् कदापि ह्यधिकारिणः ॥ १०९ ॥
परस्परं समबलाः कार्याः प्रकृतयो दश ।

राज्य के उक्त अधिकारी पुरुषों को कभी अपने अधिकार से अधिक शक्ति