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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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७४ : शुक्रनीतिः

वैसे २ अनुक्रम से ( उत्तरोत्तर ) श्रेष्ठ पद पर उसे नियुक्त करे। अन्त में प्रधान पद पर नियुक्त करे।

अधिकारबलं दृष्ट्वा योजयेद्दर्शकान् बहून् ॥ ११७ ॥
अधिकारिणमेकं वा योजयेद्दर्शकैर्विना ।

अधिकार ( कार्य ) की गुरुता ( अधिकता ) समझ कर उसके अनुरूप बहुत से उस कार्य के देखने वाले नियुक्त करे। अथवा बिना दर्शकों के भी केवल एक ही अधिकारी की नियुक्ति करे।

ये चान्ये कर्मसचिवास्तान् सर्वान् विनियोजयेत् ॥ ११८ ॥
गजाश्वरथपादातपशूष्ट्रमृगपक्षिणाम् ।
सुवर्णरत्नरजतवस्त्राणामधिपान् पृथक् ॥ ११९ ॥
वित्तानामधिपं धान्याधिपं पाकाधिपं तथा ।
आरामाधिपतिं चैव सौधगेहाधिपं पृथक् ॥ १२० ॥
सम्भारपं देवतुष्टिपतिं दानपतिं सदा ।

अन्य कर्मों के सचिव की योजना का निर्देश— और जो उक्त दश प्रकृतियों ( प्रधानों ) से अन्य अधिकारी कार्य करने में समर्थ हों उन्हें योग्यतानुसार हाथी घोड़ा, रथ, पैदल सेना, पशु, ऊंट, मृग, पक्षी, सुवर्ण, रत्न, चांदी, वस्त्र इन सबों के पृथक् २ स्वामी ( अधिकारी ), एवं धनाध्यक्ष ( पाठान्तर वितानाद्यधिपम् = शामियाना आदि का स्वामी ), धान्याधिप, पाकशाला का अध्यक्ष, बगीचों का अध्यक्ष, राजोचित तथा साधारण गृहों का अध्यक्ष, देवसेवा ( मन्दिरादि ) का अध्यक्ष, सेनाध्यक्ष पद पर सदा नियुक्त करे।

साहसाधिपतिं चैव ग्रामनेतारमेव च ॥ १२१ ॥
भागहारं तृतीयं तु लेखकं च चतुर्थकम् ।
शुल्क्रमाहं पञ्चमं च प्रतिहारं तथैव च ॥ १२२ ॥
षट्कमेतन्नियोक्तव्यं ग्रामे ग्रामे पुरे पुरे ।

दण्डाधिपति आदि ६ की योजना का निर्देश— और साहसाध्यक्ष ( संग्राम आदि साहस कर्मों के अध्यक्ष ), ग्राम का अध्यक्ष, भागहार ( प्रजाओं से कर वसूल करने वाला ), लेखक, शुल्क ( व्यवसायादि पर लगे टैक्स ) को वसूल करने वाला, द्वारपाल इन ६ कर्मचारियों की प्रत्येक नगर और ग्राम में नियुक्ति करे।

तपस्विनो दानशीलाः श्रुतिस्मृतिविशारदाः ॥ १२३ ॥
पौराणिकाः शास्त्रविदो दैवज्ञा मान्त्रिकाश्च ये ।
आयुर्वेदविदः कर्मकाण्डज्ञास्तान्त्रिकाश्च ये ॥ १२४ ॥
ये चान्ये गुणिनः श्रेष्ठा बुद्धिमन्तो जितेन्द्रियाः ।