शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 526 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः ७५
तान सर्वान् पोषयेद् भृत्या दानैर्मानैः सुपूजितान् ॥ १२५ ॥
हीयते चान्यथा राजा ह्यकीर्त्तिं चापि बिन्दति ।
**राजा को तपस्वी आदियों की रक्षा करने का निर्देश—**जो राज्य में तपस्या करने वाले, दानशील, वेद तथा स्मृतियों के ज्ञाता (वैदिक और स्मार्त्त), पुराण के जानने वाले, शास्त्रज्ञ, ज्योतिषी, मन्त्र-तन्त्रवेत्ता, वैद्य, कर्मकाण्ड के ज्ञाता, शैवादि धर्म शास्त्र-ज्ञाता, तथा इन से अन्य विषयों के ज्ञाता, श्रेष्ठ गुणी, बुद्धिमान या जितेन्द्रिय हों, उन सबों का मासिक या वार्षिक वृत्ति, समय २ पर दान तथा सम्मान द्वारा पूजित करते हुये भरण-पोषण करे। यदि राजा ऐसा न करे तो राज्य से च्युत हो जाता है तथा उसकी अपकीर्त्ति भी होती है।
बहुसाध्यानि कार्याणि तेषामप्यधिपांस्तथा ॥ १२६ ॥
तत्तत्कार्येषु कुशलाञ्ज्ञात्वा तांस्तु नियोजयेत् ।
बहुत व्यक्तियों द्वारा संपन्न होने वाले कार्यों को जानकर या उन कार्यों के करने में कुशल जो हों उन्हीं व्यक्तियों को समझ कर यथायोग्य उक्त कार्यों का अधिकारी बनावे।
अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम् ॥ १२७ ॥
अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः ।
**योजनाकर्त्ता की दुर्लभता—**कोई भी अक्षर ऐसा नहीं है जो मन्त्र से शून्य हो, तरु-गुल्म आदि का कोई भी मूल (जड़ी-बूटी) ऐसा नहीं है जो औषध न हो एवं कोई भी ऐसा पुरुष नहीं है जो किसी कार्य के योग्य न हो किन्तु इन सबों को यथोचित रीति से कार्यों में लगाने वाला पुरुष ही दुर्लभ है।
प्रभद्रादिजातिभेदं गजानां च चिकित्सितम् ॥ १२८ ॥
शिक्षां व्याधिं पोषणं च तालुजिह्वानखैर्गुणान् ।
आरोहणं गतिं वेत्ति स योग्यो गजरक्षणे ॥ १२९ ॥
तथाविधाधोरणस्तु हस्तिहृदयहारकः ।
**गजाधिपति के एवं महावत के लक्षण—**जो पुरुष हाथियों के प्रभद्र आदि जाति-भेद को तथा उनकी चिकित्सा-विधि शिक्षा, व्याधि, पोषण करना तथा उनके तालु, जिह्वा और नख के द्वारा गुणों को एवं उन पर चढ़ने की तथा उनके चलाने की कला को जानने वाला हो उसे हाथियों की रक्षा करने में (गजाध्यक्ष) नियुक्त करे। क्योंकि उक्त गुणों से ही युक्त महावत हाथियों को वश में करने वाला होता है।
अश्वानां हृदयं वेत्ति जातिवर्णभ्रमैर्गुणान् ॥ १३० ॥