शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयोऽध्यायः ७७
की घोड़ों की चालों को तथा घोड़े के सामर्थ्य के अनुसार उन्हें यथार्थ रूप से शिक्षा देना जानता है वह अश्वशिक्षक (घोड़ों को सिखानेवाला) के पद पर नियुक्त करने योग्य होता है।
वाजिसेवासु कुशलः पल्याणादिनियोगवित् ॥ १३७॥
दृढांगश्च तथा शूरः स कार्यो वाजिसेवकः।
**अश्वसेवक (साईस) के लक्षण—**जो घोड़ों की सेवा करने में कुशल, पल्याण (घोड़े की जीन) आदि लगाने की कला का जानने वाला, दृढ़ अङ्गों वाला तथा शूर होता है वह साईस बनाने योग्य है।
नीतिशास्त्रास्त्रव्यूहादिनतिविद्याविशारदाः ॥ १३८॥
अबाला मध्यवयसः शूरा दान्ता दृढांगकाः।
स्वधर्मनिरता नित्यं स्वामिभक्ता रिपुद्विषः ॥ १३९॥
शूद्रा वा क्षत्रिया वैश्या म्लेच्छाः संकरसम्भवाः।
सेनाधिपाः सैनिकाश्च कार्या राज्ञा जयार्थिना ॥ १४०॥
**सेनापति तथा सैनिकों के लक्षण—**जो नीति (कर्त्तव्य तथा अकर्त्तव्य जानने का) शास्त्र, शस्त्र तथा अस्त्र चलाना, व्यूह-रचना, नतिविद्या (शत्रुओं को नीचा दिखाना) इन सब विषयों में पण्डित, लड़कपन से रहित, तरुण, शूर, सैनिक-शिक्षा प्राप्त, दृढ़ अङ्गों वाले, अपने धर्म में निरत, नित्य स्वामी में भक्ति रखने वाले, एवं उनके शत्रुओं से द्वेष रखने वाले, शूद्र, क्षत्रिय, वैश्य, म्लेच्छ या सङ्कीर्ण जाति वाले हों उन्हें विजय चाहनेवाला राजा अपना सेनाध्यक्ष या सैनिक बनावे।
पञ्चानामथवा षण्णामधिपः पदगामिनाम्।
योग्यः स पत्तिपालः स्यात्त्रिंशतां गौल्मिकः स्मृतः ॥ १४१॥
शतानां तु शतानीकस्तथाऽनुशतिको वरः।
सेनानीर्लेखकश्चैते शतं प्रत्यधिपा इमे ॥ १४२॥
साहस्रिकस्तु संयोज्यस्तथा चायुतिको महान्।
**पत्ति (पैदल सेना) पाल आदिकों के अधिकार—**५ या ६ पैदल सिपाहियों का जो स्वामी होता है वह 'पत्तिपाल' ३० सिपाहियों का स्वामी 'गौल्मिक' १०० सिपाहियों का स्वामी 'शतानीक' कहलाता है, और श्रेष्ठ अनुशतक, सेनानी तथा लेखक ये सब सौ-सौ के ऊपर विशेष २ कार्यों के लिये अध्यक्ष बनाने चाहिए। और १००० सिपाहियों का स्वामी 'साहस्रिक' एवं १०००० सिपाहियों का स्वामी महान 'आयुतिक' बनाना चाहिये।
व्यूहाभ्यासं शिक्षयेद्यः सायंप्रातस्तु सैनिकान् ॥ १४३॥
जानाति स शतानीकः सुयोद्धुं युद्धभूमिकाम्।