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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

महर्षि शुक्राचार्य द्वारा

स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished526 पृष्ठ

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पृष्ठ 196
११०शुक्रनीतिः

सुवर्णरत्नरजतनिष्क्शालास्तथैव च ।
रथाश्वगोगजोष्ट्राजावीनशालाः पृथक् पृथक् ॥ ३४६ ॥
वाद्यशास्त्रास्त्रवस्त्राणां धान्यसम्भारयोस्तथा ।
मन्त्रिशिल्पनाट्यवैद्यमृगाणां पाकपक्षिणाम् ॥ ३४७ ॥
शाला भोग्ये निविष्टास्तु तद्व्ययो भोग्य उच्यते ।

**भोग्य व्यय के लक्षण—**सोना, रत्न, चांदी, निष्क (मोहर-स्वर्ण मुद्रा) रखने के जो स्थान हैं एवं रथ, घोड़े, गौ, गज, ऊंट, बकरे, मेडे आदि के तथा इनके अध्यक्षों के लिये पृथक्-पृथक् बने हुये जो स्थान (गृह) हैं। और वाद्य (बाजे), शस्त्र, अस्त्र, धान्य, संभार (नाना प्रकार की सामग्री) रखने के लिये जो स्थान हैं तथा मन्त्री, शिल्प, नाट्य (नाटक-संबन्धी), वैद्य, मृग, पाक, पक्षी इनके लिये जो स्थान हैं, उन सबों की गणना भोग्य के अन्दर है अतः इन सबों के संबन्ध में होनेवाले व्यय को भी 'भोग्य' कहते हैं।

जपहोमार्चनैर्दानैश्चतुर्धा पारलौकिकः ॥ ३४८ ॥
पुनर्यातो निवृत्तश्च विशेषायायव्ययौ च तौ।
आवर्तको निवर्ती च व्ययायौ तु पृथग्विधा ॥ ३४९ ॥

**पारलौकिक व्यय के चार भेद और उनके लक्षण—**जप, होम, पूजन तथा दान भेद से पारलौकिक व्यय के मुख्य चार भेद होते हैं। और जो आय आकर पुनः जानेवाला हो उसे विशेष आय एवं जो व्यय जाकर पुनः आनेवाला हो उसे विशेष व्यय कहते हैं। अतः व्यय तथा आय ये दोनों पृथक् २ आवर्त्तक (वापस आनेवाले) निवर्ती (नहीं वापस आनेवाले) भेदों से दो २ प्रकार के होते हैं ।।

आवर्तकविहीनौ तु व्ययायौ लेखको लिखेत् ।

**आय-व्यय-लेखक के कर्तव्य—**लेखक वापस आनेवाले और वापस न आनेवाले व्यय तथा आयको लिखे।

क्रयाधमर्णघटनान्यस्थलाप्तो विवर्तकः ॥ ३५० ॥
द्रव्यं लिखित्वा दद्यात्तु गृहीत्वा विलिखेत्स्वयम् ।

क्रय (खरीदना), अधमर्ण की घटनाओं (ऋणादि व्यवहारों) एवं अन्य विषयों में विश्वासपात्र लेखक स्वयं द्रव्य लिखकर तब देवे या लेवे।

हीयते वर्धते नैवमायव्ययविलेखकः ॥ ३५१ ॥

इस प्रकार से आय-व्यय के लिखनेवाले का लिखा आय तथा व्यय न कम होता है और न बढ़ता है।

हेतुप्रमाणसम्बन्धकार्याङ्गव्याप्यव्यापकैः ।
आयाश्च बहुधा भिन्ना व्ययाः शेषं पृथक् पृथक् ॥ ३५२ ॥